TMC पर किसका कब्जा? ममता या बागी सांसद? कोर्ट पहुंची लड़ाई तो किसके हाथ में रहेगी पार्टी, समझिए कानूनी गणित
TMC Crisis Party Controversy Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में शायद यह सबसे बड़ा संकट है, जिसका सामना ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक करियर में करना पड़ रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों का पार्टी से अलग होना केवल राजनीतिक झटका नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर पार्टी के अस्तित्व और उसके चुनाव चिन्ह तक की लड़ाई बन सकता है। यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अगर मामला चुनाव आयोग और अदालत तक पहुंचता है तो आखिर 'असली TMC' किसे माना जाएगा?
वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में इन 20 सांसदों ने दिल्ली में लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी सौंपकर एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) में अपने विलय (Merger) का ऐलान कर दिया है। इस बगावत ने देश की सियासत में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है-क्या महाराष्ट्र के शिवसेना और एनसीपी विवाद की तरह अब बंगाल में भी ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी का नाम और 'जोड़ा फूल' चुनाव चिह्न छिन जाएगा?

बागी गुट का दावा है कि जुलाई में संसद सत्र शुरू होते ही वे खुद को 'असली टीएमसी' घोषित करने की कानूनी लड़ाई शुरू करेंगे। आइए समझते हैं कि इस कानूनी लड़ाई में किसका पलड़ा भारी है और कोर्ट की चौखट पर जाकर यह मामला कैसे पलटने वाला है।
▶️सांसदों की बगावत या कानून से बचने का जुगाड़? (TMC Rebel MPs NCPI Merger Reality)
बागी सांसदों के इस कदम को समझने के लिए सबसे पहले 'दल-बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) को समझना होगा। साल 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत यह कानून इसलिए लाया गया था ताकि कोई भी सांसद या विधायक पैसों या पद के लालच में अपनी पार्टी न बदले।
साल 2003 में हुए 91वें संविधान संशोधन के बाद एक नियम पूरी तरह खत्म कर दिया गया-वह था 'विभाजन' (Split) का नियम। यानी अब आप किसी पार्टी में रहकर यह नहीं कह सकते कि हम एक-तिहाई लोग अलग गुट बना रहे हैं।
अब संसद या विधानसभा में अपनी सदस्यता बचाने का सिर्फ एक ही रास्ता है-'विलय' (Merger)। कानून कहता है कि अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में जाकर मिल जाते हैं, तभी उनकी सदस्यता बचेगी। टीएमसी के पास लोकसभा में 28 सांसद थे, जिसका दो-तिहाई आंकड़ा 20 बैठता है।
बागियों ने इस आंकड़े को तो छू लिया और खुद को अयोग्य होने से बचाने के लिए त्रिपुरा की एक गुमनाम सी पार्टी NCPI का सहारा लिया। लेकिन कानून के जानकार इसे 'शेल कंपनी' की तरह सिर्फ एक कानूनी जुगाड़ मान रहे हैं, जो अदालत में टिकना बेहद मुश्किल है।

▶️सुप्रीम कोर्ट के वो फैसले जो बागियों की राह में बनेंगे रोड़ा (SC Judgments That Can Block Rebel MPs)
बागी गुट भले ही दो-तिहाई सांसदों के दम पर अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी ढाल बनने जा रहे हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी जैसे जानकारों का मानना है कि बागियों ने जो रास्ता चुना है, उसमें कई कानूनी खामियां हैं। सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े फैसले इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे:
🔷सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल (2023 - शिवसेना विवाद): इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कहा था कि 'मूल राजनीतिक दल' (Political Party) और 'विधायक/सांसद दल' (Legislative Party) दो अलग-अलग चीजें हैं। सदन के भीतर बैठे जनप्रतिनिधि खुद को पूरी पार्टी का मालिक नहीं मान सकते। व्हिप जारी करने और पार्टी के बड़े फैसले लेने का असली हक मूल संगठन और उसके अध्यक्ष (ममता बनर्जी) के पास ही सुरक्षित रहता है।
🔷डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह (2004) और राजेंद्र सिंह राणा (2007) केस: इन मामलों में अदालत ने साफ किया था कि विलय हमेशा दो राजनैतिक दलों के बीच संगठन के स्तर पर होना चाहिए, न कि केवल कुछ सांसदों या विधायकों के स्तर पर। अगर मूल पार्टी का संगठन विलय के लिए तैयार नहीं है, तो केवल सांसदों का दूसरी पार्टी में जाना सीधा-सीधा 'दल-बदल' माना जाएगा।
🔷रवि नाइक बनाम भारत सरकार (1994): अदालत ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी जनप्रतिनिधि की गतिविधियां अपनी ही पार्टी की नीतियों और मूल नेतृत्व के खिलाफ हैं, तो उसे 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' माना जाएगा।

▶️चुनाव आयोग का वो पैराग्राफ 15 और सादिक अली केस
बागी नेता सुदीप बंदोपाध्याय का कहना है कि वे जुलाई में चुनाव आयोग (Election Commission) के सामने 'असली टीएमसी' होने का दावा ठोकेंगे। जब भी ऐसी स्थिति आती है, तो चुनाव आयोग 'इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत कार्रवाई करता है। 1971 के मशहूर 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले के आधार पर आयोग तीन मुख्य पैमानों पर दावों की जांच करता है:
🔷1. जनप्रतिनिधियों का बहुमत (Test of Legislative Majority)
आयोग देखता है कि संसद और विधानसभा में कितने लोग किस गुट के साथ हैं। यहाँ बागियों का पक्ष मजबूत दिखता है, क्योंकि उनके पास 28 में से 20 लोकसभा सांसद हैं और वे राज्य के 80 में से 60 से ज्यादा विधायकों के समर्थन का दावा भी कर रहे हैं। हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी है, जिसे टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
🔷2. संगठन पर पकड़ (Test of Organisational Majority)
आयोग यह भी जांचता है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों में किसका पलड़ा भारी है। इस मोर्चे पर ममता बनर्जी बेहद मजबूत हैं, क्योंकि अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के संगठन पर आज भी उनका और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का पूरा नियंत्रण है। हालांकि, महाराष्ट्र के मामलों में आयोग ने संगठन से ज्यादा जनप्रतिनिधियों की संख्या को तवज्जो दी थी, जो ममता के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
🔷3. पार्टी का संविधान (Test of Party Constitution)
आयोग देखता है कि क्या पार्टी के भीतर बगावत या नए नेतृत्व का चुनाव पार्टी के आंतरिक नियमों और संविधान के तहत हुआ है या नहीं। चूंकि टीएमसी का पूरा ढांचा ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द बुना गया है, इसलिए बागियों के लिए खुद को पार्टी के संविधान के तहत 'असली' साबित करना एक टेढ़ी खीर होगी।
▶️क्या जब्त हो जाएगा TMC का चुनाव चिन्ह?
इस पूरी कानूनी जंग का नतीजा क्या निकलेगा? अगर चुनाव आयोग को लगता है कि दोनों पक्षों के दावे बेहद उलझे हुए हैं और तुरंत किसी एक के पक्ष में फैसला नहीं दिया जा सकता, तो आयोग अंतरिम आदेश जारी कर सकता है। ऐसी स्थिति में टीएमसी का नाम और उसका प्रसिद्ध 'जोड़ा फूल' सिंबल फ्रीज (जब्त) किया जा सकता है। इसके बाद दोनों गुटों को चुनाव के लिए अस्थाई तौर पर नए नाम और नए चुनाव चिह्न दिए जाएंगे।
अभिषेक बनर्जी ने पहले ही लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भेजकर बागी गुट को मान्यता न देने और अधिकृत व्हिप का पालन कराने की मांग की है। सागरिका घोष और कीर्ति आजाद जैसे नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे इस लड़ाई को इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे। चुनाव आयोग या स्पीकर का फैसला जिसके भी खिलाफ जाएगा, वह तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा।
लड़ाई का लब्बोलुआब यह है कि कागजी और विधायी आंकड़ों (सांसदों की संख्या) के जाल में बागी गुट ने ममता बनर्जी की घेराबंदी बहुत तगड़ी की है। उन्होंने कानून की कमियों का फायदा उठाकर अपनी सांसदी तो फिलहाल बचा ली है, लेकिन टीएमसी की आत्मा इसके लाखों कार्यकर्ता और संगठन हैं, जो पूरी तरह ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।
अदालत के कमरों में भले ही महीनों या सालों तक यह कानूनी खींचतान चलती रहे, लेकिन पश्चिम बंगाल की जमीन पर असली ताकत आज भी ममता बनर्जी की ही है। अगर यह मामला लंबा खिंचता है, तो अंततः इसका फैसला जनता की अदालत में यानी बंगाल के चुनावी मैदान में ही होगा, जहां ममता बनर्जी को हरा पाना बागियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।















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