Three Language Policy: केंद्र को पवन कल्याण के बाद चंद्रबाबू नायडू का भी साथ, DMK को बड़ा झटका
Three Language Policy: आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत प्रस्तावित तीन भाषा नीति का समर्थन किया है। यह कदम केंद्र की मोदी सरकार के लिए एक बड़ी सुखद खबर साबित हो सकती है, वहीं विपक्षी डीएमके (इंडिया ब्लॉक) की रणनीति को झटका लगा है। खासकर वक्फ बिल पर चर्चा से पहले जिस तरह का माहौल खड़ा हो रहा है,उसको देखते हुए मोदी सरकार के लिए यह बहुत ही राहत की बात है।
क्योंकि, इन दिनों डीएमके दक्षिण भारतीय राज्यों को तीन भाषा वाले मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद करने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत तीन भाषा नीति के खिलाफ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने तो इसका झंडा उठा रखा है।

Three Language formula: भाषा पर राजनीति से बचने की सलाह,हिंदी को कहा राष्ट्रीय भाषा
आंध्र प्रदेश विधानसभा में सोमवार को नायडू ने कहा कि भाषा केवल संचार का माध्यम है और इसे नफरत का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया, 'हमारी मातृभाषा तेलुगु है, राष्ट्रीय भाषा हिंदी है और अंतरराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी है। हमें जितनी संभव हो सके उतनी भाषाएं सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी मातृभाषा को नहीं भूलना चाहिए।'
नायडू ने कहा कि जो लोग अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल कर रहे हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि अधिक भाषाएं सीखने से रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो विदेश जाने की योजना बना रहे हैं।
Three Language Policy: पवन कल्याण का भी समर्थन
चंद्रबाबू नायडू की यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और जनसेना प्रमुख पवन कल्याण की हालिया टिप्पणियों के बाद आई है। पवन कल्याण ने कहा था कि किसी भाषा को जबरन थोपना या उसका अंधविरोध करना दोनों ही अनुचित है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी के खिलाफ उनकी कोई व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है, लेकिन इसे अनिवार्य बनाना सही नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति हिंदी को अनिवार्य नहीं करती, तो इसके जबरन थोपे जाने की अफवाहें फैलाना जनता को गुमराह करने जैसा है।
Three Language Policy: तमिलनाडु का विरोध और इंडिया ब्लॉक की रणनीति
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन लगातार तीन भाषा नीति का विरोध कर रहे हैं। डीएमके इसे हिंदी थोपने की साजिश बता रही है और राज्य में इसे लागू नहीं करने का संकल्प ले चुकी है। स्टालिन और उनके सहयोगी इसे दक्षिण भारतीय भाषाओं की अस्मिता से जोड़ रहे हैं और इस मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशों में जुटे हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु में कांग्रेस भी डीएमके की ही सहयोगी है।
हालांकि, नायडू और पवन कल्याण के समर्थन के बाद, डीएमके की यह रणनीति कमजोर होती दिख रही है। आंध्र प्रदेश सरकार का रुख इस बात का संकेत देता है कि दक्षिण भारत के सभी राज्य इस मुद्दे पर एकमत नहीं हैं।
Three Language formula: व्यावहारिक लाभों पर जोर
नायडू ने हिंदी सीखने के व्यावहारिक फायदों पर भी जोर दिया है। उन्होंने कहा कि हिंदी जानने से देश के अन्य हिस्सों, खासकर दिल्ली में संवाद करना आसान होगा। इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि जापानी और जर्मन जैसी भाषाओं को सीखने की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि रोजगार के अवसरों को बढ़ाया जा सके।
चंद्रबाबू नायडू और पवन कल्याण का तीन भाषा नीति का समर्थन करना मोदी सरकार के लिए एक मजबूत संकेत है कि यह नीति व्यापक स्तर पर स्वीकार्य हो सकती है। साथ ही, यह विपक्षी डीएमके की उस रणनीति को कमजोर कर सकता है, जिसके तहत दक्षिण भारतीय राज्यों को केंद्र सरकार के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जा रही थी।












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