मोदी को पैन इंडिया का नेता बनाने में ये है सबसे बड़ा अड़ंगा

नई दिल्ली- 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के पीएम उम्मीदवार चुने जाने तक नरेंद्र मोदी गुजरात के सबसे लोकप्रिय नेता थे। 2013-14 में जब उन्होंने देशभर में पार्टी का प्रचार अभियान संभाला तो उनके सामने हिंदी हार्टलैंड में अपनी वही लोकप्रियता हासिल करने की चुनौती थी। उस दौरान लोगों के मन में सवाल उठ रहे थे कि क्या मोदी, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे कद्दावर नेताओं को हराने में सफल होंगे। क्योंकि, यूपी ही भारतीय राजनीति का केंद्र माना जाता है। मोदी ने सभी आशंकाओं को दूर कर लोकसभा चुनाव में न सिर्फ पार्टी को अप्रत्याशित सफलता दिलाई, बल्कि करीब 3 साल बाद विधानसभा चुनावों में फिर से एसपी-बीएसपी को धूल चटाने में कामयाब हो गए। लेकिन, सिर्फ 2 ही साल बाद हालात बदल चुके हैं। यूपी में ही नहीं पूरे देश में ही सियासी समीकरणों में उलट-फेर हो चुका है। बीजेपी के लिए आज जरूरत इस बात की है कि मोदी एकबार फिर उसी तरह यूपी से भी आगे निकलकर हिंदी भाषी राज्यों के बाहर भी अपनी पैन-इंडिया लीडरशिप का लोहा मनवाएं, जैसे गुजरात से निकलकर वे एक बेहद लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता बनकर उभरे हैं। लेकिन, सवाल ये है कि क्या ये काम इतना आसान है?

मोदी के सामने नई चुनौती

मोदी के सामने नई चुनौती

इस बात में कोई शक नहीं कि मोदी आज गुजरात से कहीं ज्यादा 'यूपी के नेता' बन चुके हैं। वैसे काशी में उनका बस एक ठिकाना है, वे निर्विवाद रूप से पूरे हिंदी हार्टलैंड- उत्तर, मध्य एवं पश्चिम भारत के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। लेकिन, 2019 में उनके सामने चुनौती इससे आगे निकलने की है। यानी अब बीजेपी को सत्ता में वापसी के लिए पूरब और दक्षिण के राज्यों भी बेहतर प्रदर्शन की दरकार है। क्योंकि, अगर हिंदी भाषी राज्यों में थोड़ा भी निराशा मिले तो गैर-हिंदी भाषी राज्यों का सहारा मिल सके। गौरतलब है कि मोदी से पहले बीजेपी के जितने भी बड़े नेता हुए हैं, चाहे वे अटल जी हों या आडवाणी, सभी काउ-बेल्ट (Cow-belt) में ही अपना ज्यादा प्रभाव छोड़ने में सफल हुए हैं। मौजूदा परिस्थितियों में बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस की यही बहुत बड़ी ताकत है। यह सोचने की बात है कि 2004 में यूपी से सिर्फ 9 सीटें जीतने वाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर कैसे उभरी? क्योंकि, दक्षिण खासकर आंध्र प्रदेश ने उसकी भरपाई कर दी और कांग्रेस एनडीए सरकार को हटाकर यूपीए सरकार बनाने में कामयाब हो गई। आज की तारीख में ये सवाल लाजिमी है कि क्या बीजेपी दक्षिण भारत में वैसे प्रदर्शन की उम्मीद कर सकती है?

मोदी की मुश्किल

मोदी की मुश्किल

नरेंद्र मोदी की एक बड़ी क्षमता हिंदी में उनके भाषण देने की कला है। दक्षिण और पूर्वी भारत में उनके रास्ते में यही रोड़ा बन रहा है। भाषाई अड़चन से मोदी अपने भाषणों से तमिलनाडु,आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में वही प्रभाव नहीं छोड़ पाते, जितना वे हिंदी भाषी राज्यों में डालते हैं। इसके ठीक उलट कांग्रेस को यहां पर अपने पुराने गढ़ होने का फायदा मिल जाता है। अगर कांग्रेस को आंध्र प्रदेश का साथ नहीं मिला होता, तो वह 1991 और 2004 में दिल्ली में सरकार नहीं बना पाती। पार्टी को पता है कि इसबार भी यूपी में उसके लिए कोई सीटों का खजाना नहीं रखा है, इसलिए केरल में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने का एक मकसद ये भी है कि उसके प्रभाव से पास के तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में 86 सीटों पर बीजेपी को पीछे छोड़ सके।

क्षेत्रीय दलों से मिल रही नई चुनौती

क्षेत्रीय दलों से मिल रही नई चुनौती

2014 में मोदी ने यूपी में माया-मुलायम और बिहार में नीतीश-लालू की चुनौती को आसानी से मात दी थी। लेकिन, इसबार यूपी से आ रही आशंकाओं की भरपाई के लिए ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और चंद्रबाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय ताकतों से निपटना बड़ी चुनौती है। यूपी और बिहार में उन्होंने हिंदी भाषी नेताओं को राजनीतिक रूप से निपटा दिया था, लेकिन अबकी बार उनके सामने पश्चिम बंगाल और ओडिशा की दमदार राजनीतिक शख्सियतें हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि दोनों राज्यों का मौजूदा नेतृत्व मोदी के सामने अपना सियासी अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। लेकिन, ये भी सच्चाई है कि भले ही बंगाल और ओडिशा में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा हो, लेकिन अभी भी ममता और पटनायक का करिश्मा खत्म नहीं हो पाया है। वैसे क्षेत्रीय दलों से मिल रही इन चुनौतियों को निपटाने के लिए मोदी-शाह ने काफी प्रयास किए भी हैं। यूपी में इसबार उन्हें महागठबंधन का सामना करना पड़ रहा है, तो बिहार में उन्हें जेडीयू जैसा सहयोगी भी मिल गया है। यही नहीं 2019 में मोदी की लड़ाई को सुरक्षित करने के लिए बीजेपी ने कई जगह सहयोगियों के दबाव में झुकना भी स्वीकार किया है। शिवसेना और जेडीयू के साथ सीटों के तालमेल में भी यही बात दिखाई पड़ती है। लेकिन, ये राज्य वही हैं, जहां मोदी आज भी लोकप्रिय हैं। पेंच तो वहां फंस रहा है, जहां उनकी लोकप्रियता का ग्राफ ऊपर चढ़ने का अभी भी इंतजार ही है।

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