थर्ड जेंडर को आरक्षण देने के लिए मिल सकता है इस जाति का दर्जा
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने चार साल पहले एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रांसजेंडरों को थर्ड जेंडर घोषित किया था और सरकार से उन्हें शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने को कहा था। केंद्र सरकार में अब इस बात को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई है। देश में अभी शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों, अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्धारित कर रखा है कि किसी भी सूरत में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी या उससे अधिक नहीं हो सकती है। फिलहाल, ओबीसी के लिए 27 फीसदी और एसटी-एससी के लिए 22.5 फीसदी का कोटा निर्धारित है। ऐसे में केंद्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि क्या थर्ड जेंडर के लिए आरक्षण की व्यवस्था ओबीसी कोटे से ही किया जा सकता है?

ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा मंत्रालय ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ट्रांसजेंडरों को आरक्षण देने के लिए निर्धारित तरीके पर विचार-मंथन शुरू कर दिया है। माना जा रहा है कि थर्ड जेंडर को यह रिजर्वेशन अन्य पिछड़ा वर्ग के जरिए दिया जाएगा। यानि ट्रांसजेंडरों को भी अन्य पिछड़े वर्ग की लिस्ट में शामिल किया जाएगा। जानकारी के मुताबिक नेशनल कमीशन फॉर बैकवॉर्ड कास्ट के संज्ञान में भी यह बात पहुंच गई है। अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने हाल ही में इस मामले में एनसीबीसी से सुझाव मांगी है।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक एतिहासिक आदेश में 2014 में ट्रांसजेंडरों के लिए केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि उनके साथ 'सामाजिक और शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के नागरिकों के तौर पर व्यवहार करें और उन्हें शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक नियुक्तियों में सभी तरह का आरक्षण उपलब्ध करवाएं।' गौरतलब है कि ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में कानूनी मान्यता देते हुए कोर्ट ने कहा था कि, 'यह मानव जाति का अधिकार है कि वह अपना जेंडर चुने।'
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मद्देनजर राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने ट्रांसजेंडरों को ओबीसी कोटे के तहत 27 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की थी। वैसे 2019 में केंद्र सरकार ट्रांसजेंडर पर्सन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) ऐक्ट लेकर आई, लेकिन आरक्षण की विषय को यूं छोड़ दिया। इसके चलते सरकार को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। जबकि, इस कानून में साफ था कि सरकार ऐसे लोगों के कल्याण और हितों के लिए सभी तरह का कदम उठाएगी और योजनाएं तैयार करेगी।
इस साल की शुरुआत में इस संबंध में सहमति बनाने को लेकर सामाजिक न्याय मंत्रालय ने शिक्षा मंत्रालय को ट्रांसजेंडरों को सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग में शामिल करने की योजना को लेकर लिखा था। 15 अप्रैल, 2020 के इस संवाद में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने इस प्रस्ताव पर शिक्षा मंत्रालय से उसका नजरिया मांगा था। शुरू में इसे ट्रांसजेंडर पर्सन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) ऐक्ट के तहत बने नियमों के हिस्से के रूप में ही शामिल किया जाना था। शिक्षा मंत्रालय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए शिक्षण संस्थानों में सिर्फ सामाजिक न्याय मंत्रालय के मैनडेट के मुताबिक ही आरक्षण लागू करता है। गौरतलब है कि यह मंत्रालय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित सभी मुद्दों का नोडल विभाग है। (तस्वीर प्रतीकात्मक)












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