लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के सामने ये हैं 5 बड़ी चुनौती, कैसे निपटेंगे मोदी और शाह?
नरेंद्र मोदी सरकार अगले साल अपने तीसरे टर्म के लिए जनता के सामने होगी। लेकिन इस बार नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए लोकसभा का चुनाव आसान रहने वाला नहीं है। बीजेपी को कई मोर्चों पर विपक्षी दलों की ओर से जबरदस्त टक्कर मिल रही है।
लोकसभा चुनाव में जहां विपक्ष एकजुट होकर बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी में है वहीं बीजेपी ने भी किलेबंदी शुरू कर दी है। पार्टी नए साथियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन उसे कई राज्यों में असफलता भी मिल रही है।

नरेंद्र मोदी और बीजेपी को अगर 2024 में अपनी जगह सुरक्षित रखनी है। तो कई मोर्चों पर लड़ना है। विपक्षी एकता के अलावा मोदी-शाह को जोड़ी के सामने कई बड़े मुद्दे जो उनकी मुश्किलें बड़ा रहे हैं। जिसमें सबसे बड़ा मुद्दा जातीय जनगणना है। जहां ना बीजेपी को ना सिर्फ नीतीश और लालू की जोड़ी से मुकाबला करना होगा बल्कि राहुल गांधी भी इस मुद्दे को जोरशोर से उठा रहे हैं।
जातीय जनगणना के आंकड़ों के बाद बैकफुट पर बीजेपी
बिहार में नीतीश और तेजस्वी सरकार द्वारा जातीय जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक किए जाने के बाद से बीजेपी बैकफुट पर नजर आ रही है। बिहार में जहां पिछली बार बीजेपी को जेडीयू गठबंधन को सभी 40 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस बार स्थिति उसके उलट है। जहां जेडीयू ने बीजेपी का साथ छोड़ दिया है, तो वहीं जातीय जनगणना के बाद बीजेपी को अपने कोर वोट बैंक ओबीसी के छिटकने के आसार लग रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना के मुद्दे को बीजेपी के खिलाफ सबसे बड़े सियासी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। राहुल अपनी हर रैली में इन दिनों जातिगत जनगणना और आरक्षण की 50 फीसदी लिमिट को खत्म करने की मांग कर रहे हैं।
राहुल गांधी इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों में जिसकी जितनी आबादी -उतनी उसकी हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं। वह बिहार में जातिगत सर्वे जारी किए जाने के बाद कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जातिगत जनगणना कराने का वादा कर रहे हैं। जो मोदी और शाह की जोड़ी के लिए गले भी फांस बन गया है। बीजेपी को फिलहाल इस मुद्दे की कोई काट नजर नहीं आ रही है। जिसके चलते मोदी अब अपनी रैलियों में गरीबी का मुद्दा जोरशोर से उठा रहे हैं।
साउथ इंडिया में लगातार छोटे दलों का साथ छोड़ना
बीजेपी उत्तर भारत के बाद लगातार दक्षिण भारत में अपने जनाधार को बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कर्नाटक के अलावा बीजेपी की भी दक्षिण भारतीय राज्य में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। बीजेपी तमिलनाडु में एआईएडीएमके साथ मिलकर राज्य में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन पिछले दिनों अन्नाद्रमुक ने बीजेपी के साथ अपना गठबंधन खत्म करने का ऐलान कर दिया। जिससे तमिलनाडु में अपनी जनाधार बढ़ाने की बीजेपी कोशिशों को बड़ा धक्का लगा है।
ऐसा ही कुछ बीजेपी के साथ आंध्र प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है। 2014 में जहां बीजेपी टीडीपी को साथ लेकर दक्षिण के इस राज्य में घुसने की प्लानिंग कर रही थी। लेकिन 2019 आते-आते टीडीपी भी एनडीए से अलग हो गई। जिसके बाद बीजेपी वाईएसआर कांग्रेस के अधिक करीब आ गई। लेकिन आंध्र में तीसरी बड़ी ताकत पवन कल्याण की जनसेना पार्टी को माना जाता है। पवन कल्याण एनडीए के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान भी कर चुके थे। लेकिन आज उन्होंने एनडीए के साथ अपना रिश्ता तोड़ दिया है
गुरुवार को पवन कल्याण ने इसकी घोषणा की। उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगू देशम पार्टी का समर्थन किया है। बता दें कि पवन कल्याण ने पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलुगु देशम पार्टी के साथ गठबंधन किया था। दो दिन पहले ही पवन कल्याण ने जनसेना पार्टी के आगामी तेलंगाना विधानसभा चुनाव में 119 सीटों में से 32 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था।
महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में सहयोगियों के साथ छोड़ने का खतरा
दक्षिण के आलावा पश्चिम और उत्तर के राज्यों में भी बीजेपी की साथी पार्टियों के अलग होने का खतरा मंडरा रहा है। अगर हरियाणा की बात करें तो जेजेपी लगातार बगावती तेवर दिखा रही है। जेजेपी लोकसभा चुनावों में सीट शेयरिंग में सम्मानजनक सीटों की मांग कर रही है। वहीं बीजेपी उनकी मांग के मुताबिक सीटें देना नहीं चाह रही है। ऐसे में कई बार जेजेपी के नेता अपने बगावती तेवर दिखा चुके हैं। ऐसी ही कुछ स्थिति महाराष्ट्र में भी देखने को मिल सकती है। बीजेपी ने पिछले चुनाव में शिवसेना के साथ मिलकर राज्य की अधिकतर सीटों पर कब्जा जमाया था, लेकिन अब बीजेपी शिवसेना की टूट के बाद शिदें गुट औऱ एनपीसी के अजीत गुट के साथ सरकार में हैं।
अगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी इन दोनों दलों के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी। ऐसे में राज्य में सीट शेयरिंग को लेकर बात फंसेगी। अजीत पवार गुट और शिदें गुट अधिक से अधिक सीटें लेने की कोशिश करेंगे। जबकि बीजेपी 48 सीटों वाले इस राज्य में अधिकतम सीटों को अपने पास रखने की कोशिश करेगी। जिसके चलते राज्य में चल रहे इस गठबंधन में दरार की आशंका है।
OPS की लगातार तेज होती मांग
ओपीएस यानि ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग नौकरपेशा वर्ग में बहुत तेजी से उठ रही है। ओल्ड पेंशन बहाली को लेकर देश भर में राज्य और केंद्रीय कर्मचारी आंदोलनरत हैं, और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार और राज्यों की भाजपा सरकारें इसे लागू करने के मूड में नहीं दिख रहीं। वहीं कांग्रेस हरियाणा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पुरानी पेंशन स्कीम बहाल कर चुकी हैं।
जिसके चलते अन्य राज्यों में तेजी से इसकी मांग उठ रही है। दिल्ली में पिछले दिनों रामलीला मैदान में ओपीएस की मांग को लेकर लाखों कर्मचारी इकट्ठा हुए। इसे लेकर देश भर में अलग-अलग जगह प्रदर्शन किए जा रहे हैं। ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) अब एक चुनावी मुद्दा बन गया है।पुराने पेंशन की मांग को लेकर अगुवाई कर रहे विजय कुमार बंधु ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ओपीएस नहीं लागू करती है तो सरकारी कर्मचारी वोट से चोट देंगे।
भाजपा के पास वेस्ट यूपी में कोई साथी नहीं
सीटों के लिहाज से यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है। बीजेपी के यूपी में अलग अलग क्षेत्रों में छोटी पार्टियां सहयोगी हैं, लेकिन वेस्ट यूपी में बीजेपी के पास कोई साथी नहीं है। वहीं पिछले कुछ महीनों में यहां पर रालोद काफी तेजी के साथ अपने आप को मजबूत करने में जुटी हुई है। जिसके काट में बीजेपी ने वेस्ट यूपी को अलग स्टेट बनाने की मांग शुरू कर दी है।
संजीव बालियान ने पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने और मेरठ को इसकी राजधानी बनाने की मांग की है, तो इसके पीछे खास वोट बैंक को एकजुट रखने की सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
बीजेपी हर हाल में सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने प्रदर्शन को बेहतर से बेहतर रखना चाहती है। यही वजह है कि पिछले महीने ही पार्टी ने राज्य में जो संगठनात्मक बदलाव किए हैं, उसमें सबसे ज्यादा परिवर्तन पश्चिमी यूपी में ही किया गया है। यहां के 17 जिलाध्यक्षों को बदल दिया गया है।
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