91 सांसदों वाले ये 11 दल हैं, जिन्होंने बीजेपी और कांग्रेस से बनाई समान दूरी, अपने दम पर लड़ेंगे चुनाव
मंगलवार को देश के करीब 65 राजनीतिक दलों ने कांग्रेस या बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधनों का हाथ थामने का फैसला किया। लेकिन, कम से कम 11 और ऐसी बड़ी पार्टियां हैं, जिनके लोकसभा में 91 सांसद हैं और उन्होंने कोई भी गठबंधन का हिस्सा बनना मुनासिब नहीं समझा है या उनकी किसी से बात नहीं बन पाई।
मतलब ये सारे 11 राजनीतिक दल हैं, जो एनडीए और इंडिया गठबंधन से अलग चुनाव लड़ेंगे और उनके सांसदों की संख्या देखते हुए 2024 के लोकसभा चुनावों में उनकी प्रभावी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

तीन राज्यों से चुने जाते हैं 63 सांसद
खास बात ये है कि इन दलों में से तीन पार्टियां अभी तीन राज्यों में सत्ता में हैं और वहां से 63 सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचते हैं। ये तीनों राज्य हैं- तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा। इन तीनों राज्यों में पहले कभी कांग्रेस का दबदबा होता था। लेकिन, अब कांग्रेस का जनाधार पूरी तरह से खिसक चुका है और बीजेपी भी अपना आधार नहीं जमा सकी है।
91 सांसदों वाले 11 दल ये हैं
एनडीए या इंडिया गठबंधन से दूर रहने वाले जिन 11 पार्टियों की हमने चर्चा की है, वे हैं- वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), बीजू जनता दल (बीजेडी), भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम), तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी), शिरोमणि अकाली दल (एसएडी), एआईयूडीएफ, जेडीएस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी और शिरोमणि अकाली दल (मान)।
पूरी तरह से तटस्थ नहीं रही है किसी की राजनीति
हालांकि, ये सारे दल किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बने हैं। लेकिन, केंद्र में इनकी राजनीति पूरी तरह से तटस्थ भी नहीं रही है। मसलन, 2019 में आंध्र प्रदेश में बड़ी जीत दर्ज करने वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और ओडिशा में 2000 से सत्ता पर काबिज बीजेडी ने संसद में समय-समय पर बीजेपी सरकार का समर्थन किया है।
दूसरी तरफ तेलंगाना में सत्ताधारी बीआरएस है, जिसने बीजेपी-विरोधी विपक्षी दलों को एकजुट करने की पहल सबसे पहले शुरू की थी। लेकिन, कांग्रेस की एंट्री की वजह से उसने विपक्षी मोर्चे से खुद को दूर रखा है। अगर सीधे शब्दों में कहें तो इसका झुकाव भाजपा-विरोधी विपक्ष की तरफ नजर आता है।
अकेले चुनाव लड़ेगी बीएसपी
तीसरी बड़ी शक्ति मायावती की बीएसपी है, जिसके 10 सांसद 2019 के लोकसभा चुनाव में जीते थे। मायावती चार-चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और उनकी पार्टी ने 2024 में लोकसभा चुनाव और आने वाले तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में अकेले लड़ने का ऐलान किया है।
'मजबूर सरकार बने, मजबूत सरकार नहीं'
बसपा सुप्रीमो ने एक बयान जारी कर कहा है, 'हमें सुनिश्चित करना है कि केंद्र में मजबूर सरकार बने, मजबूत सरकार नहीं। सिर्फ इसी से सुनिश्चित होगा कि गरीबों, दलितों, आदिवासियों, उत्पीड़ितों और अल्पसंख्यकों के हितों को कायम रखा जाए, भले ही बीएसपी सत्ता में न आए।'
वैसे गठबंधनों की कवायद के बीच ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा है कि केंद्र अपनी योजनाओं में राज्य को पर्याप्त सहायता नहीं दे रहा है। उन्होंने बीजेडी सांसदों से कहा है कि गुरुवार से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में प्रदेश के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाएं।
'राजनीतिक अछूत' की तरह बर्ताव- एआईएमआईएम
जहां तक हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का सवाल है तो विपक्षी गठबंधन से दूर रखे जाने पर उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी से 'राजनीतिक अछूत' की तरह बर्ताव किया जाता है। एआईएमआईएम का हैदराबाद और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में अच्छा प्रभाव है और राज्य की सत्ताधारी बीआरएस के साथ एक अलग तरह की सियासी ट्यूनिंग दिखती रही है।
ओवैसी की पार्टी ने पिछले कुछ समय में महाराष्ट्र, बिहार, यूपी और कर्नाटक में अपना प्रभाव कायम किया है। पार्टी के प्रवक्ता वारिस पठान ने विपक्षी गठबंधन को यह कहकर निशाना बनाया है कि नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे और महबूबा मुफ्ती जैसे नेता उसके सहयोगियों में शामिल हैं, जिन्होंने पहले बीजेपी से गठबंधन किया है। लेकिन बेंगलुरु के कार्यक्रम से एआईएमआईएम को दूर रखा, जो हमेशा बीजेपी को हराने के लिए काम करती है। (इनपुट-पीटीआई)












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