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'बीमार महाराजा' का कोई ख़रीदार नहीं, अब आगे क्या?

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    एयर इंडिया
    Reuters
    एयर इंडिया

    केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कर्ज़ों के बोझ तले दबी एयर इंडिया के निजीकरण की राह पर बढ़ रही है, लेकिन इस 'बीमार महाराजा' को ख़रीदने में देसी, विदेशी किसी भी एयरलाइंस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

    एयर इंडिया के विनिवेश में विफलता मोदी सरकार की मुश्किलें और बढ़ा सकती है.

    कई कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर अपना खजाना भरने की मोदी सरकार की योजना को भी इससे झटका लग सकता है.

    सरकार ने पहले एयर इंडिया में हिस्सा नीलामी के लिए 14 मई तक बोलियां मंगाई थी. बाद में इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 मई कर दी थी.

    लेकिन सरकार ख़रीदारों की राह तकती रही और एक भी दावेदार आगे नहीं आया.

    नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 31 मई को ट्वीट किया, "वित्तीय सलाहकार ने सूचित किया है कि एयर इंडिया के रणनीतिक विनिवेश के लिए निकाले गए एक्सप्रेशन ऑफ़ इंट्रेस्ट के लिए कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है. इस मामले में आगे की कार्रवाई उचित तरीके से तय की जाएगी."



    https://twitter.com/MoCA_GoI/status/1002161580652580866

    सस्ती विमान सेवाओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा

    सरकार ने एयर इंडिया में 76 प्रतिशत हिस्सा बेचने का प्रस्ताव किया है. प्रस्ताव के मुताबिक एयर इंडिया का प्रबंधन नियंत्रण भी निजी हाथों में दिया जाएगा.

    सौदे के तहत सरकार एयर इंडिया के अलावा उसकी कम लागत वाली यूनिट एयर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया एयरपोर्ट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड को भी बेचने का इरादा रखती है.

    ऐसा नहीं है कि एयर इंडिया के पास जो विमान हैं वो बेहद ख़राब हालात में हों या फिर उनकी गुणवत्ता को लेकर भी कोई सवाल हों.

    ऊपर से ये भी सच है कि भारत में सस्ती विमान सेवाओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है और स्पाइसजेट, गो एयर, इंडिगो, एयर एशिया उड्डयन बाज़ार के बड़े खिलाड़ी हैं.

    हाल ही में आई एक रिपोर्ट में मुताबिक साल 2026 तक भारत का उड्डयन बाज़ार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन जाएगा.

    भारत में अब भी एयर इंडिया का बोलबाला है और पिछले साल इसके विमानों में सफर करने वालों की तादाद करीब 30 करोड़ थी.

    तो फिर क्यों किसी एयरलाइंस की एयर इंडिया को ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं है. तो उसकी कई वजहें हैं.



    एयर इंडिया का संचालन

    उड्डयन क्षेत्र की सलाहकार संस्था सेंटर फ़ॉर एशिया पैसेफिक एविएशन यानी कापा के मुताबिक महाराजा पर मार्च 2017 तक तकरीबन 700 करोड़ डॉलर यानी 48000 करोड़ रुपये का कर्ज़ था और सरकार चाहती है कि जो भी इसे ख़रीदे 500 करोड़ डॉलर का कर्ज़ वो चुकाए.

    कापा का ये भी अनुमान है कि एयर इंडिया को अगले दो सालों में 200 करोड़ डॉलर यानी साढ़े 13 हज़ार करोड़ रुपये का घाटा और हो सकता है.

    इसके अलावा एक्सप्रेशन ऑफ़ इंट्रेस्ट में ख़ासतौर पर कर्ज़ और कर्मचारियों को लेकर दी गई शर्तें भी संभावित ख़रीदारों के गले नहीं उतर रही हैं.

    उड्डयन क्षेत्र के विशेषज्ञ हर्षवर्धन बीबीसी से कहते हैं, "भारी भरकम कर्ज़ तो है ही, असली चुनौती तो इसके ऑपरेशन यानी कामकाज़ी खर्च को कम करना है. अगर मौजूदा परिस्थितियों में किसी को एयर इंडिया का संचालन करना हो तो इसका ऑपरेशन ख़र्च कम करने में ही उसके पसीने छूट जाएंगे."

    हर्षवर्धन का कहना है कि अगले दो-तीन साल में 25 से 30 हज़ार करोड़ रुपये उसे एयरलाइंस को ढर्रे पर लाने के लिए करने होंगे.

    यूनियंस का डर

    ख़रीदारों की महाराज़ा में दिलचस्पी न होने की एक और वजह हो सकती है और वो है दस हज़ार से अधिक कर्मचारियों की यूनियन.

    इधर, सरकार जिस तेज़ी से एयर इंडिया को बेचने की योजना बना रही थी, वहीं दूसरी ओर यूनियंस ने भी बढ़-चढ़कर इसका विरोध करना शुरू कर दिया था.

    15 अप्रैल को निजीकरण के बाद बड़ी छंटनी की आशंका ज़ाहिर करते हुए एयर इंडिया की तकरीबन 11 यूनियंस ने विरोध के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया और ट्विटर, फ़ेसबुक, यू-ट्यूब और इंस्टाग्राम पर एयर इंडिया की बिक्री के ख़िलाफ़ ग्राफ़िक्स और नारे लिखे.

    'सेव एयर इंडिया' नारे के साथ सोशल मीडिया पर कर्मचारियों का ये विरोध काफ़ी चर्चा में रहा.

    हर्षवर्धन कहते हैं, "कोई भी निवेशक इतना बड़ा निवेश करेगा तो कतई नहीं चाहेगा कि उसे यूनियंस के मोर्चे पर जूझना पड़े. भारत में इसके कई उदाहरण हैं कि भारी-भरकम पैसा लगाने के बाद निवेशक को उस सौदे से पीछे हटना पड़ा है."

    एयर इंडिया
    MANAN VATSYAYANA/AFP/Getty Images
    एयर इंडिया

    सरकारी दखल की आशंका

    ऐसा नहीं है कि एयर इंडिया को ख़रीदने को लेकर किसी तरह की ख़बरें ही न आई हों.

    घरेलू एयरलाइंस जेट एयरवेज और इंडिगो ने शुरुआती दिलचस्पी दिखाई, लेकिन बाद में ये निष्क्रिय हो गए.

    इंडिगो ने ये कहते हुए सौदे के लिए आगे बढ़ने से इनकार कर दिया कि वो तो सिर्फ़ एयर इंडिया का विदेशी ऑपरेशन ख़रीदने का इच्छुक है- लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है.

    क़तर एयरवेज़ ने भी शुरुआती संकेतों के बाद इस सौदे पर आगे न बढ़ने में ही अपनी भलाई समझी.

    श्रीलंका का उदाहरण

    हर्षवर्धन कहते हैं, "एयर इंडिया कोई दूसरी एयरलाइंस की तरह नहीं है. इसे राष्ट्रीय एयरलाइंस का दर्जा हासिल है. भले ही सरकार इसका 76 फ़ीसदी हिस्सा बेचने जा रही हो, लेकिन इस बात की आशंका बनी हुई है कि इसमें सरकार की दखलअंदाज़ी रहेगी ही."

    "फिर इस बात का भी क्या भरोसा कि मोदी सरकार के बाद केंद्र में अगर कोई दूसरी सरकार आती है तो वो इसे मुद्दा नहीं बनाएगी."

    हर्षवर्धन श्रीलंका में अमीरात एयरलाइंस का उदाहरण देते हैं. अमीरात एयरलाइंस ने 1998 में श्रीलंका एयरलाइंस में 43.6 फ़ीसदी हिस्सा ख़रीदा था. इस सौदे के लिए एयरलाइंस ने करीब 7 करोड़ डॉलर खर्च किए थे.

    अमीरात एयरलाइंस चाहती थी कि इसे मुनाफ़े में लाने के लिए प्रबंधन उसके हाथ में दिया जाए, लेकिन विदेशी निवेश को लेकर श्रीलंका के क़ानून और स्थानीय राजनीति उसके आड़े आ गई और अमीरात को मायूस होना पड़ा.

    अब आगे क्या?

    एयर इंडिया को पटरी पर लाने की कोशिशें पहली भी हुई हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. तो क्या मोदी सरकार इस मोर्चे पर आगे बढ़ेगी और अगर हां तो अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाएगी?

    हर्षवर्धन कहते हैं, "मौजूदा सरकार का कार्यकाल अब एक साल ही बचा है, ऐसे में वो इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे बढ़ेगी, इसकी गुंजाइश कम ही है. लेकिन अगर सरकार जिद पर ही अड़ी रही तो उसे विनिवेश की मौजूदा शर्तों में ढील देनी होगी. साथ ही ये भी भरोसा दिलाना होगा कि प्रबंधन के नियंत्रण में सरकार की दखलअंदाज़ी नहीं रहेगी."

    अभी के नियमों के मुताबिक किसी विदेशी कंपनी के लिए स्थानीय साझेदार का होना ज़रूरी है.

    विदेशी कंपनी किसी भी भारतीय एयरलाइंस में 49 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नहीं ख़रीद सकती.

    कोई बड़ी विदेशी कंपनी एयर इंडिया का नियंत्रण तभी अपने हाथ में ले सकती है, जब इस शर्त में बदलाव किया जाएगा.

    हालांकि कापा का मानना है कि एयर इंडिया का निजीकरण ही इसके बचे रहने की आख़िरी उम्मीद है.

    कापा ने हाल ही में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, "अगर विनिवेश की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी नहीं की जाती तो एयरलाइंस (एयर इंडिया) बंद हो सकती है, बशर्ते की सरकार करदाताओं की अरबों की कमाई एयरलाइंस को बचाने में न झोंक दे."

    एयर इंडिया के पतन की कहानी

    एयर इंडिया का पतन 2007 में इंडियन एयरलाइंस के साथ विलय के साथ शुरू हुआ.

    नौकरशाही के ख़राब फ़ैसलों और कर्ज़ में डूबे होने के बावजूद बोइंग विमानों के ख़रीदने के कारण इसकी बैलेंस शीट बिल्कुल चरमरा गई.

    साल 2018 में एयर इंडिया पर 52 हज़ार करोड़ रुपये का भारी कर्ज है जबकि घरेलू उड़ानों में इसकी हिस्सेदारी 2014 के 19 फ़ीसदी से घट कर 13.3 फ़ीसदी पर पहुंच गई है.

    सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने एयरलाइंस की परिसंपत्तियों और संचालन के विनिवेश की रूपरेखा तैयार की है.

    एयरलाइंस के संचालन के अतिरिक्त इसकी तीन और सहायक कंपनियां हैं.

    एयर इंडिया इंजीनियरिंग सर्विस लिमिटेड, यह रखरखाव और मरम्मत का प्रबंध करती है.

    एयर इंडिया ट्रांसपोर्ट सर्विस लिमिटेड, जो ग्राउंड हैंडलिंग करती है और एलायंस एयर जो छोटे शहरों के लिए उड़ानों का संचालन करती है.

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    BBC Hindi
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    English summary
    There is no buyer of sick king now what

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