पश्चिम बंगाल में तृणमूल और भाजपा की जंग, सीन से कहां ग़ायब है लेफ़्ट?
बुधवार को कॉम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्कसिस्ट) यानी सीपीएम ने एक दिन पहले अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के ख़िलाफ़ रैली निकाली. मैं रैली शुरू होने से ज़रा पहले पहुँच गया और लोग इकट्ठा होना शुरू हो चुके थे.
मेरी मुलाक़ात एक रिटायर्ड शिक्षिका से हुई. नाम ना बताने की शर्त पर उन्होंने हिंसा पर अपनी राय प्रकट की. उन्होंने कहा, "हिंसा पर सभी पार्टियाँ सियासत कर रही हैं. भाजपा मज़लूम बनकर, तृणमूल कांग्रेस बंगाल की संस्कृति की रखवाली बनकर और वामपंथी मोर्चा हिंसा का विरोधी बन करके सियासत कर रही हैं."
जब भीड़ बढ़ी तो वो बूढ़ी महिला टीचर मुझे दोबारा नज़र नहीं आयीं. लेकिन उनकी बात में वज़न लगा.
वामपंथी मोर्चे की रैली में बेशुमार लोग शामिल थे. क्या ये सीपीएम के लिए एक मौक़ा था ये दिखाने का कि प्रदेश में वो आज भी एक मज़बूत संगठन है? क्या ये उनका लोगों को पैग़ाम था कि चुनावी मौसम में उन्हें हल्के में न लिया जाए? क्या ये वामपंथी दलों को राज्य में दोबारा ज़िंदा करने की एक कोशिशों की एक कड़ी थी?
प्रदेश में आम धारणा ये है कि पार्टी की सियासी मौत हो चुकी है. लाल झंडे झुक चुके हैं. कामरेड लेनिन और स्टालिन को भूल चुके हैं. इसके कार्यकर्ताओं की संख्या काफ़ी घटी है.
लेफ़्ट मोर्चे ने बंगाल मैं 34 साल तक राज किया. इसके बाद ममता बनर्जी ने 2011 के विधानसभा चुनाव में इसे करारी शिकस्त दी. पार्टी चारों ख़ाने चित हो गयी. यहाँ तक कि 2014 के आम चुनाव में इसने केवल दो सीटें जीती. पार्टी का वोट शेयर घट कर 17 प्रतिशत हो गया.
वामपंथी नेताओं से मिलने मैं कोलकाता में सीपीएम के कार्यालय पहुँचा. एक ज़माने में ये दफ़्तर नेताओं, कार्यकर्ताओं और फ़रयादियों से भरा रहता था. दफ़्तर के बड़े हॉल में सियासी बहस और बैठकें हुआ करती थीं. लेकिन यहाँ अब कोई चहल-पहल नहीं है. दफ़्तर में सन्नाटा सा है. कुछ स्टाफ़ अपने कमरों में काम ज़रूर कर रहे थे लेकिन दफ़्तर बेजान सा लग रहा था. हाँ कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और ज्योति बसु की फ्रेम की हुई तस्वीरें और पेंटिंग्स अब भी दीवारों की सजावट का हिस्सा थीं.
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पार्टी के कार्यकर्ता कहते हैं वो राज्य में कमज़ोर ज़रूर हुए हैं लेकिन अब भी ज़िंदा है. सीपीएम के एक युवा कार्यकर्ता कहते हैं, "ये कहना सही नहीं है कि हम राज्य से मिट चुके हैं. हमारी संख्या कम ज़रूर हुई है लेकिन हमारा वजूद प्रदेश के हर ज़िले में अब भी है. हमारा संगठन मज़बूत है. वो ये भी दावा करते हैं कि उनकी पार्टी में एक नयी जान फूंकी गयी है, "फ़रवरी में हमारी रैली मोदी और ममता की रैलियों से कहीं बड़ी थी."
आसनसोल शहर से आयी कार्यकर्ता मीनाक्षी मुखर्ज़ी सिर पर सीपीएम की लाल रंग की एक टोपी लगाए बड़े आत्म विश्वास से कहती हैं कि युवाओं में पार्टी फिर से लोकप्रिय हो रही है, "हमारे साथ युवा हमेशा से जुड़े रहे हैं और आज भी वो हम से जुड़ रहे हैं". वो आगे बोलीं, " हम ने महंगाई, बेरोज़गारी और संप्रदायिकता के ख़िलाफ़ पिछले दस सालों में कई बार आंदोलन किया जिस में लाखों लोग शामिल हुए"
वामपंथी मोर्चे ने राज्य की 42 सीटों में से 40 पर अपने उमीदवार खड़े किये हैं. उनमे से एक विकास रंजन भट्टाचार्य हैं जो चुनावी प्रचार में जाने से पहले अपने दफ़्तर में इस साधारण तरीके से बैठे थे कि लगा वो केवल एक साधारण कार्यकर्ता हैं. उनके आगे-पीछे कोई नहीं था. वो अपने मोबाइल फ़ोन पर ममता बनर्जी की सभाओं के वीडियो क्लिप्स देख रहे था. उनके पीछे लेनिन की एक आदमकद पेंटिंग दीवार से लटकी थी. निगाहें मोबाइल फ़ोन पर टिकी थीं.
मीडिया की जगमगाहट से परे, जादवपुर लोकसभा चुनावी क्षेत्र से उम्मीदवार विकास दफ़्तर से निकलते हैं, अपने दो साथियों के साथ गाड़ी में बैठ कर हाउसिंग कॉलोनी में प्रचार के लिए निकल जाते हैं. वो घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करते हैं. प्रचार के दौरान कोई धूमधाम और नारेबाजी नहीं. सिर पर टोपी लगाए और साधारण वस्त्र पहने उन्होंने हाउसिंग सोसाइटी के निवासियों की समस्याएं सुनीं और चुनाव जीतने पर उनकी मदद करने का वादा किया.
कोलकाता के मेयर रह चुके विकास की प्रतिद्वंद्वी टीवी स्टार और तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मिमी चक्रवर्ती हैं.
मिमी के बारे में वह कहते हैं, "राजनीति एक गंभीर व्यवसाय है. चमक-दमक वाली दुनिया के लोगों को चुनाव के मैदान में उतारना वोटरों का अपमान है".
लेकिन वो किसे अपना खास विरोधी मानते हैं? इसके जवबा में वह कहते हैं, "बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस दोनों को ही.''
वह कहते हैं कि दोनों पार्टियां आरएसएस की लिखी स्क्रिप्ट पर काम कर रही हैं. आरएसएस ने बंगाल के समाज को हिन्दू-मुस्लिम में बांटने की कोशिश की है. आरएसएस को राज्य में टीएमसी ने जगह दी है. जब हम सत्ता में थे तो आरएसएस कुछ महदूद इलाक़ों में सिकुड़ा था"
लेकिन ममता बनर्जी और टीएमसी उम्मीदवार मिमी जब सभाएं करती हैं तो वामपंथी उम्मीदवार का ज़िक्र भी नहीं करतीं. ऐसा लगता है वो विकास को गंभीरता से नहीं लेतीं. विश्लेषक कहते हैं कि एक दशक तक सत्ता से बाहर रहने के बावजूद पार्टी ने खुद को दोबारा ज़िंदा करने के लिए ठोस क़दम नहीं उठाये हैं
प्रोफ़ेसर सब्यसाची बसु रॉय चौधरी रबिन्द्र भारती विश्विद्यालय के कुलपति हैं. उनका कहना है कि सीपीएम की वापसी के दिन अभी नहीं आये हैं. वह कहते हैं, "पिछले आठ सालों में सीपीएम युवा चेहरे लेकर नहीं आ पायी है. पार्टी में आज भी वही पुराने चेहरे नज़र आते हैं, जैसे कि सूर्यकांत मिश्र और बिमान बोस. और सुजान चक्रवर्ती जो पार्टी में सब से नौजवान चेहरा हैं वो भी 60 साल के हैं."
लेकिन पार्टी कहती है युवाओं को जोड़ने के लिए 2015 से प्रदेश भर में एक अभियान चलाया जा रहा है. बिमान बोस पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं वामपंथी मोर्चे के शक्तिशाली पोलिटब्युरो के एक सदस्य. वो कहते हैं पार्टी ने आधुनिकरण के अंतर्गत सोशल मीडिया पर अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं. इसके ज़रिये युवाओं से जुड़ने की कोशिश की है.
लेकिन उनसे एक लंबी बातचीत से महसूस हुआ उन्हें अपनी कमियों का एहसास नहीं है. पहले उन्होंने अपने पतन की वजह मीडिया की अनदेखी बतायी, "मीडिया केवल दक्षिणपंथी पार्टियों की खबरें देता है और वामपंथ की अनदेखी करता है ".
पार्टी के पतन की दूसरी वजह थी चुनावी प्रणाली, "2011 में जो हम हारे वो चुनाव सही था. उसके बाद सही चुनाव कभी नहीं हुआ इसलिए हम जीत नहीं सके"
पिछले चुनाव में पार्टी ने दो सीटें हासिल की थीं. इस बार ये 10 सीटें हासिल करने का दावा करती है. लेकिन कई विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं.
शुभोजित बागची, "द हिन्दू" अख़बार से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो सीपीएम के 10 सीटें हासिल करने के दावे पर कहते हैं, "2011 से पार्टी का वोट शेयर घटता आया है. इस चुनाव में भी कम हो सकता है" बागची के अनुसार वामपंथियों की हार के कारण राज्य की सियासत में एक वैक्यूम पैदा हुआ जिसे बीजेपी ने भरना शुरू कर दिया. प्रोफ़ेसर चौधरी के अनुसार सीपीएम को शायद इस बार एक सीट भी न मिले.
लेकिन सीपीएम के नेता कहते हैं इस बार सियासी विश्लेषक ग़लत साबित होंगे. बोस कहते हैं, "हमारी सीट अगर न भी बढ़े हमारा वोट शेयर ज़रूर बढ़ेगा" लेकिन राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने के लिए सीपीएम का मुक़ाबला इस बार बीजेपी से है.
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