Telangana Elections: उत्तरी तेलंगाना में कांग्रेस पकड़ मजबूत, BRS की बढ़ी टेंशन, जानिए वजह
तेलंगाना चुनाव के बीच एक्सपर्ट्स इस बार उत्तरी तेलंगाना में बदले राजनीतिक समीकरण की ओर संकेत दे रहे हैं। हालांकि वर्ष 2004 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान में उत्तरी तेलंगाना क्षेत्र की 26 विधानसभा सीटों में से 17 सीटें बीआरएस ने जीती थीं। लेकिन अब यहां कांग्रेस भी अपनी पकड़ मजबूत कर रही है।
उत्तरी तेलंगाना में कांग्रेस की पैठ बनाने की कोशिश से बीआरएस बढ़त पर नजर आ रही है। हलांकि वर्ष 2004 से ये क्षेत्र बीआरएस का गढ़ बना हुआ था। बीआरएस इस बात को लेकर चिंतित दिख रही है कि कांग्रेस को बढ़त बनाने से कैसे रोका जाए।

बीआरएस की चिंता इसलिए भी है क्योंकि 2014 और 2018 में बीआरएस कुछ जिलों से पूरी तरह साफ हो गई थी। इसके बाद वर्ष 2004 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बीआरएस ने आदिलाबाद में तीन विधानसभा सीटें, निजामाबाद में तीन, करीमनगर में चार और वारंगल में सात सीटें खो दी थी। वहीं खम्मम में बीआरएस पूरी तरह साफ हो गई थी।
वहीं 2009 से 2014 के बीच उपचुनावों में उन विधायकों अधिक सफलता मिली थी जो टीडीपी और कांग्रेस छोड़कर बीआरएस में शामिल हुए थे। 2009 में बीआरएस ने टीडीपी, सीपीआई और सीपीएम के साथ महाकुटमी के क्षेत्र में 45 में से केवल 10 विधानसभा सीटें जीत हासिल की थी।
वहीं कांग्रेस ने गठबंधन मिलकर 2009 के चुनाव में मेडक में चार, हैदराबाद में दो और रंगारेड्डी, महबूबनगर और नलगोंडा जिले से एक-एक सीट सहित 26 सीटें हासिल कीं। इस बार अब कांग्रेस उत्तरी तेलंगाना में बीआरएस के गढ़ों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव से पहले दक्षिण में अपनी स्थिति में सुधार करना चाहती है। दावा किया जा रहा है कि बीआरएस की लगातार 10 वर्षों तक सत्ता रहने के बाद एंटी इनकंबेंसी की संभावनाएं हैं, जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को होने जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी नेता सोच रहे हैं कि केसीआर उस समर्थन को वापस पाने के लिए कौन सा मंत्र अपनाएंगे जो कांग्रेस के हाथ से खिसक गया है। ऐसे में दावा किया कि जा रहा है कि बीआरएस को इस बार सबसे कठिन चुनावी लड़ाई का सामना कर रही है।












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