तेलंगाना: पीएम मोदी की हैदराबाद सभा में बीजेपी चल सकती है सबसे बड़ा चुनावी दांव, विशाल दलित वोट बैंक पर नजर
हैदराबाद में शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक जनसभा होने वाली है। पीएम मोदी के इस कार्यक्रम को लेकर राज्य में सियासी अटकलों का बाजार गरम है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मडिगा जाति के तीन दशक पुरानी मांग पर मुहर लगा सकते हैं। यह एक तेलुगू दलित जाति है, जो अनुसूचित जाति के आरक्षण में उपवर्गीकरण की मांग कर रही है।
तेलंगाना के दलित समाज में मडिगा जाति की आबादी सबसे ज्यादा यानि 60% है। लेकिन, इनकी शिकायत है कि इन्हें अनुसूचित जाति के तहत मिलने वाले आरक्षण का पूर्ण लाभ नहीं मिलता और कोटे का ज्यादातर हिस्सा माला जाति के हिस्से में चला जाता है, जिनकी आबादी इनके मुकाबले बहुत ही कम है।

20 से 25 सीटों पर निर्णायक भूमिका में है
मडिगा वोट बैंक तेलंगाना के चुनाव में कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह दलितों में तो बहुसंख्यक हैं ही, अन्य चार-पांच जाति समूहों में भी दूसरे नंबर पर हैं। अगर चुनावी नजरिए से देखा जाए तो राजनीति के जानकारों के अनुसार राज्य की 20 से 25 विधानसभा क्षेत्रों में इनका वोट निर्णायक होता है।
1994 से ही चल रहा है आंदोलन
'मडिगा और उपवर्गीकरण महासभा' का आयोजन मडिगा आरक्षण पोराटा समिति (MRPS) कर रही है। वह 1994 से ही इसकी लड़ाई लड़ रही है। टीओआई ने एक सूत्र के हवाले से लिखा है कि, 'बीजेपी नेतृत्व सैद्धांतिक तौर पर इस वर्गीकरण के लिए सहमत है, क्योंकि इसके लिए संसद से कानून पास कराने की आवश्यकता है।'
2018 में किया था कांग्रेस का समर्थन
अगर मडिगा जाति ने तेलंगाना विधानसभा चुनावों में भाजपा के समर्थन का ऐलान कर दिया तो इससे न सिर्फ पार्टी त्रिकोणीय मुकाबले में अभी से ज्यादा अच्छी तरह से रेस में आ सकती है, बल्कि यह सत्ताधारी बीआरएस की दलित बंधु योजना की भी काट साबित हो सकती है। 2018 के चुनावों में एमआरपीएस ने कांग्रेस का ना सिर्फ समर्थन किया था, बल्कि उसके लिए प्रचार में भी भाग लिया था।
पीएम मोदी के कार्यक्रम के आधार पर ही करेंगे फैसला
मडिगा की मांगों पर सकारात्मक ऐलान को लेकर अटकलें इसलिए लग रही हैं, क्योंकि पिछले महीने ही एमआरपीएस के संस्थापक मंदा कृष्णा मडिगा ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी और समुदाय की इस मांग को औपचारिक तौर पर उनके सामने रखा था। उनका दावा था के भाजपा से उनकी मांगों पर सकारात्मक जवाब मिला।
उन्होंने बताया, 'हमें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री जनसभा में अनुसूचित जातियों के वर्गीकरण की घोषणा करेंगे। शनिवार की सभा में क्या निकलता है, हमारे समर्थन का फैसला इसी पर निर्भर करता है। '
मडिगा आबादी कई सीटों पर भारी
वहीं इस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद नरेश मडिका का कहना है कि राज्य में 46 लाख मडिगा हैं। जबकि, समग्र कुटंब सर्वे के मुताबिक माला जाति की आबादी सिर्फ 21 लाख है। उनके मुताबिक एससी के लिए आरक्षित कई सीटों पर उनकी जातियों के वोट 36,000 से लेकर 65,000 के बीच है। उनका कहना है कि परकला और गडवाल जैसी सामान्य सीटों पर भी हम 30 से 35 हजार की संख्या में हैं।
आरक्षण का ज्यादा फायदा चाहते हैं मडिगा
हालांकि, मडिगा जाति के नेताओं का कहना है कि उनकी ये कोशिशें मडिगा और माला जाति के बीच दरार पैदा करने के लिए नहीं हैं। मसलन, नरेश के मुताबिक,'हमारी लड़ाई मालाओं के खिलाफ नहीं है, बल्कि अपने वजूद के लिए है। उदाहरण के लिए उस्मानिया यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जाति के कुल प्रोफेसरों में 71 माला जाति से हैं, जबकि सिर्फ 21 ही मडिगा हैं। हमारी आबादी 60% है, फिर भी हमें फायदा कम मिलता है।'
संयुक्त आंध्र प्रदेश के दौरान चंद्रबाबू नायडू सरकार ने इस दिशा में कदम भी उठाया था। लेकिन, 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक लगा दी थी। अब मडिगा चाहते हैं कि मोदी सरकार संसद के रास्ते उनका समाधान निकाले, ताकि उन्हें नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में पर्याप्त हिस्सेदारी मिल सके।












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