SC Rooh Afza Verdict: रूह अफजा शरबत या फ्रूट ड्रिंक? हमदर्द कंपनी की पहचान पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Supreme Court Rooh Afza Verdict: पीढ़ियों से भारतीय परिवारों के लिए गर्मियों की राहत का दूसरा नाम रहा रूह अफ़ज़ा (Rooh Afza) रहा है। इफ्तार की मेज हो या गर्मियों की दोपहर, रूह अफ़ज़ा की लाल रंगत दशकों से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है।
अब देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने इसके 'Beverage Identity' (पेय पहचान) पर मुहर लगा दी है।बुधवार, 25 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि रूह अफ़ज़ा केवल एक 'शरबत' नहीं, बल्कि टैक्स कानूनों के तहत एक 'फ्रूट ड्रिंक' है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने रूह अफ़ज़ा बनाने वाली कंपनी हमदर्द (वक्फ) लैबोरेटरीज की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें इसे एक 'अनक्लासिफाइड' वस्तु माना गया था।
Rooh Afza tax case पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
जस्टिस बी.वी. नागरथना और आर. महादेवन की पीठ ने माना कि रूह अफ़ज़ा अपनी प्रकृति, संरचना और उपयोग के आधार पर एक फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट है। अदालत ने कहा कि यह पेय फलों से जुड़े घटकों पर आधारित है, पानी या दूध में मिलाकर पीने के लिए बनाया जाता है और आम उपभोक्ता इसे एक फल-आधारित पेय के तौर पर ही समझता है।
कोर्ट ने हमदर्द द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2018 के फैसले और टैक्स विभाग के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें रूह अफ़ज़ा को 'अनक्लासिफ़ाइड प्रोडक्ट' मानते हुए 12.5% वैट लगाने को सही ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि उत्तर प्रदेश वैट अधिनियम (UPVAT) के तहत रूह अफ़ज़ा को शेड्यूल-II (पार्ट-A) की एंट्री 103 के कैटेगरी में ही रखा जाएगा। इस श्रेणी में आने पर 1 जनवरी 2008 से 31 मार्च 2012 के लिए इस पर केवल 4% वैट लगेगा।
Rooh Afza Fruit Drink Classification को लेकर सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े तर्क
अदालत ने टैक्स विभाग के तर्कों को खारिज करते हुए 'कॉमन सेंस' और 'बिजनेस लॉजिक' को प्राथमिकता दी:
'कॉमन पारलेंस टेस्ट' (आम बोलचाल का नियम): कोर्ट ने कहा कि जब कानून में 'फ्रूट ड्रिंक' की परिभाषा स्पष्ट न हो, तो यह देखना चाहिए कि आम जनता और बाजार इसे कैसे समझता है। रूह अफ़ज़ा को व्यावसायिक रूप से हमेशा फलों पर आधारित पेय के रूप में देखा गया है।
'एसेंशियल कैरेक्टर टेस्ट' (मूल विशेषता): कोर्ट ने माना कि भले ही रूह अफ़ज़ा में 80% शुगर सिरप (चाशनी) हो, लेकिन वह केवल एक 'कैरियर' (माध्यम) और प्रिजर्वेटिव का काम करती है। रूह अफ़ज़ा को उसकी विशिष्ट सुगंध, स्वाद और पहचान उसके फलों के अर्क और हर्बल डिस्टिलेट्स से मिलती है।
रेगुलेटरी बनाम फिस्कल कानून: बेंच ने साफ किया कि खाद्य सुरक्षा (FSSAI) के नियम गुणवत्ता नियंत्रण के लिए होते हैं, वे टैक्स कानूनों (Fiscal Statutes) की परिभाषा को तब तक नियंत्रित नहीं कर सकते जब तक टैक्स कानून में ऐसा स्पष्ट न लिखा हो।
इस पूरे विवाद की जड़ क्या थी?
यह कानूनी लड़ाई उत्तर प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स (UPVAT) एक्ट के तहत टैक्स दर को लेकर थी। टैक्स विभाग का कहना था कि चूंकि रूह अफ़ज़ा में केवल 10% फ्रूट जूस (8% अनानास और 2% संतरा) है इसलिए क्या इशे 'फ्रूट ड्रिंक' माना जा सकता है।
टैक्स विभाग ने खाद्य सुरक्षा नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि 'फ्रूट सिरप' कहलाने के लिए कम से कम 25% फलों का रस होना चाहिए। इसी आधार पर विभाग ने इसे उच्च टैक्स वाली श्रेणी में डालने की कोशिश की। वहीं इसे बनाने वाली हमदर्द कंपनी का तर्क था कि रूह अफ़ज़ा एक 'फ्रूट ड्रिंक' या 'प्रोसेस्ड फ्रूट प्रोडक्ट' है, जिस पर 4% की रियायती टैक्स दर लगनी चाहिए।
कोर्ट ने क्यों खारिज की दलील
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से नकार दिया। पीठ ने स्पष्ट कहा कि फूड सेफ्टी कानूनों के तहत की गई परिभाषाएं टैक्स कानून पर अपने-आप लागू नहीं होतीं, जब तक कि टैक्स कानून खुद उन्हें अपनाने की बात न करे। अदालत ने कहा कि हर फाइनेंशियल लॉ की व्याख्या उसकी अपनी भाषा और उद्देश्य के अनुसार की जानी चाहिए। कोर्ट ने माना कि भले ही रूह अफ़ज़ा में चीनी सिरप की मात्रा ज्यादा हो, लेकिन वह केवल एक कैरीयर और प्रिज़र्वेटिव का काम करता है। पेय का असली स्वाद, खुशबू और पहचान फलों के रस और हर्बल डिस्टिलेट्स से आती है। इसलिए केवल मात्रा के आधार पर वर्गीकरण करना गलत होगा।
कंपनी को मिलेगी ₹2.6 करोड़ की राहत
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 से 2012 के बीच के असेसमेंट पीरियड के लिए यह फैसला सुनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे हमदर्द लैबोरेटरीज को अतिरिक्त जमा किए गए टैक्स (लगभग ₹26 मिलियन यानी 2.6 करोड़ रुपये) का रिफंड दें या उसे एडजस्ट करें।
अदालत ने यह भी कहा कि रेजिड्यूअरी एंट्री (अनक्लासिफ़ाइड श्रेणी) का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब किसी उत्पाद को किसी भी विशिष्ट श्रेणी में उचित रूप से न रखा जा सके। इस मामले में टैक्स विभाग यह साबित नहीं कर सका कि रूह अफ़ज़ा को 'फ्रूट ड्रिंक' नहीं माना जाता। न तो कोई बाजार सर्वे पेश किया गया और न ही उपभोक्ता धारणा से जुड़ा कोई ठोस सबूत।
दूसरे राज्यों का उदाहरण भी अहम
पीठ ने ध्यान दिलाया कि दिल्ली, गुजरात, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों में समान वैट प्रावधानों के तहत रूह अफ़ज़ा को पहले ही फ्रूट-आधारित पेय मानकर 4-5% की रियायती दर पर टैक्स लगाया गया है।
हालांकि वैट राज्य का विषय है, लेकिन अदालत ने कहा कि इस तरह की एकरूपता बाजार की सामान्य समझ को दर्शाती है। इस फैसले को न सिर्फ रूह अफ़ज़ा के लिए, बल्कि टैक्स वर्गीकरण से जुड़े कई अन्य मामलों के लिए भी मिसाल माना जा रहा है।
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