युद्ध में अपने अंग गंवाने वाले सैनिक, सरकार को लगने लगे बोझ!

नई दिल्‍ली। देश में सरकार के पास इतना पैसा है कि वह हजारों कराेड़ों रुपए खर्च करके मूर्तियां बनवा सके लेकिन उसके पास इतना पैसा नहीं है कि वह उन सैनिकों को उनका वाजिब हक दे सके, जिन्‍होने देश की रक्षा करते हुए अपने अंग गंवा दिए। वह सरकार को बोझ लगने लगे हैं इतना बड़ा बोझ कि उससे बचने के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची।

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'वह अपनी ड्यूटी पर थे और सीमा पर तैनात थे। उनके बलिदान की वजह से ही आज हम और आप यहां पर हैं। क्‍या आप उनके लिए इतना भी नहीं कर सकते हैं।'सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की एक याचिका को ठुकराते हुए यह बात कही। यह याचिका सेना के उन एक्‍स सर्विसमेन से जुड़ी हुई थी जो अपनी विकलांगता पेंशन के लिए लड़ाई लड़ रहे थे।

सरकार ने दिया था खजाने पर बोझ का हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर न सिर्फ केंद्र को फटकार लगाई बल्कि उसे इस बात का अहसास भी कराया कि एक सैनिक कभी किसी देश के लिए बोझ नहीं होता है। सरकार ने आर्म्‍ड फोर्सेज ट्रिब्‍यूनल (एएफटी) के उस फैसले के

खिलाफ याचिका दायर की थी जिसमें करीब 15,000 सैनिकों को मिल रही पेंशन में थोड़ा इजाफा करने की बात कही गई थी। यह 15,000 सैनिक वे सैनिक हैं जिन्‍होंने देश की सेवा करते हुए अपने अंगों को गंवा दिया।

बुधवार को चीफ जस्टिस एचएल दत्‍तू की बेंच ने सरकार के उस आग्रह पर अपना असंतोष जाहिर किया जिसमें बार-बार पूर्व सैनिकों को मिलने वाले फायदे में इजाफे की बात से इंकार किया जा रहा था। सरकार का कहना था कि अगर यह फैसला लिया जाता है तो उस पर 1500 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा।

मेमोरियल से बेहतर उनका फायदा बढ़ाएं

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि सरकार कम से कम अपने उन सैनिकों के लिए बजट तो रख ही सकती है जो हर रोज अपने देश के लिए शहीद हो रहे हैं।

ऐसे में उन मेमोरियल्‍स और उन पोस्‍टरों का भी क्‍या फायदा जो सरकार पूर्व सैनिकों या फिर शहीदों को सलाम करने के नाम पर बनवा रही है और इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट तक चली आई। सरकार को उन्‍हें बहुत पहले ही इस पर बड़ा कदम उठाते हुए उन्‍हें इसकी अदायगी कर देनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही साफ कर दिया कि सरकार की ओर से कोई भी लॉ ऑफिसर इस अपील पर बहस नहीं करेगा।

सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानना पड़ेगा। इसके साथ ही बेंच ने एएफटी के इस मुद्दे पर दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई करीब 880 अपीलों को भी खारिज कर दिया गया।

कब का है मामला

इंडियन एक्‍सप्रेस की खबर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट इस फैसले के बाद अब सेना के पूर्व वाइस चीफ लेफ्टिनेंट विजय ओबरॉय को भी फायदा मिल सकेगा जिन्‍होंने वर्ष 1965 में हुई भारत-पाक की जंग में अपना एक पैर गंवा दिया था।

वर्ष 2001 तक वह 70 प्रतिशत अपंगता के साथ बिना किसी वित्‍तीय मदद के सेना को अपनी सेवाएं दे रहे थे। ओबेरॉय की ओर से वर्ष 2010 में एएफटी की चंडीगढ़ बेंच में एक याचिका दायर की गई।

इसके तहत उन्‍होंने हर अपंग सैनिक को 'ब्रॉड बैंडिंग' के तहत उसके हिस्‍से का फायदा देने की मांग की जो ड्यूटी के दौरान अक्षम हो गए थे। ओबेरॉय ने अपनी याचिका में सैनिकों को उस दिन से फायदा देने की बात कही थी जब से उन्‍होंने अपनी सर्विसेज खत्‍म की हैं।

क्‍या है 'ब्रॉड ब्रैंडिंग

  • ब्रॉड बैंडिंग नीति के तहत तीन बैंड के अंतर्गत अपंगता का निर्धारण किया जाता है।
  • 50 प्रतिशत से ज्‍यादा अपंग व्‍यक्ति को 50 प्रतिशत फायदा मिलता है।
  • 51 से 75 प्रतिशत अपंगता के तहत उसे 75 प्रतिशत।
  • 76 से 100 प्रतिशत अपंगता में उसे 100 प्रतिशत का फायदा मिलता है।
  • इस नीति को किसी भी तरह की दुविधा से बचने और अपंगता के निर्धारण में होने वाली मुश्किलों से बचने के लिए लाया गया था।
  • ब्रॉड बैंडिंग को रक्षा मंत्रालय की ओर लागू किया था।
  • इसके फायदे सिर्फ उन्‍हीं को मिलते हैं जो मेडिकल तौर पर अनफिट हो चुके होते हैं और सरकार की ओर से जिनकी सेवाएं समाप्‍त कर दी जाती हैं।
  • यह उन लोगों को नहीं मिलता है जो अपनी पूरी सर्विस के बाद रिटायर होते हैं।
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