Supreme Court ने लिव इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण की मांग ठुकराई, याचिका खारिज
Supreme Court ने लिव इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण की मांग वाली पीआईएल खारिज कर दी है। फैसला चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच में हुआ।

Supreme Court ने Live-In Relationships Registration की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। देश की सबसे बड़ी अदालत में दायर याचिका में मांग की गई थी कि देश भर में लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाया जाए। हालांकि, शीर्ष अदालत में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने याचिका खारिज कर दी।
क्या लिव इन रिलेशनशिप को रोकने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस (CJI) डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने आश्चर्य जताया कि क्या याचिकाकर्ता अपनी सुरक्षा की आड़ में लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण की मांग कर रहा है। पीठ ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता लिव इन रिलेशनशिप को रोकने की कोशिश कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
सोमवार को मामले की सुनवाई की शुरुआत में ही CJI डी वाई चंद्रचूड़ ने पूछा, "यह क्या है? लोग यहां कुछ भी लेकर आ जाते हैं? हम ऐसे मामलों पर फाइन लगाना शुरू कर देंगे।" उन्होंने सख्त लहजे में पूछा कि लिव इन रिलेशनशिप का पंजीकरण किसके साथ कराने की मांग की जा रही है? क्या केंद्र सरकार के साथ? उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों से क्या लेना-देना है?
वकील ने दायर की याचिका
शीर्ष अदालत ने कहा, "याचिका बिना सोचे समझे दायर की गई" (just a hare brained petition) है इसलिए कोर्ट इसे खारिज कर रही है। बता दें कि याचिका एडवोकेट ममता रानी द्वारा दायर की गई थी और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण के लिए नियम बनाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने की प्रार्थना की गई थी।
श्रद्धा वॉकर मामले का जिक्र क्यों किया
याचिका में कहा गया, माननीय न्यायालय लिव-इन पार्टनर्स का रक्षक रहा है और कोर्ट ने कई ऐसे फैसले पारित किए हैं, जिनसे लिव-इन पार्टनर को सुरक्षा मिलती है। चाहे वह महिला हों, पुरुष हों या यहां तक कि ऐसे रिश्ते से पैदा हुए बच्चों को भी सुरक्षा मिलती है। याचिकाकर्ता ने कहा कि लिव-इन पार्टनरशिप को कवर करने के लिए कोई नियम और दिशानिर्देश नहीं हैं। लिव-इन पार्टनर द्वारा किए गए अपराधों में भारी वृद्धि देखी गई है। इसमें बलात्कार और हत्या जैसे प्रमुख अपराध शामिल हैं। इस संदर्भ में, याचिका हाल के उन मामलों का हवाला देती है जहां महिलाओं को कथित रूप से उनके लिव-इन पार्टनर द्वारा मार दिया गया। याचिकाकर्ता ने श्रद्धा वॉकर मामले का उदाहरण भी दिया।
लिव इन पार्टनर का डेटाबेस तैयार करे सरकार
याचिकाकर्ता के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से दोनों लिव-इन भागीदारों को एक-दूसरे के बारे में और सरकार को भी उनकी वैवाहिक स्थिति, उनके आपराधिक इतिहास और अन्य प्रासंगिक विवरणों के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध होगी। जनहित याचिका (PIL) में लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित कानून बनाने की मांग भी की गई। याचिकाकर्ता ने कहा, हमारे देश में लिव-इन रिलेशनशिप में शामिल लोगों की सही संख्या का पता लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ से केंद्र सरकार को एक डाटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया जाए।
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लंघन
लिव इन रिलेशनशिप पर पीआईएल में तर्क दिया गया कि केवल लिव-इन पार्टनरशिप के पंजीकरण को अनिवार्य बनाकर ही डेटा हासिल किया जा सकता है। याचिका के अनुसार, लिव-इन पार्टनरशिप को पंजीकृत करने में केंद्र सरकार की विफलता संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
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