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महाराष्‍ट्र की राजनीति में क्‍या आने वाला है बवंडर? सुप्रीम कोर्ट ने विधान सभा अध्यक्ष को भेजा नोटिस

देश की सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने शुक्रवार को महाराष्‍ट्र के विधानसभा अध्‍यक्ष को नोटिस भेजी है। सुप्रीम कोर्ट ने ये नोटिस महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री एकनाथ शिंदे और उनकी शिवसेना गुट के विधायकों के खिलाफ आयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में देर करने वाली उद्धव ठाकरे वाली शिकायत याचिका पर सुनवाई करने के बाद भेजी है।

महाराष्‍ट्र के विधानसभा अध्‍यक्ष को नोटिस भेजी है। इसके बाद महाराष्‍ट्र की राजनीति में बड़ा बवंडर आने की संभावना बढ़ गई है।

shivsena

उद्धव ठाकरे गुट के सचेतक के तौर शिव सेना (UBT) के विधायक सुनील प्रभु ने 2022 में एकनाथ शिंदे समेत उनके 15 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की थी।। इसकी वजह थी कि जून 2022 में शिंदे समेत उन विधायकों ने शिवसेना से बगावत करके भाजपा से हाथ मिलाकर महाराष्‍ट्र में सरकार बना ली थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आज शिंदे और उनके विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर समयबद्ध तरीके से निर्णय नहीं लेने संबंंधी याचिका पर महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को नोटिस जारी किया।

अविभाजित शिव सेना के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु ने शिंदे सहित 39 विधायकों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दायर कीं। ये विधायक हैंं जिन्‍होंने 2022 में उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करके अलग हो गए और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से सरकार बनाई और एकनाथ शिंंदे ने महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री की कुर्सी संभाली।

शुक्रवार को सचेतन प्रभु की ओर से कोर्ट में सुनवाई के दौरान पेश हुए वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने मुख्‍य न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ को ये जानकारी दी कि नार्वेकर ने अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला नहीं किया है, जबकि संविधान पीठ के 11 मई के आदेश के अनुसार उन्हें समय सीमा के अंदर ये करना जरूरी था।

इस केस पर सुनवाई करते हुए न्‍यायाधीशों की पीठ जिसमें पीठ में न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल भी शामिल थे उन्‍होंने कहा हम नोटिस तुरंत जारी करेंगे और दो सप्‍ताह के अंदर वापस करने योग्य बना देंगे।

प्रभु के वकील ने कोेर्ट में दलील दी कि अयोग्यता याचिकाओं पर विचार करने के लिए अदालत के 11 मई के आदेश के बाद मई और जून में नार्वेकर को तीन अनुस्मारक भेजे। अदालत के फैसला सुनाए जाने के बावजूद एक बार भी सुनवाई नहीं हुई है।

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