SC Alimony Guidelines: तलाक के मामले में SC ने सुनाया बड़ा फैसला, पतियों को मिलेगी राहत, महिलाओं को दी चेतावनी
Supreme Court Alimony Guidelines: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भरण-पोषण और गुजारा भत्ते से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कानून का उद्देश्य महिलाओं को तलाक के बाद आर्थिक संकट से बचाना है, न कि पतियों को सजा देना या उनसे अनुचित मांगें करना।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और पंकज मिथल की बेंच ने अपने 73 पन्नों के फैसले में महिलाओं को सलाह दी कि वे इन प्रावधानों का उपयोग केवल कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए करें। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार पति के साथ जीवनयापन के दौरान मिली सुविधाओं पर आधारित है, न कि तलाक के बाद पति की बदली हुई आर्थिक स्थिति पर।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
भरण-पोषण का उद्देश्य
- कानून का मकसद तलाक के बाद महिलाओं की गरिमा बनाए रखना और उन्हें आर्थिक संकट से बचाना है।
- यह पतियों पर अनावश्यक दबाव बनाने के लिए नहीं है।
पति की बदली स्थिति का प्रभाव
- कोर्ट ने कहा कि अगर पति अलग होने के बाद दिवालिया हो जाता है, तो पत्नी क्या तब भी बराबर का गुजारा भत्ता मांगेगी?
- कानून यह नहीं कहता कि पति अपनी बदली हुई आर्थिक स्थिति के आधार पर पत्नी की जिंदगी को ऊंचा बनाए रखे।
अनुचित मांगें अनुचित हैं
- कोर्ट ने कहा कि यह अनुचित है कि महिलाएं पति की सफलता और संपत्ति को आधार बनाकर अनुचित भत्ते की मांग करें।
भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक का मामला
इस फैसले का एक उदाहरण हाल ही में सामने आया, जब एक भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक को अपनी पहली पत्नी को 500 करोड़ रुपये और दूसरी पत्नी को 12 करोड़ रुपये गुजारा भत्ता देना पड़ा। दूसरी पत्नी ने पहली पत्नी के बराबर गुजारा भत्ता मांगते हुए कोर्ट में तर्क दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि यह कानून पतियों को दंडित करने के लिए नहीं है।
महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं से आग्रह किया। कहा कि भरण-पोषण के कानून का इस्तेमाल अपने कल्याण के लिए करें, न कि इसे दुरुपयोग कर पतियों पर अतिरिक्त बोझ डालने के लिए।
पति की प्रगति पर बोझ डालना गलत
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के बाद पति की प्रगति या सफलता के आधार पर पत्नी को अधिक भत्ते की मांग नहीं करनी चाहिए।
- भरण-पोषण का आधार केवल वह जीवन स्तर है जो पति के साथ रहते हुए मिला था।
समाज में संतुलन की दिशा में कदम
यह फैसला समाज में संतुलन बनाए रखने और दोनों पक्षों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है। यह महिलाओं को भरण-पोषण के उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करते हुए इसे अनुचित मांगों से जोड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगाता है।
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