भारत के कौन से तीन मकसद पूरे करेगी जीएसएलवी डी-5?

जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च वहीकल डेवलपमेंट (जीएसएलवी) पूर्ण रूप से भारत द्वारा निर्मित है। इससे पहले 2010 में दो बार इसे प्रक्षेपित किया गया, जिसमें इसरो फेल हो गया। फेल होने वाली दो जीएसएलवी के पहले में क्रायोजेनिक इंजन लगाया गया था, जो भारत में निर्मित था, जबकि दूसरे में रूस का क्रायोजेनिक इंजन लगाया गया। उसके बाद 19 अगस्त 2013 को इस सेटेलाइट को लॉन्च होना था, लेकिन ऐन मौके पर इसलिये रोक दिया गया, क्योंकि उसके ईंधन टैंक में लीकेज था।
लगभग दो टन वजन का जीसेट-14 उपग्रह 49.13 मीटर लंबे और तीन चरणों वाले यान के जरिए अंतरिक्ष में जाएगा। यान के प्रथम चरण में ठोस ईंधन, दूसरे में तरल ईंधन और तीसरे में क्रायोजेनिक अपर स्टेज का इस्तेमाल होगा। इस मिशन पर भारत ने 356 करोड़ रुपए खर्च किये हैं। इसके तीन मकसद हैं।
भारत का पहला मकसद
पहला मकसद इसलिये जरूरी है, क्योंकि अब तक भारत अपनी सभी जीएसएलवी में विदेश से क्रायोजेनिक इंजन खरीद कर लगाता रहा है, इस बार अपना खुद का इंजन कैसा साबित होता है यह पता चल सकेगा। इस सेटेलाइट के सफल परीक्षण से भारत दुनिया का छठा देश बन जायेगा जिसे इस तकनीक में महारथ हासिल है। इससे पहले अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन ही इस एलीट क्लब में शामिल हैं।
दूसरा मकसद
जीएसएलवी के माध्यम से जिस सेटेलाइट जीसैट-14 को स्थापित किया जायेगा, वह आगे चलकर जीसैट-3 को अपग्रेड करने का काम करेगी। इसकी परिधि में पूरा भारत आयेगा और इसके माध्यम से भारत की ब्रॉडकास्टिंग सेवाओं में वृद्धि होगी। इस काम के लिये सेटेलाइट में 6 क्यू-बैंड, 6 सी-बैंड ट्रांसपोंडर लगाये गये हैं। यह सैटेलाइट 2600 वॉट की सौर्य ऊर्जा से चलेगी। इस सेटेलाइट के स्थापित होने के बाद भारत के गांव-गांव तक इंटरनेट की सेवाओं को सुदृढ़ रूप से पहुंचाने का मकसद भी पूरा होगा।
तीसरा मकसद
दो विफल परीक्षणों के बाद दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिक संगठनों के बीच इसरो की किरकिरी हुई थी। लिहाजा भारत का तीसरा मकसद उन्हीं वैज्ञानिक संगठनों को करारा जवाब होगा कि हम किसी से कम नहीं।












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