बिहार शरीफ़ में रामनवमी की हिंसा में कैसे उजड़ गया एक 'गुलशन'
रामनवमी के मौक़े पर बिहार शरीफ़ में हिंसा और आगज़नी हुई. प्रशासन अब यहाँ हालात सामान्य करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन कुछ लोगों को इस हिंसा ने कभी न भूलने वाला दर्द दे दिया है.
बिहार शरीफ़ में रामनवमी पर हुई हिंसा के बाद प्रशासन की ओर से हालात सामान्य करने की कोशिश की जा रही है. शहर में हिंसा और आगज़नी को देखते हुए चार दिनों तक निषेधाज्ञा लगी रही.
इन सबके बीच कुछ घरों में हालात शायद पहले जैसे कभी नहीं हो पाएँगे. इस हिंसा में कई लोग घायल भी हुए हैं. उन लोगों के ज़ेहन में भी हमेशा इस घटना की यादें बनी रहेंगी जिनके जिस्मों पर हमलों के निशान हैं.
अभी भी एक दर्जन से अधिक लोगों का इलाज पटना के मेडिकल कॉलेज में चल रहा है.
लेकिन 17 साल के गुलशन कुमार के परिवार की पीड़ा गहरी है. शनिवार को हुई हिंसा में गुलशन की मौत हो गई थी.
गुलशन का परिवार इसके लिए मुस्लिम समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराता है.
गुलशन के भाई विकास कुमार के शब्दों में - "गोली मस्जिद से चली", जिसके बाद गुलशन ये कहते हुए गिर गया कि "भैया हमको बचा लो."
हालाँकि प्रशासन का कहना है कि चूँकि पहड़पुरा-दरगाह के इलाक़े में सीसीटीवी कैमरा नहीं लगा था, इसलिए ये साफ़ नहीं कि गुलशन की जान किसकी गोली लगने से गई.
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संवेदनशील इलाक़ा
बिहार शरीफ़ के कुछ संवेदनशील इलाक़ों के चौराहों पर हरा और भगवा झंडा आमने-सामने लगा दिखता है. यहाँ पुलिस की तैनाती शनिवार की घटना के बाद की गई.
हालाँकि महल इलाक़े में रहने वाले मुराद आलम का कहना है कि ''हिंसा ज़्यादातर तब-तब भड़की है, जब मोटर साइकिल सवार हिंदू टोलियों ने मस्जिदों के पास जाकर गंदे क़िस्म की नारेबाज़ियाँ की हैं, कुछ इस तरीक़े से ताकि दूसरे समुदाय को भड़काया जा सके.''
मंगलवार को लोग भैंसासुर से लेकर पुलपर बाज़ार, पहड़पुरा, राँची रोड और दूसरे इलाक़ों में सब्ज़ी, फल-दूध, दवा की ख़रीदारी करते दिखे.
भैंसासुर वो इलाक़ा है, जहाँ 30 मार्च को बड़ी मस्जिद और उसके पीछे की गली में मौजूद छोटी मस्जिद के पास सबसे पहले तनाव की स्थिति बनी थी.
वहीं पास में बड़ा-सा गेट लगा दिखता है. यहाँ पोस्टरों के साथ सनातन धर्म विकास समिति की ओर से विराट ध्वज यात्रा की घोषणा नज़र आती है.
शहर में लगे दूसरे पोस्टरों और बिल बोर्ड्स में हर घर को अयोध्या बनाने की बात कही गई है.
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हुआ क्या था
पहले दिन की घटना को ज़िलाधिकारी शशांक शुभंकर कुछ लोगों की ओर से आपसी रंज़िश को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश बताते हैं, जिसे दोनों समुदायों के समझदार लोगों ने समझा-बुझा कर शांत कर दिया.
लेकिन दूसरे दिन ही यानी शुक्रवार को सोग़रा कॉलेज और पास के इलाक़ों में भारी हिंसा और आगज़नी की घटनाएँ हुईं, जिनमें दुकानों-मकानों, मस्जिदों और मदरसों में आग लगा दी गई. गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया.
तीसरे दिन यानी शनिवार को भी हिंसा जारी रही, गोलीबारी भी हुई. इस बार पहड़पुरा के इलाक़े में हिंसा हुई जिसमें 17 साल के एक हिंदू युवक गुलशन की गोली लगने से मौत हो गई.
मृतक के भाई विकास कुमार के अनुसार, शनिवार शाम को वो गर्भवती बहन के लिए दवा ख़रीदने जा रहे थे, तो छोटे भाई ने कहा कि "समय ख़राब है दोनों साथ होंगे तो मदद होगी, लेकिन वापसी के वक़्त पुलिया के पास मस्जिद से फ़ायरिंग होने लगी और फिर मुझे जब थोड़ा होश आया, तो देखा भाई साथ नहीं था. वो तो पीछे गिरा था."
विकास बताते हैं कि उनके भाई गुलशन ने कहा- भैया हमको बचा लो.
विकास कुमार कहते हैं, "गुलशन ज़्यादातर घर में ही रहता था, वो इतना अधिक घर पर रहता था कि हमलोग उनसे नाराज़ हो जाते थे. हाल के दिनों में उसे हमारे और माँ के साथ खेत में काम करने जाना होता था. इस वजह से इंटर में उसका नंबर भी कुछ कम आया था."
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परिजनों का ग़म
पेशे से राजमिस्त्री पिता रवींद्र प्रसाद भी बेटे की मौत के लिए मुस्लिम समुदाय को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उनका कहना है कि इस ग़म से उबरना उनके लिए आसान नहीं कि पोस्टमॉर्टम के बाद गुलशन के शव का अंतिम संस्कार उन्हें पटना में ही कर देना पड़ा.
पिछड़ी जाति से ताल्लुक़ रखनेवाल गुलशन कुमार का परिवार बंटाई लेकर छोटी-मोटी खेती करता है.
ये पूछने पर कि जब शहर में धारा 144 लागू थी, आगज़नी का दौर था, तो फिर वो गुलशन को लेकर बाहर क्यों गए? इस पर विकास कुमार कहते हैं कि धारा 144 का असर वैसा नहीं दिख रहा था.
शादीशुदा और एक बच्चे के पिता विकास कुमार बीए और इलेक्ट्रिकल वर्क में डिप्लोमा के बावजूद बेकार हैं.
वो कहते हैं कि छोटी बहन का दहेज पूरा करने के लिए उन्हें अपनी शादी करनी पड़ी.
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आक्रामक थी भीड़
ज़िलाधिकारी शशांक शुभंकर तीन दिनों तक चली हिंसा के सवाल पर कहते हैं कि प्रशासन को इस बात का अंदाज़ा नहीं था या किसी तरह की कोई ख़ुफ़िया जानकारी नहीं थी कि हालात इस तरह का मोड़ ले लेंगे.
वो कहते हैं कि इस बार की भीड़ अधिक आक्रामक थी.
पिछले साल तक बिहार में नीतीश कुमार और बीजेपी की साझा सरकार थी, लेकिन फिर नीतीश कुमार ने बीजेपी से नाता तोड़ कर आरजेडी से हाथ मिला लिया.
फ़िलहाल बिहार में महागठबंधन की सरकार है.
नीतीश कुमार और बीजेपी में खटास इस क़दर बढ़ी है कि अमित शाह ने कहा है कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो गए हैं.
केंद्रीय गृह मंत्री इन दिनों बार-बार बिहार के दौरे पर आ रहे हैं.
रामनवमी की हिंसा के बीच एक रैली के दौरान अमित शाह ने बिहार के लोगों से कहा था- बीजेपी को पूर्ण बहुमत से सरकार में लाएँ, हम दंगाइयों को उल्टा लटका देंगे.
कुछ इसी तरह का बयान उन्होंने कुछ महीने पहले गुजरात में दिया था कि 'दंगाइयों को सबक़ सिखा दिया गया'.
शुक्रवार की हिंसा के बाद प्रशासन ने शहर में निषेधाज्ञा लागू कर दी थी. मंगलवार सुबह कुछ घंटे की मोहलत के बाद फिर से उसे सख़्ती से लागू करवाया जा रहा है.
इंटरनेट सेवा को बहाल किया जाए या इस पर लगी रोक जारी रहेगी, इसको लेकर भी बैठक होनी है.
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सियासत
राज्य में सत्तारूढ़ लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल ने हिंसा के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराया है और इसे दलितों, पिछड़ों, अत्यधिक ग़रीबों और ग़रीब सवर्णों का शोषण बताया है.
लेकिन लोग पार्टी से ये सवाल भी पूछ रहे हैं कि सत्ता में रहते हुए वो बिहार शरीफ़ और सासाराम जैसी हिंसा को क्यों नहीं रोक पाई.
https://twitter.com/RJDforIndia/status/1643111475949768704
ज़िलाधिकारी शशांक शुभंकर के अनुसार, सुरक्षा-व्यवस्था को बेहतर करने के लिए एक मजिस्ट्रेट रैंक को कमान देकर पूरे शहर को सात ज़ोन में बाँट दिया गया है, जिनमें फ़िलहाल सुरक्षाबलों की गश्त जारी है.
शहर के 51 वार्डों में अलग-अलग शांति समितियाँ तैयार हुई हैं, जिसके सदस्य अफ़वाहों की ख़बर मिलते ही लोगों से मिल रहे हैं. ये लोग इलाक़ों की गश्त कर रहे हैं और प्रशासन को लगातार इनपुट दे रहे हैं.
इस बीच सोमवार को शहर में एक शव और मिला है जिसकी शिनाख़्त नहीं हो पाई है.
प्रशासन ने कहा है कि जहाँ से शव मिला है, वो क्षेत्र हाल की हिंसा के दायरे में नहीं आया था.
हिंसा के मामले में अब तक 130 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है और पुलिस प्रशासन लगातार नए साक्ष्यों के सामने आने पर छापेमारी कर रहा है.
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ज़िंदगी की क़ीमत
गुलशन के पिता मुआवज़े का ज़िक्र करते हुए नाराज़ हो जाते हैं. वो कहते हैं कि सरकार ने उनके बेटे की ज़िंदगी की क़ीमत पाँच लाख लगाई है.
ये पूछने पर कि क्या वो शोभायात्रा में शामिल हुए थे, वो कहते हैं, "हम ग़रीब आदमी हैं, अगर एक दिन काम नहीं करेंगे तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा."
पहड़पुरा-दरगाह के इलाक़े में उस शाम गुलशन के साथ क्या हुआ, ये साफ़ नहीं.
शायद कभी कुछ पता भी न चल पाए और हर कोई उस दिन की घटना को अपने-अपने तरीक़े से देखे.
लेकिन फ़िलहाल 17 साल के गुलशन का परिवार उनसे जुड़ी हर याद, एनसीसी की उनकी यूनिफ़ॉर्म और कैप, गुलशन के प्रमाणपत्रों और किताबों को आग के हवाले करने की बात कर रहा है.
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