1950 के दशक के वो जासूसी ग़ुब्बारे जो अमेरिका ने चीन और सोवियत संघ के ऊपर छोड़े थे

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कुछ दिनों पहले अमेरिका ने अपने हवाई क्षेत्र में चीन के बैलून को मार गिराया था. अमेरिका ने आरोप लगाया कि ये बैलून सैनिक जासूसी के मक़सद से भेजा गया था. लेकिन चीन ने ये कहते हुए अमेरिकी आरोपों को ख़ारिज किया कि वो बैलून मौसम के अध्ययन से जुड़ा था.

दिलचस्प ये है कि ख़ुद अमेरिका ने भी यही बहाना 1950 के दशक में बनाया था, जब उसने अपने जासूसी कार्यक्रम के तहत हॉट एयर बैलून चीन और सोवियत संघ के ऊपर भेजे थे.

इतिहास का ये वो दौर था जब दुनिया की दो महाशक्तियों के बीच तनातनी अपने चरम पर थी. रूस का डर इतना था कि अमेरिका में ये चेतावनी बार-बार जारी की जाती थी कि रूस की तरफ़ से कभी भी हमला हो सकता है.

उस दौरान कोरिया युद्ध ख़त्म ही हुआ था. कोरिया के उत्तरी हिस्से में कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित करने के लिए उस युद्ध में नवगठित 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' ने भी हिस्सा लिया था.

तब अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे डेविड आइज़नहावर. उन्होंने रूस की तरफ़ से होने वाले संभावित हमले का जायज़ा लेने के लिए कथित रूप से एक ब्लैक ऑपरेशन शुरू करने की मंज़ूरी दी थी.

अमेरिका ने अपने इस जासूसी कार्यक्रम को नाम दिया था SENSINT (सेंसिटिव इंटेलिजेंस). इसके तहत ग़ुब्बारों के ज़रिए दुश्मन देशों के हवाई क्षेत्रों में जाकर सूचनाएं इकट्ठा की जाती थी.

जहां तक चीन की जासूसी का सवाल है, तो अमेरिका उसे अस्थिर करने के लिए साल 1949 से ही ऐसा कर रहा था.

चीन में इसी साल लंबी क्रांति के बाद कम्युनिस्ट लीडर माओत्से तुंग ने पुरानी सरकार को बाहर कर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की स्थापना की थी. अमेरिका चाहता था कि चीन में लोग माओ के ख़िलाफ़ खड़े हों और कम्युनिस्ट सरकार का तख़्तापलट हो जाए.

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गोन्डोला और जासूसी कैमरे

अमेरिका के उस जासूसी ऑपरेशन में U2 जैसे जासूसी जहाज़ शामिल थे. अगर इन्हें मार गिराया जाता, तो पायलट के पकड़े जाने और पूछताछ में पहचान सामने आने का जोख़िम था. जैसा कि 1960 में गैरी पावर्स के साथ हुआ था. इसके अलावा पलटवार की भी आशंका होती थी.

अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स से सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों के मुताबिक़ ऐसे ही ख़तरे को टालने के लिए सीआईए ने जेनेट्रिक्स नाम का कार्यक्रम शुरू किया.

इसके तहत हवाई जहाज़ की जगह बैलून्स भेजे जाते थे, जिसमें हाई रेज़ोल्यूशन कैमरे लगे होते थे. ये बैलून्स दुश्मन देशों के हवाई क्षेत्रों में घुस कर सैनिक गतिविधियों की तस्वीरें लेते थे.

पॉलीथिलिन से बने इन बैलून्स का निर्माण जनरल मिल्स कंपनी करती थी. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के एनआरओ डिपार्टमेंट की 2012 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ये कंपनी अमेरिका में नाश्ते में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें बनाने के लिए मशहूर थी.

अमेरिका के वे बैलून 200 फ़ीट के आकार के होते थे. ये उतने ही बड़े होते थे, जितने बड़े चीन के बैलून को अमेरिका ने शनिवार को मार गिराया. इन बैलून्स को 80 हज़ार फ़ीट तक की ऊंचाई पर उड़ने के काबिल बनाया जाता था.

हर ग़ुब्बारे के साथ रेफ्ऱीजेरेटर के आकार का, कई चेंबर्स वाला एक गोन्डोला लटकाया जाता था जिसकी वजह से एक बैलून का मिशन 2 हफ़्ते तक चल सकता था.

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प्रोग्राम का मक़सद क्या बताया जाता था

अमेरिका ने ऐसे 512 ग़ुब्बारों में से पहले नौ ग़ुब्बारों को जनवरी 1956 में तुर्की और तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी से रवाना किया था.

इन जगहों से हवा के रुख़ की वजह से ये बैलून आसानी से सोवियत संघ और चीन के कुछ हिस्सों तक आसानी से पहुंचने के साथ प्रशांत महासागर क्षेत्र की तरफ़ बढ़ सकते थे.

यहां अमेरिका के मालवाहक जहाज़ तैयार रहते थे जो बैलून से लगे गोन्डोला और कैमरे में क़ैद फ़ोटोग्राफ्स और इनके ज़रिए इकट्ठा किए गए दूसरे इलेक्ट्रॉनिक मटीरियल उठा लेते थे.

एनआरओ की रिपोर्ट के मुताबिक़, ये पूरा जासूसी ऑपरेशन 'ग्लोबल मेटेरोलॉजिकल रिसर्च प्रोग्राम' की आड़ में चलाया जाता था. इस प्रोग्राम का मक़सद बताया जाता था-अंतरराष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष के फ़्रेमवर्क में साइंटिफ़िक डेटा इकट्ठा करना.

एनआरओ की रिपोर्ट के मुताबिक़, ख़ुद राष्ट्रपति आइज़नहावर ने अंतरराष्टीय भू-भौतिकी वर्ष की व्याख्या करते हुए ये बताया था कि 'ये पूरी दुनिया के सभी लोगों के एक साथ काम करने और सबके भले के लिए एकजुट होने की नुमाइश है.'

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लेकिन सोवियत संघ जल्दी ही अमेरिका का ये तमाशा समझ गया. उसने अमेरिका के जेनेट्रिक्स कार्यक्रम की निंदा करते हुए इसे अपनी संप्रभुता पर हमला क़रार दिया.

अपने हवाई सीमा के उल्लंघन से नाराज़ सोवियत संघ ने अमेरिका का वो गोन्डोला भी दिखाया जिसे वो पकड़ने में कामयाब हुआ था. इसके साथ उसने अमेरिका को बेहद गुस्से में सख़्त संदेश भेजा.

लेकिन सोवियत संघ की इस सख़्ती का कोई असर अमेरिका पर नहीं पड़ा. तब के विदेश मंत्री जॉन फ़ॉस्टर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सोवियत संघ के दिए आंकड़ों को सैनिक मिशन से जुड़ा मानने से इंकार किया.

जॉन फ़ॉस्टर ने उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि, "इस मिशन के ज़रिए हम जेट स्ट्रीम्स से जुड़े कुछ नए और बेहद अहम आंकड़े जुटा रहे हैं. ये हमारी पूरी दुनिया के लिए अहमियत रखने वाले प्रोजेक्ट का हिस्सा है."

हालांकि राष्ट्रपति आइज़नहावर ने इसके बाद बैलून से जासूसी का मिशन रोक दिया था.

लेकिन आइज़नहावर प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी का आर्काइव संभालने वाले डेविड हाइट के मुताबिक़, ''राष्ट्रपति की चिंता जासूसी कार्यक्रम की सूचना लीक होने से ज़्यादा इस बात को लेकर थी कि उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियां जासूसी कार्यक्रम के लिए गुप्त योजना बनाने में नाकाम रहीं.''

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इसका नतीजा क्या हुआ

जेनेट्रिक्स प्रोजेक्ट से परिणाम भी सीमित ही मिले. कुछ सूत्रों के मुताबिक़ अमेरिका को 512 गोन्डोला में से सिर्फ़ 45 को ही ऑपरेशन के बाद रिकवर करने में कमयाबी मिली. इसमें से भी सिर्फ़ 32 गोन्डोला में से काम लायक तस्वीरें हासिल हुईं.

हालांकि इस ऑपरेशन में एक तस्वीर ऐसी ज़रूर हासिल हुई जिसका ख़ुफ़िया महत्व बाद में पता चला. इस तस्वीर में साइबेरिया में किसी गुप्त ठिकाने का निर्माण होता दिख रहा था. इसके गहन विश्लेषण के बाद ये पता चला कि सोवियत रूस यहां न्यूक्लियर रिफ़ाइनिंग फ़ैक्टरी बना रहा था.

राष्ट्रपति आइज़नहावर ने हालांकि बैलूनों से जासूसी कार्यक्रम रोक दिया. लेकिन अमेरिका की वायुसेना ने स्पाई बैलून्स बनाने का सिलसिला 1958 तक जारी रखा. हालांकि इसे कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली.

इसके धीमा पड़ने की एक वजह सैटेलाइट टेक्नोलॉजी भी थी. इसके ज़रिए जासूसी के लिए बेहतर सिस्टम तैयार किया जा सकता था. आज इस तकनीक के ज़रिए कई देश धरती के पूरे धरातल की तस्वीर सुक्ष्मतम ब्योरे के साथ खींचने में सक्षम हो चुके हैं.

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