Socail Media: सोशल मीडिया के पसरते पांव और राजनीतिक पार्टियों के खिसकते दांव

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नई दिल्‍ली। लोक सभा चुनाव 2014 के तीन ऐसे दिग्‍गज हैं जिनके सामने राजनीतिक पार्टी के सभी कद्दावर नेता अपने घुटने टेक देते हैं। बात चाहे भाजपा के नरेंद्र मोदी की हो या फिर कांग्रेस के राहुल गांधी की। सपा के मुलायम हों या फिर बसपा की मायावती। इन तीन दिग्‍गजों के सामने किसी भी नेता की एक नहीं चल पाती है। ये दिग्‍गज ऐसे हैं कि इन्‍हीं का सहारा लेकर लोक सभा 2014 का चुनाव भी लड़ा जा रहा है। मुझे तो यहां तक बताया गया है कि अगर ये तीनों नहीं होते तो भाजपा की वापसी और कांग्रेस की विदाई भी नहीं हो पाती।

देखन में छोटन लगे पर घाव करे गंभीर...कहावत को यथार्थ करते हुए सोशल मीडिया ने लोक सभा चुनाव 2014 से पहले अपना पांव पसार ही दिया। सोशल मीडिया ने जिस तरीके से अपना दांव चुनाव के दौरान खेला है उसे न तो कोई कभी भूलेगा और न ही भूलना चाहता है। सोशल मीडिया के तीन सबसे बड़े दिग्‍गज हैं- फेसबुक, ट्विटर, और गूगल भारत। ये तीनों दिग्‍गज ऐसे हैं जिन्‍होंने भारतीय जनता पार्टी की वापसी आम चुनाव 2014 में कर दी और कांग्रेस की विदाई भी का दी। मीडिया से हटकर सोशल मीडिया ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जो टीआरपी की बातों से काफी परे है।

आप सभी इस बात से तो भली-भांति परिचित होंगे कि न्‍यूज चैनल और अखबार भारत की राजनीति में एक अहम हिस्‍सा निभाते हैं। आम चुनाव 2014 की शुरुआत से ही इसी मीडिया पर यह आरोप भी लगने लगे कि पूरी मीडिया सिर्फ टीआरपी के लिए ही काम करती है। वह वहीं दिखाती है जासे जनता देखना चाहती है न कि सच। शायद किसी हद तक इस बात से मुंह भी नहीं मोड़ा जा सकता है। सबसे पहले कांग्रेस ने मीडिया को हिदायत दी कि कृपया कर नरेंद्र मोदी के पक्ष में कांग्रेस के विपक्ष में खबरें दिखाना बंद कर दें। उसे के बाद नरेंद्र मोदी ने स्‍वयं मीडिया के ऊपर प्रत्‍यक्ष रूप से हमला न बोलते हुए 'न्‍यूज ट्रेडर्स' को अपना निशाना बनाया। मोदी ने कहा कि न्‍यूज ट्रेडर्स के कारण भी देश के विकास की गति मंद हुई है। देश की जनता उन्‍हें भी नहीं माफ करेगी।

चौंकाने वाले आंकड़े:
बता दें कि फेसबुक के भारत में अब करीब 10 करोड़ यूजर हैं जबकि ट्विटर के यूजर्स की संख्या इस साल जनवरी के बाद से दोगुनी हो गई है। चुनाव के सातवें चरण के बाद ट्विटर पर 4.9 करोड़ से ज्यादा बातचीत भारतीय चुनावों पर आधारित थी। यह संख्या पूरे 2013 वर्ष में ट्विटर पर भारतीय चुनावों से जुड़ी बातचीत (2 करोड़) के दोगुने से भी अधिक थी। वर्ष 2009 में शशि थरूर एकमात्र ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जिनका ट्विटर अकाउंट था और उनके 6 हजार फॉलोअर्स थे। पांच साल बाद अब शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता हो, जिसका माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर अकाउंट न हो।

21.6 लाख फॉलोअर्स के साथ थरूर इस समय ट्विटर पर दूसरे सबसे चर्चित नेता हैं। पहले स्थान पर प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हैं और उनके 38.9 लाख फॉलोअर्स हैं। मोदी के फेसबुक पर 1.4 करोड़ प्रशंसक हैं। बराक ओबामा एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके फेसबुक पर मोदी से ज्यादा प्रशंसक हैं। राजनीतिक पार्टियां, नेता और उम्मीदवार अपने मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया पर विज्ञापन दे रहे हैं। इसके चलते सोशल मीडिया की तीनों ही दिग्गज कंपनियों के राजस्व में पर्याप्त इजाफा हुआ है।

हालांकि कोई भी कंपनी इस चुनावी चक्र में अपने विज्ञापन राजस्व पर चर्चा करने के लिए तैयार नहीं है लेकिन इन सभी ने इन चुनावों में अपनी महीनों की मेहनत लगा रखी है। इनमें से कई लोग तो भारत से हजारों मील दूर बैठकर काम कर रहे हैं। फेसबुक में नीति प्रबंधक केटी हार्बेथ का कहना है कि फेसबुक ने पिछले साल के अंत में ही भारतीय चुनावों पर काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी ने चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद इस साल मार्च में कई चीजों की पूरी श्रृंखला शुरू की।

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