10 प्रतिशत गरीब सवर्ण आरक्षण के साइड इफेक्ट, सिक्सर मारने के चक्कर में आउट हो सकते हैं मोदी!
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सवर्णों की नाराजगी के चलते कांग्रेस के हाथों सत्ता गंवाने के बाद बीजेपी को अपने कोर वोटर की चिंता सता रही थी। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार ने आनन-फानन में 'आर्थिक रूप से पिछड़े' सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्लान तैयार किया गया। दो दिन के भीतर लोकसभा व राज्यसभा दोनों से संविधान संशोधन को पास करा लिया। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल विरोध करते-करते समर्थन देने को मजबूर हो गए। अभी तक तो बीजेपी के लिए यह दांव मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ है, लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी है। जैसा कि सभी जानते हैं कि संविधान संशोधन के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की बाधा है, जहां 'आर्थिक आधार पर आरक्षण' अटक सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अगर संविधान संशोधन को बने रहने भी दे तो भी मोदी सरकार के लिए कई और बाधाएं हैं, क्योंकि इसके साइड इफेक्ट भी कम नहीं हैं।

-गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा यह संविधान संशोधन सुप्रीम कोर्ट में दो आधार पर खारिज किया जा सकता है। पहला तो यह इस आरक्षण के साथ ही अब कोटा 59 प्रतिशत हो गया। मतलब सुप्रीम कोर्ट ने जो 50 प्रतिशत की कैप लगा रखी थी, यह उसे पार कर गया है। इससे संविधान की मूल भावना को ठेस पहुंचती है। इसी तरह पीवी नरसिंहराव सरकार की ओर से दिए गए आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
-सुप्रीम कोर्ट में इस संशोधन के खारिज होने का दूसरा कारण है- आर्थिक आधार पर आरक्षण। संविधान संशोधन के बाद अब आर्थिक आधार पर आरक्षण संवैधानिक हो गया है, लेकिन इस संशोधन को कोर्ट संविधान की मूल भावना के अनुरूप मानेगा, तभी आखिरी बाधा दूर सकेगी।
-सुप्रीम कोर्ट में जाकर अगर तीसरे विकल्प के तौर पर ऐसी स्थिति बन जाए कि वहां संविधान संशोधन को हरी झंडी मिल जाए। हालांकि, इसकी संभावना कम है, लेकिन एक बार यह मान भी लिया जाए कि कोर्ट ने संविधान संशोधन को हरी झंडी दे दी तो भी इसे साइड इफेक्ट सामने आएंगे। सबसे पहले उस स्थिति पर बात करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट इसे खारिज कर दे। यदि सुप्रीम कोर्ट ने इस 10 प्रतिशत आरक्षण के संविधान संशोधन को खारिज कर दिया तब सवर्ण मोदी सरकार से और ज्यादा नाराज हो सकते हैं। उन्हें लग सकता है कि चुनावी लाभ के लिए मोदी सरकार ने उनकी भावनाओं से खिलवाड़ किया।
-यदि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान संशोधन को मंजूरी दे दी और गरीब सवर्णों को आरक्षण मिल गया, उस स्थिति में दलित और ओबीसी बीजेपी से दूर जा सकते हैं। संभव है कि बीजेपी को उनके कोप का सामना भी करना पड़े, क्योंकि 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी संख्या में दलित और ओबीसी वोट भी मिला था। दलित और ओबीसी के नाराज होने की संभावना के पीछे दो तर्क हैं। पहला- एसएसटी एक्ट पारित कराने पर सवर्ण बीजेपी के खिलाफ चले गए। उसी तरह की भावना अब दलित और ओबीसी समुदाय में भी घर कर सकती है। जिस प्रकार से आरजेडी ने संसद में खुलकर इसका विरोध किया, उससे स्पष्ट है कि ओबीसी समुदाय को सपा, आरजेडी जैसी पार्टियां यही संदेश देंगी कि बीजेपी 2019 के बाद सत्ता में लौटी तो आपका आरक्षण सुरक्षित नहीं है। मोदी सरकार दोाबारा सत्ता में आने पर एससी-एसटी और ओबीसी आरक्षण छीन सकती है। इसी के तर्क के आधार पर बीजेपी बिहार में हार का सामना कर चुकी है, जहां चुनाव से ऐन पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव की बात कही और कोहराम मच गया था।
-नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) के आंकड़ों के हिसाब से देश में ओबीसी की आबादी करीब 41 प्रतिशत है। इसी प्रकार दलित आबादी करीब 17 प्रतिशत बताई गई है, लेकिन ये सर्वे पुराना है। ऐसे में मानकर चलें कि ओबीसी आबादी करीब 45 और दलित आबादी करीब 20 प्रतिशत है। सवर्ण 35 प्रतिशत के आसपास। चूंकि नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं, इसलिए 2014 में ओबीसी वोटर ने बिहार में लालू यादव और यूपी में मुलायम सिंह यादव जैसे क्षत्रपों को वोट न देकर नरेंद्र मोदी के नाम पर मुहर लगाई। अब ओबीसी भी कोटा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं और दलित प्रमोशन में रिजर्वेशन के अटकने से और भड़क जाएंगे।
-अब 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी का दलित वोट 2009 की तुलना में 12 प्रतिशत से बढ़कर 24 फीसदी हो गया था। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 84 लोकसभा सीटों में से बीजेपी ने 40 पर जीत कर इतिहास रच दिया था। इनमें यूपी की सभी आरक्षित सीटें शामिल हैं।
-अब जरा ओबीसी वोट बैंक पर नजर डालते हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में 35 प्रतिशत ओबीसी मतदाताओं ने मोदी के नाम पर मुहर लगाई। कांग्रेस को सिर्फ 14% वोट ही मिला था। बाकी बचा वोट सपा, आरजेडी जैसे दलों में बंटा। लोकसभा में करीब 20% ओबीसी सांसद हैं। 2004 में सबसे अधिक 26% ओबीसी सांसद चुनकर आए थे। कारण था 2004 में बीजेपी की हार और क्षेत्रीय दलों को मिलाकर कांग्रेस ने यूपीए सरकार बनाई थी। इशारा यही है कि उस समय भी ओबीसी क्षेत्रीय दलों को ही चुना था, लेकिन मोदी के आने पर बाद ओबीसी बीजेपी के साथ चले गए।
-अब मोदी सरकार की समस्या यह है कि सवर्ण आरक्षण के बाद ओबीसी और दलितों को भी उम्मीदें हैं, जो अगर पूरी नहीं हुईं तो वे क्या कदम उठाएंगे? किसी को नहीं पता, वैसे अब मोदी सरकार के पास वक्त भी बेहद कम बचा है। ऐसे में देखना होगा कि गरीब सवर्ण आरक्षण के साइड इफेक्ट से मोदी सरकार खुद को कितना बचा पाती है।












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