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शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु कैसे बने सबसे ताक़तवर लिंगायत प्रमुखों में से एक

डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु (दाएं)
Getty Images
डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु (दाएं)

कर्नाटक में सबसे ताकतवर लिंगायत मठों में से एक के प्रमुख डॉ. शिवमूर्ति मुरुगा शरणरु की गिरफ़्तारी से लिंगायत समुदाय के कई लोग सकते में हैं क्योंकि मुरुगा मठ ने आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की भलाई का एक ट्रेंड सेट कर दिया है.

डॉ. शिवमूर्ति 17वीं शदाब्दी के मठों को पाठशाला में बदलने के लिए जाने जाते हैं. ईसाई स्कूलों की तरह उन्होंने मठों का एक क्लस्टर बना लिया है, जो कि कर्नाटक के कई इलाकों में फैला है, ख़ासतौर पर उत्तरी ज़िलों में जहां लिंगायत समुदाय का दबदबा है.

रानी चम्मना विश्वविद्यालय, बेलगावी के राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर और एचओडी प्रोफ़ेसर कामालाक्सी जी ताडापाड़ ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "इन पाठशालाओं से निकलने वाले लोग उत्तरी कर्नाटक और राज्य के दूसरे हिस्सों में छोटे मठों में काम करते हैं. छोटे मठों में स्वामियों को भेजने से अनुयायियों पर कंट्रोल रखने में मदद मिलती है, और राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर प्रभाव बढ़ जाता है."

प्रोफ़ेसर ताडापाड़ के मुताबिक इस राज्य में "लिंगायत मठों ने राजनीति में अहम भूमिका निभाई है. अगर 2023 में विधानसभा चुनावों और 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की तरह कर्नाटक में मठों के हिस्से में सीटें आने लगे, तो ये हैरानी की बात नहीं होगी."

मठों की भूमिका


कर्नाटक की राजनीति में मठों की भूमिका नई नहीं है. बास्वा पढ़ाई के जानकार रमज़ान दर्गा कहते हैं, "राज्य के पुनर्गठन के तुरंत बाद राजनेताओं ने मठों में मीटिंग करनी शुरू कर दी, ये फ़ैसला करने के लिए कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. और राजनीतिक पार्टियां उस वक्त मठ के नेताओं की बात मानती थीं."

पचास और साठ से दशक में एक समय ऐसा आया था कि जब ऊंची या दबदबे वाली जातियों के लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए प्रतिस्पर्धा होती थी. लिंगायतों का दबदबा इतना बढ़ गया था कि वोक्कालिगाओं ने अपने मठ बनाने शुरू किए. इसके बाद पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के भी मठ बनाए गए.

डॉ. शिवमूर्ति किसी लिंगायत समुदाय के पहले प्रमुख हैं जिन्हें किशोरियों के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है. दोनों ही लड़कियां मठ के स्कूलों के हॉस्टल में रह रहीं थीं. शिवमूर्ति को गुरुवार को गिरफ़्तार किया गया था और हवाई मार्ग से बेंगलुरू ले जाया गया. उन्होंने सीने में दर्द और कोविड के बाद की एलर्जियों की शिकायत की थी. इस मामले में उनके ख़िलाफ़ एससी-एसटी एक्ट के तहत भी कार्रवाई की गई है क्योंकि एक पीड़िता अति पिछड़े समुदाय की है.

डॉ. शिवमूर्ति के पास क्यों जाते हैं लोग


राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "सबसे पहले चीज़ जो उन्होंने की, वो ये थी कि उन्होंने खुद को जगतगुरु या श्रेष्ठ नहीं बताया. ये एक बड़ा बदलाव था. उन्होंने खुद को शरणरु कहलाना पसंद किया, इसका मतलब है भगवान का सेवक या मैं सबसे सामने झुकता हूं. उन्होंने बसावा सिद्धांत को प्रैक्टिकल तरीके से मानने पर ज़ोर दिया, सिर्फ़ बुनियादी ढांचे बनाकर नहीं."

उनके मुताबिक, "उन्होंने आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को शादियां करवाईं और दूसरे सामाजिक कार्यों की मदद से अपने अनुयायियों की संख्या में इज़ाफ़ा किया. उन्होंने समाज के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों की मदद की और ये उनके सबसे बेहतरीन कामों में से एक माना जाता है. वो बसावना के दोषा कन्सेप्ट में विश्वास रखते हैं, ख़ासतौर पर शिक्षण दोष पर."

मुरुगा मठ कर्नाटक में 150 से ज़्यादा आध्यात्मिक और शिक्षण संस्थान चलाता है.

बड़ी संख्या में शिक्षण संस्थान चलाना लिंगायत समुदाय की एक ख़ासियत रही है. जिस तरह से ईसाइयों के शहरों में कॉन्वेंट स्कूल चलते हैं, उस तरह लिंगायत मठों के बारे में कहा जाता था कि वो "शहरी इलाकों में आने से पहले, कर्नाटक के गांवों में कॉन्वेंट चलाते रहे हैं."

लिंगायत के हर मठ ने समुदाय के लोगों से बात करने की प्रक्रिया शुरू की. इसका नतीजा ये हुआ कि मठों से बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए. अगर एक ने शिक्षा के साथ खाना देना शुरू किया तो दूसरे ने शिक्षा के साथ पर्यावरण और जानवरों के हकों पर बात शुरू की. कई मठों नें शराब और धूम्रपान के ख़िलाफ़ भी अभियान चलाए और इन्हें समाज की 'ग़लत आदतें' बताया.

एक और अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "शिक्षा और समाज में लोगों को आगे बढ़ाकर मठ ने अपना प्रभाव बढ़ाया है. इसी तरह उनका राजनीतिक दबदबा भी बढ़ा है."

राजनीतिक पार्टियों का असमंजस


डॉ. शिवमूर्ति दूसरे लिंगायत मठ के प्रमुखों से अलग हैं. वो पहले लिंगायत प्रमुख थे जिन्होंने एक प्रतिनिधिंडल का समर्थन किया था जिन्होंने उस वक्त के मुख्यमंत्री सिद्धरामैय्या को एक ज्ञापन दिया था जिसमें लिंगायत को धर्म घोषित करने की मांग की गई थी.

वीरशैवा लिंगायत, जो कि दूसरे लिंगायतो से अलग वैदिक रीति रिवाजों में विश्वास करते है, उन्होंने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. ये एक बड़ा मुद्दा बना. ये भी माना जाता है कि सिद्धारमैय्या का लिंगायत को धर्म का दर्जा देने वाला प्रस्ताव कांग्रेस की हार का एक कारण बना था.

इस बुरे अनुभव के कारण कांग्रेस के नेता इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं.

1984 के बाद कांग्रेस को नुक़सान हुआ था जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने बेंगलुरु हवाई अड्डे पर संवाददाताओं से कहा था कि राज्य में चार दिनों के समय में एक नया मुख्यमंत्री होगा.''

वो मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को बर्खास्त कर रहे थे, जिन्हें लकवा मार गया था. कांग्रेस तब से कभी भी लिंगायतों का पूर्ण समर्थन हासिल नहीं कर पाई है. हालांकि उनकी पार्टी के टिकट पर कुछ लिंगायत चुने जा चुके हैं.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा, "यह कहना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि कानून अपना काम करे. लेकिन फिर हमें एक हिंदू विरोधी पार्टी की तरह देखा जाएगा. हालांकि इस मामले में पीड़िताओं के लिए हमारा दिल दुखता है.''

दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ दिनों में किसी बीजेपी नेता ने भी स्वामी के समर्थन में कोई बयान नहीं दिया है. स्पष्ट रूप से, कोई भी राजनीतिक दल ऐसा कुछ नहीं कहना चाहता है जो राज्य के 224 विधानसभा क्षेत्रों में ख़ासतौर पर उत्तर कर्नाटक में महत्वपूर्ण वोट शेयर वाले प्रमुख जाति समूह को नाराज़ कर सकता है.

आखिरकार, कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के सबसे ज़्यादा 10 मुख्यमंत्री रहे हैं. दूसरे समुदायों की बात करें तो छह वोक्कालिगा समुदाय से, पांच पिछड़े वर्ग से और दो ब्राह्मण समुदाय के मुख्यमंत्री बने हैं.

जिस तरह इस समुदाय ने कांग्रेस के लिए 1984 से वोट नहीं किया है, उसी तरह साल 2013 में बीजेपी हार गई क्योंकि बीएस येदियुरप्पा को पार्टी प्रमुख के पद से हटा दिया गया था.

येदियुरप्पा में इसके बाद कर्नाटक जनता पक्ष बनाया और 12 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रहे. बीजेपी 40 सीटों पर सिमट गई. यही वजह है कि बीजेपी जिसने येदियुरप्पा को किनारे कर दिया था, अचानक उन्हें संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया और केंद्रीय चुनाव समिति का सदस्य भी.

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