महाराष्‍ट्र की राजनीति के चाणक्‍य हैं शरद पवार, जानें एनसीपी के चक्रव्‍यूह में कैसे फंसी शिवसेना

बेंगलुरु। महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने को लेकर लंबे समय से ड्रामा चल रहा है। शरद पवार ने ये तो जता दिया कि महाराष्ट्र की राजनीति में वो अब भी बूढ़े शेर ही हैं जिसने शिवसेना को अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। इतना ही नहीं वो ही महाराष्‍ट्र राजनीति के मौजूदा चाणक्य हैं। जो सत्ता के इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए रणनीति बनाते गए और शिवसेना उसमें फंसती गयी।

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    Maharashtra Government को लेकर Suspense,दावे की तैयारी में Shivsena, NCP और Congress |वनइंडिया हिंदी
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    शरद पवार कि फैलाए जाल में फंस कर कोई शिव सैनिक ही महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनेगा, ये राग अलापने वाली शिव सेना ने भारतीय जनता पार्टी से अपना तीन दशक पुराना रिश्ता ख़त्म कर दिया। एनसीपी के कहने पर केन्द्र सरकार में शामिल शिवसेना मंत्री ने भी इस्तीफ़ा दे दिया।

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    भाजपा उसे सोलह मंत्रालय और उप मुख्यमंत्री का पद देने को तैयार दिख रही थी, जिसे उसने मुख्यमंत्री पद के लालच में ठुकरा दिया और कांग्रेस-एनसीपी की खेल में बुरी तरह फँस गई। इतना नहीं राज्यपाल के सामने निर्धारित समय सीमा में अपने, कांग्रेस और एनसीपी विधायकों के समर्थन पत्र राजभवन को सौंपने में नाकाम रही। शरद पवार ने शिवसेना को गठबंधन की सरकार बनाने के लिए समर्थन देने में खूब सोच समझ कर समय लिया।

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    पहले बता दें महाराष्‍ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के तीन दिन बाद सरकार गठन को लेकर स्थिति कुछ साफ नजर आ रही है। एनसीपी मुखिया शरद पवार ने कहा है कि महाराष्ट्र में सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और जल्दी ही राज्य में नई सरकार बन जाएगी। पवार ने कहा है कि नई सरकार पांच साल तक चलेगी। शरद पवार ने कहा, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की बैठक में न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) की रूपरेखा तय हो चुकी है,जिसके आधार पर महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार चलाई जाएगी। शिवसेना के कद्दावर नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत लगातार बयान दे रहे हैं कि महाराष्ट्र का अगला सीएम शिवसेना से ही होगा।

    शरद पवार ने पहले शिवसेना के सारे रास्‍ते बंद किए

    शरद पवार ने पहले शिवसेना के सारे रास्‍ते बंद किए

    महाराष्‍ट्र के चार बार मुख्‍यमंत्री रह चुके शरद पवार राजीनीति के पुराने खिलाड़ी हैं इसलिए उन्‍होंने उतावलापन दिखाने के बजाय शिवसेना को सब तरीके से अपने चक्रव्‍यूह में फंसा कर पहले उससे बाहर निकलने के सारे रास्‍ते बंद कर दिए़। इतना ही नही कट्टर हिंदुत्‍व एजेंडे को लेकर चलने वाली शिव सेना को गठबंधन की सरकार बनाने को लेकर हर मुद्दे पर अपने सामने नतमस्‍तक कर दिया। इतना ही नहीं कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन करने पर उसे कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी की ये छवि छोड़नी पड़ेगी। शिवसेना अगर हिंदुत्व का मुद्दा छोड़ती है तो उसकी वैचारिक पहचान खत्म हो जाएगी और इसका सीधा फायदा प्रदेश में भाजपा को मिलेगा।

    2014 के अनुभव से एनसीपी ने लिया सबक

    2014 के अनुभव से एनसीपी ने लिया सबक

    महाराष्‍ट्र चुनाव परिणाम आने के बाद से शुरुआत से ही 2014 जैसी समान परिस्थितियां होने के बावजूद एनसीपी ने धैर्य नहीं खोया और बड़े ही आराम के साथ पूरा तमाशा देखती रही। एनसीपी, बड़े ही सुकून के साथ भाजपा आर शिवसेना की लड़ाई देख रही थी। मामले के मद्देनजर एनसीपी इस बात से वाकिफ थी कि इस लड़ाई में एक जिंदा रहेगा जबकि एक की मौत होगी।

    बता दें 2014 में इस बार की तरह महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने को लेकर पशोपेश की स्थिति थी। तब के चुनाव में भाजपा नंबर एक पर शिवसेना नंबर दो, एनसीपी तीसरे और कांग्रेस चौथे पायदान पर थी। भाजपा और शिवसेना में सियासी गतिरोध चल रहा था। मामले में एनसीपी ने टांग अड़ाई और प्रफुल्ल पटेल ने एक बचकाना बयान दे दिया। पटेल ने भाजपा को समर्थन देने के नाम पर जो बातें कहीं साफ़ पता चल रहा था कि उन्होंने भाजपा के सामने घुटने टेकने पड़े। माना जा रहा है कि इसीलिए एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने इस बार खूब समय लिया।

    एनसीपी ने जो चाहा वो हुआ

    एनसीपी ने जो चाहा वो हुआ

    एनसीपी शिवसेना के शुरुआती तेवर देखकर ही अंदाजा लगा चुकी थी। उसने जो चाहा अंत में वहीं हुआ। मुख्यमंत्री बनने की रेस में भाजपा ने अपने को अलग कर लिया भाजपा के जाने के बाद मौका शिवसेना को मिला मगर उसके पास संख्या का आभाव था इसके लिए उसने एनसीपी-कांग्रेस की मदद ली और एनसीपी ने इस जगह एक ऐसा दाव खेला जिसके बाद जिसके बाद शिवसेना न घर की रही न घाट की। एनसीपी के प्लान के अनुरूप शिवसेना ने महाराष्ट्र की सत्ता पाने के चक्कर में केंद्र तक में भाजपा के साथ अपना 30 सालों का गठबंधन तोड़ा।

    शिवसेना को किया नतमस्‍तक

    शिवसेना को किया नतमस्‍तक

    शरद पवार इस पूरे समय तक लगातार सोनिया गांधी के संपर्क में थे। प्रत्‍यक्ष रुप से जहां दिखायी दे रहा था कि कांग्रेस के इंकार करने की वजह से महाराष्‍ट्र में शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस की सरकार नहीं बन पा रही हैं लेकिन वास्‍तविकता इससे बिलकुल अलग थी।

    शुरुआत से महाराष्‍ट्र विधान सभा में विपक्ष में बैठने की बात करने वाले शरद पवार शिवसेना भाजपा गठबंधन टूटने के बाद भी चुप्‍पी साधकर महाराष्‍ट्र में सरकार बनाने की पटकथा लिखते रहे। पवार ने इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए सोमवार, यानी 11 नवंबर का दिन चुना।

    शरद पवार ने सोनिया गांधी को कही थी ये बात

    शरद पवार ने सोनिया गांधी को कही थी ये बात

    शरद पवार से बात होने के बाद 11 नवंबर को सोनिया गांधी भी अपनी रणनीति बनाने में जुटी थीं। वे सोमवार को सुबह से ही अपने पार्टी नेताओं के साथ सलाह-मशविरा कर रही थी। यहां तक कि महाराष्‍ट्र के बड़े नेताओं और विधानसभा चुनाव में जीते हुए विधायकों के महाराष्‍ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने की बात पर राजी हो गयी।

    इतना ही नहीं भाजपा सरकार के कांग्रेस के खिलाफ सख्‍त रवैये के चलते सोनिया ने शिवसेना को समर्थन देने के लिए हामी भी भर दी। सूत्रों के अनुसार तब शरद पवार ने उन्‍हें यह कह कर रोक दिया कि पहले वह शिवसेना से बाकी सभी मुद्दों पर बात साफ कर ले। जबकि कांग्रेस की इसी बैठक के बाद शिवसेना प्रमुख उद्वव ठाकरे ने सरकार बनाने को लेकर सोनिया गांधी से पहली बार वार्ता भी कर चुके थे।

    जब राजभवन से शिवसेना को लौटना पड़ा खाली हाथ

    जब राजभवन से शिवसेना को लौटना पड़ा खाली हाथ

    सोमवार को शाम को शरद पवार ने उद्वव ठाकरे से पांच सितारा होटल में मुलाकात की। महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का निवास स्थान मातोश्री पिछले कई दशकों से सत्ता की धुरी रही है, जहां सरकार बनाने के लिए हमेशा से पार्टी प्रमुख खुद कर चल कर जाते थे। लेकिन सत्‍ता की लालसा में उद्वव इस दौरान होटल -होटल भटकते नजर आए।

    उद्धव ठाकरे से इस बातचीत के बाद ही शरद पवार और अहमद पटेल ने संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित किया। दोनों नेताओं ने बताया कि अभी कांग्रेस और एनसीपी के बीच कई मसलों पर चर्चा होनी है और दोनों दलों की बात जब फाइनल हो जाएगी तो फिर शिवसेना से बात की जाएगी। जिसके बाद इसी शाम शिवसेना राज्यपाल के सामने निर्धारित समय सीमा में गयी लेकिन एनसीपी और कांग्रेस का रुख साफ न होने के कारण अपने, कांग्रेस और एनसीपी विधायकों के समर्थन पत्र राजभवन को सौंपने में नाकाम रही।

    शिवसेना को किया कमजोर

    शिवसेना को किया कमजोर

    भाजपा का दामन छोड़ एनसीपी का दामन संभालते हुए शायद शिवसेना ये सोच रही थी कि वो जो भी कर रही है वह ठीक कर रही हैं। हालांकि एक बड़ा फायदा उसे मिला और वो सरकार बनाने में कामयाब तो हो गयी लेकिन उसके लिए उसे विचारधारा तक दांव पर रखनी पड़ी। ये कहना कहीं से भी अतिश्योक्ति न होगी कि एनसीपी ने ठीक ऐन वक़्त पर शिवसेना को समर्थन देकर सरकार बनाने के बावजूद उस स्थान पर लाकर पटक दिया है जहां से उसकी राजनीतिक जमीन दरकती नजर आ रही है।

    शिवसेना की मौजूदा हालत पर ये भी कहा जा सकता है कि, वो जैसे एनसीपी के साथ बिना किसी शर्त के खड़ी हुई है।अगर उसे वैसा ही रुख अख्तियार करना था तो फिर भाजपा में क्या बुराई थी। आखिर क्यों नहीं उसने उसी चरित्र और चेहरे का प्रदर्शन किया जो इस देश की जनता 2014 में देख चुकी थी। अगर शिवसेना 2014 की तरह इस बार भी समझदारी का परिचय देती तो आज पार्टी की इतनी किरकिरी हरगिज़ न होती।

    इसे भी पढ़े- ये कहां पहुंच गई है शिवसेना, कभी मातोश्री में लगता था नेताओं का दरबार!

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