“दीदी आओ कांग्रेस बचाओ”: प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग ने जोर पकड़ा

नई दिल्ली। कांग्रेस का यह संक्रमण काल है। राहुल गाँधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिए दो महीने हो चुके हैं, नए अध्यक्ष की तलाश जारी है। इसके लिए प्रियंका गांधी से लेकर कांग्रेस के बूढ़े हो चले नेताओं तक के नाम भी सामने आ रहे हैं। अपने को नेतृत्व विहीन महसूस कर रहे कांग्रेसी “दीदी आओ कांग्रेस बचाओ” के मोड में आ चुके हैं। प्रियंका को अध्यक्ष बनाने की मांग करने वालों में विदेश मंत्री रह चुके वयोवृद्ध नटवर सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और लालबहादुर शास्त्री के पुत्र सुनील शास्त्री के नाम भी जुड़ गए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नटवर सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया कि गांधी परिवार से बाहर किसी नेता को अध्यक्ष बनाने पर पार्टी टूट जाएगी। नेहरू-गांधी परिवार के पुराने “लॉयलिस्ट” नटवर सिंह को लगता है की गांधी परिवार है तो कांग्रेस है। ऐसा ही ढेर सारे वरिष्ठ नेताओं का मानना है। यानी कांग्रेस मतलब “गाँधी फैमिली प्राइवेट लिमिटेड”। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 134 साल पुरानी पार्टी करीब दो महीने से अध्यक्ष विहीन है। लेकिन गांधी परिवार बिना कांग्रेस का अस्तित्व नहीं, ऐसी सोच भारतीय लोकतंत्र और खुद कांग्रेस के लिए अत्यंत चिंताजनक है।

प्रियंका में अध्यक्ष दिखता..यारा मैं क्या करूं...

प्रियंका में अध्यक्ष दिखता..यारा मैं क्या करूं...

हालांकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब में कांग्रेस की सरकारें हैं लेकिन कांग्रेस के लिए कर्नाटक और मध्यप्रदेश में राजनीतिक परिदृश्य बहुत अच्छा नहीं है। कर्नाटक की तरह मध्य प्रदेश में मजबूत विपक्षी पार्टी बीजेपी कभी भी कांग्रेस के लिए खतरा बन सकती है। राजस्थान में कांग्रेस का अंदरूनी कलह किसी से छिपा नहीं। लेकिन राजनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रान्त उत्तर प्रदेश में सोनभद्र नरसंहार के बाद प्रियंका गाँधी ने जिस तरह का जुझारू और आक्रामक तेवर दिखाया उसे लेकर कांग्रेस में एक नई आशा और ऊर्जा का संचार हुआ है। कांग्रेस को प्रियंका के रूप में पार्टी का नया अध्यक्ष नजर आने लगा है। ऐसा सुनील शास्त्री का भी मानना है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में सोनभद्र काण्ड के बाद उन्होंने जो किया वह गजब है। प्रियंका रातभर चुनार के किले में डटी रहीं और अपना मकसद पूरा किया। निसंदेह प्रियंका कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष की भूमिका अदा करने में सक्षम हैं। राहुल की तुलना में उनका व्यक्तित्व और सम्वादशैली अधिक प्रभावशाली है। लेकिन सुनील शास्त्री को समझना होगा कि सोनभद्र में पीड़ितों से मिलने निकली प्रियंका गाँधी ने दो दिन तक जो सुर्खियाँ बटोरी वह शासन-प्रशासन की अदूरदर्शिता का परिणाम अधिक था। प्रियंका को मिर्जापुर में रोका गया। इससे उन्हें आवाम को सन्देश देने का मौका मिल गया कि वह जनता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

सोनिया के बाद से परंपरा टूटी

सोनिया के बाद से परंपरा टूटी

आजादी से पहले और बाद भी 1998 तक कांग्रेस के अध्यक्ष हर एक या दो साल और कभी कभी तीन साल बाद बदले जाते रहे हैं। कोई भी नेता लगातार तीन बार से अधिक अध्यक्ष नहीं रहा। अध्यक्ष बदले जाते रहे और कांग्रेस मजबूत होती रही। लेकिन सोनिया गाँधी के 1998 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से यह परम्परा टूट गई। सोनिया गांधी करीब दो दशक तक अध्यक्ष रहीं। राहुल गाँधी ने 2017 में कांग्रेस की कमान सम्भाली। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहता तो शायद अभी भी पार्टी की कमान राहुल के पास ही होती। प्रियंका गाँधी हालांकि 1999 से ही कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करती रहीं हैं जब पहली बार सोनिया गांधी ने अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा था। लेकिन पहली बार पार्टी पदाधिकारी के रूप में प्रियंका ने 2019 में लोकसभा चुनाव के पहले राष्ट्रीय महासचिव का सम्भाला। इसके पहले 2004 में प्रियंका गांधी ने राहुल के लिए भी अमेठी में चुनाव प्रचार किया। अमेठी और रायबरेली में चुनाव राहुल गांधी और सोनिया गांधी लड़ते रहे लेकिन वहां चुनाव प्रचार की बागडोर प्रियंका गांधी के हाथ में ही रही। 2019 के पहले तक प्रियंका ने पार्टी में कोई पद नहीं लिया था। जनता के बीच जाकर सम्वाद स्थापित करने में राहुल की तुलना में प्रियंका बहुत आगे हैं। जाने-अनजाने राहुल की भाषा और व्यवहार को को लेकर सोशल मीडिया पर मजाक उड़ता रहा है। कांग्रेस में और उसके बाहर भी प्रियंका गांधी की छवि एक गंभीर और प्रभावशाली नेता के रूप में रही है। प्रशंसक कांग्रेस की करिश्माई नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छवि प्रियंका में देखते हैं। प्रियंका की सहजता, लोगों से मिलने-जुलने का ढंग और साफगोई जनता को अधिक प्रभावित करती हैं और प्रियंका इस बात को अच्छी तरह जानती हैं। इसका ताजा उदाहरण चुनार में प्रियंका का धरना है।

क्या प्रियंका मान जायेंगी?

क्या प्रियंका मान जायेंगी?

इसीलिए प्रियंका को पार्टी की कमान सौंपने की मांग जोर पकड़ रही है। राहुल गांधी ने फिलहाल इस पर अपनी प्रतिक्रया नहीं दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग की तो प्रियंका ने खुद भी ट्वीट कर राजनीति में होने की बात कही। यानी प्रियंका गांधी ने भी सीधे तौर पर इनकार नहीं किया है। लोकसभा चुनाव की हार की जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया, प्रियंका गांधी के साथ बनाए गए महासचिव और पश्चिम यूपी के प्रभारी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन प्रियंका ने अपना पद नहीं छोड़ा। ऐसे में राहुल के इस्तीफे के बाद प्रियंका गांधी कांग्रेस का भविष्य हो सकती हैं। लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कांग्रेस के नेता निष्क्रिय है जबकि प्रियंका गांधी लगातार सक्रिय हैं। अगर उनकी सक्रियता ऐसे ही बरकरार रही तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं में भी उत्साह बढेगा जो 2022 में उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में फायदेमंद साबित हो सकता है।

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