Same Sex marriage: सुप्रीम कोर्ट में बोली जमीयत- ऐसी शादियां फैमिली सिस्टम पर हमला, समलैंगिक धारणा पश्चिमी
Same Sex marriage का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। जमीयत उलेमा ए हिंद ने सुनवाई के दौरान कहा कि LGBTQIA जैसी समलैंगिक धारणाएं, पश्चिमी देशों से आती हैं। जमीयत ने कहा, समलैंगिक शादियां फैमिली सिस्टम पर हमला है।

Same Sex Marriage का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में सुना जा रहा है। देश की सबसे बड़ी अदालत में इस मुद्दे पर सुनवाई हो रही है। खुद को इस्लाम की पैरोकार बताने वाली संस्था- जमीयत उलेमा ए हिंद ने कहा है कि समलैंगिक शादियां भारत की परिवार प्रणाली पर हमला हैं। जमीयत ने कहा कि समलैंगिक अवधारणा पश्चिमी देशों से आती हैं। जमीयत ने कहा कि वे LGBTQ या किसी समलैंगिक शादी का समर्थन नहीं करते। बता दें कि केंद्र सरकार भी समलैंगिक शादी का विरोध किया है। इससे पहले RSS same sex marriage पर केंद्र सरकार के साथ खड़ी दिख चुकी है। संघ पदाधिकारी ने एक अहम बयान में कहा था कि 'शादी केवल विपरीत लिंग के बीच' हो सकती है।
पश्चिम में कट्टरपंथी नास्तिक
सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक विवाह मामले [Supriyo and anr vs Union of India] पर सुनवाई हो रही है। जमीयत-उलमा-ए-हिंद ने समलैंगिक शादियों को वैध बनाने की मांग करने वाली दलीलों का विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर आवेदन में इस्लामी धार्मिक निकाय- जमीयत ने कहा कि समान सेक्स विवाह जैसी धारणाएं पश्चिमी संस्कृति से उत्पन्न होती हैं। पश्चिम में कट्टरपंथी नास्तिक विश्वदृष्टि (worldview) है। ऐसे में इसे भारत पर थोपा नहीं जाना चाहिए।
अधिवक्ता एमआर शमशाद ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, याचिकाकर्ता समान-सेक्स विवाह की अवधारणा को पेश करके एक फ्री-फ्लोटिंग सिस्टम शुरू करके, एक स्थिर संस्था- विवाह की अवधारणा को कमतर बताने की मांग कर रहे हैं ... इससे परिवार प्रणाली पर हमला होता है। संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत का जिक्र करते हुए जमीयत ने कहा, दुनिया के एक हिस्से में यह प्रथा कानूनी है, इस आधार पर समान लिंग विवाह को सही ठहराना और भारत में लागू करना, सामाजिक व्यवस्था के दूसरे हिस्से के लिए बहुत हानिकारक हो सकता है।
जमीयत ने कहा, इस्लाम केवल जैविक पुरुषों और महिलाओं के बीच विवाह को मान्यता देता है। सुप्रीम कोर्ट में कहा गया, "इस्लामी प्रतिमान में, पिता और माता एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन इन्हें interchange नहीं किया जा सकता है। धर्मशास्त्रीय रूप से, ड्रेस कोड के संबंध में नियम, यहां तक कि प्रार्थना करने के तरीके भी लिंग के आधार पर भिन्न होते हैं।"
यह तर्क दिया गया था कि प्रो-LGBTQIA+ आंदोलनों की जड़ें पश्चिमी, नास्तिक समाजों और मूल्य प्रणालियों में हैं। जमीयत के अनुसार, "यदि हम पश्चिमी यौन मुक्ति आंदोलनों की ज्ञान मीमांसा का पता लगाते हैं, तो परिभाषित करने वाले आंकड़े लगभग सभी कट्टर नास्तिक हैं। चूंकि नास्तिक विश्वदृष्टि का यौन नैतिकता के विचारों में वर्तमान परिवर्तनों के आधार पर निर्णायक प्रभाव था, इसलिए इसे समाज और धार्मिक रूप से शासित समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों के भीतर जगह बनाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।












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