Same Sex Marriage: हेल्थ इंश्योरेंस, ज्वाइंट अकाउंट जैसी चीजों के लिए क्यों परेशान होते हैं समलैंगिक जोड़े?

Same Sex Marriage की सुनवाई के दौरान वकीलों ने एलजीबीटी कम्यूनिटी की समस्याओं को रखा। साथ ही बताया कि उनको कैसे छोटी-छोटी चीजों में दिक्कतें आती हैं।

 same gender Marriage

सेम सेक्स मैरिज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 15 याचिकाएं डाली गई थीं, जिस पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही। वैसे तो इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया है, लेकिन दोनों पक्षों की ओर से कई अहम मुद्दों को उठाया गया।

LGBT कम्यूनिटी की ओर से कोर्ट में पेश वकीलों ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से सामने सेम सेक्स मैरिज को मान्यता देने की मांग की। उन्होंने कोर्ट से कहा कि एक समुदाय को इस तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनको सामान्य जीवन जीने में कई मुश्किलें आ रहीं।

एक वकील ने बताया कि समलैंगिक जोड़ा भारत में हेल्थ इंश्योरेंस, एलआईसी, ज्वाइंट बैंक अकाउंट आदि चीजों से वंचित रह जाता है। उनको इन छोटी-छोटी चीजों को लेने में दिक्कत आती है, क्योंकि भारत में सेम सेक्स मैरिज को मान्यता नहीं है।

क्यों आती है दिक्कत?
उदाहरण के तौर पर अगर किसी शख्स ने हेल्थ इंश्योरेंस ले रखा है और उसकी शादी हो जाती है, तो वो अपनी पत्नी को उसमें ऐड करवा देता है। LGBT के साथ ऐसा नहीं है। वो अलग-अलग हेल्थ इंश्योरेंस ले सकते हैं, लेकिन बतौर कपल उनको ये नहीं मिलता। इसी तरह लाइफ इंश्योरेंस और अन्य चीजों में भी उनको दिक्कत आती है।

केंद्र लगातार कर रही विरोध
केंद्र सरकार ने कोर्ट में साफ कर दिया है कि वो सेम सेक्स मैरिज को मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। उनकी ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भले ही धारा 377 को डीक्रिमिनलाइज कर दिया गया हो, लेकिन इसे मौलिक अधिकारी से जोड़कर दावा नहीं किया जा सकता। इसको लेकर सभी वर्गों की राय जाननी जरूरी है।

'कानून बनाना संसद का काम'
17 अप्रैल की सुनवाई के दौरान भी केंद्र ने इन याचिकाओं का विरोध किया था। साथ ही उन्हें बेबुनियाद बताते हुए खारिज करने की मांग की। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि सेम सेक्स मैरिज पर कानून बनाना संसद का काम है। कोर्ट को इस मामले से दूर रहना चाहिए।

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