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'भारत में कोई भी अहिंदू नहीं, सभी एक ही पूर्वज के वंशज', बेंगलुरू में बोले संघप्रमुख मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस वर्ष 2 अक्टूबर को अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए । इस गौरवशाली उपलब्धि के उपलक्ष्य में संघ के द्वारा देश भर में व्याख्यान मालाएं, संवाद कार्यक्रम सहित भव्य आयोजनों का सिलसिला प्रारंभ हो चुका है जिसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में विगत दिनों बेंगलुरु में एक अनूठा संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।

इस दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले संघ प्रमुख ने संघ की 100 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पर अपना विद्वत्ता पूर्ण विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया और दूसरे दिन अतिथियों की जिज्ञासाओं का सारगर्भित समाधान किया। इस कार्यक्रम में लगभग समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लगभग 1200 विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित किया गया था।

Mohan Bhagwat

कार्यक्रम के मंच पर सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले भी आसीन थे।
संघ प्रमुख ने अपने व्याख्यान में इस बार को विशेष रूप से रेखांकित किया कि भारत में कोई भी अहिंदू नहीं है । सभी मुसलमान और ईसाई एक ही पूर्वजों के वंशज हैं।

इस बात को शायद उन्होंने भुला दिया या उन्हें यह भूलने के लिए मजबूर किया गया। भागवत ने हिन्दूओं को ही भारत के लिए जिम्मेदार बताते हुए कहा कि संघ का उद्देश्य सत्ता में समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं है। उसका उद्देश्य राष्ट्र के गौरव के संरक्षण के लिए हिंदू समाज को समाज को संगठित करना है। देश की मूल संस्कृति हिन्दू संस्कृति है।
संघ प्रमुख ने कहा कि जब यह प्रश्न उठाया जाता है कि संघ केवल हिन्दू समाज के लिए ही क्यों कार्य करता है तो इसका उत्तर यह है कि हिंदू ही इस देश के लिए जिम्मेदार है। अंग्रेजों ने हमें राष्ट्रीयता नहीं दी। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं।

भारत की मूल संस्कृति क्‍या है?

दुनिया में हर जगह लोग इस बात पर सहमत हैं कि हर राष्ट्र की अपनी एक मूल संस्कृति होती है। भारत की मूल संस्कृति क्या है? हम जो भी वर्णन करें वह हमें हिंदू शब्द पर ले जाता है। वही हमारी मूल संस्कृति है। भागवत ने कहा कि जानबूझकर या भले ही अनजाने में हर कोई भारतीय संस्कृति का पालन करता है। इसलिए यहां कोई अहिंदू नहीं है और हर हिन्दू को यह समझना चाहिए कि वह हिंदू है क्योंकि हिन्दू होने का मतलब भारत के लिए जिम्मेदार होना है।

संघ प्रमुख ने अपनी इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि सनातन धर्म ही हिन्दू राष्ट्र है और सनातन धर्म की प्रगति ही राष्ट्र की प्रगति है।

संघ को 70 सालों तक कड़े विरोध का सामना करना पड़ा

संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में उन कठिन चुनौतियों का उल्लेख किया जिनका संघ को अपनी 100 वर्षों की यात्रा में सामना करना पड़ा। संघ प्रमुख ने कहा कि इन कठिन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए संघ निरंतर आगे बढ़ता रहा। संघ को लगभग 60-70 सालों तक कड़े विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें दो बार संघ पर प्रतिबंध और स्वयंसेवकों पर हिंसक हमले भी शामिल हैं।तीसरी बार भी प्रतिबंध लगा परंतु वह ख़ास नहीं था।

संघ ने सभी चुनौतियों को परास्‍त किया

भागवत ने कहा हमारी बहुत आलोचना भी हुई। संघ की राह को अवरूद्ध करने के बहुत प्रयास किए गए लेकिन संघ के जो स्वयंसेवक अपना सब कुछ संघ को देते हैं और बदल में कुछ नहीं चाहते उनके समर्पण की ताकत से हमने सभी चुनौतियों को परास्त किया और अब हम इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि हमारी विश्वसनीयता बन चुकी है।

संघ प्रमुख ने संघ अपने कार्यों को हर गांव ,समाज के हर तबके सभी जातियों और वर्गों तक पहुंचाना चाहता है। संघ प्रमुख ने साफ साफ कहा कि संघ किसी दूसरे संगठन के खिलाफ खड़ा किया गया संगठन नहीं है। एक सामाजिक संगठन के रूप में व्यक्ति निर्माण से निर्माण ही संघ का उद्देश्य है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 100 वर्ष पूर्व संघ ने जन्म लिया

क्‍या मुसलमानों और ईसाइयों को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं है?

संघ प्रमुख ने इस अनूठे संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन सभागार में उपस्थित अतिथियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। संघ में प्नवेश की पात्रता के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मोहन भागवत ने कहा, "किसी भी ब्राह्मण को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं है। किसी भी अन्य जाति के व्यक्ति को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं है। किसी भी मुसलमान को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं है किसी भी ईसाई को संघ में प्रवेश की अनुमति नहीं है ।संघ में केवल हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है इसलिए किसी भी संप्रदाय के लोग चाहे वे मुसलमान हों ,ईसाई हों या किसी अन्य संप्रदाय के हों ,संघ में आ सकते हैं लेकिन उन्हें अपनी विशिष्टता ( धार्मिक पहचान) बाहर रखकर ही संघ में प्रवेश की अनुमति है। आपकी विशिष्टता का स्वागत है लेकिन जब आप संघ में आते हैं तो आप भारत माता के पुत्र या हिन्दू समाज के सदस्य के रूप में आते हैं।"

मुसलमान और ईसाई बिना लाग-लपेट के संघ में आते हैं

संघ ने बिना किसी लाग लपेट के कहा कि मुसलमान संघ की शाखा में आते हैं, ईसाई भी संघ की शाखा में आते हैं , नियमित रूप से हिंदू समाज कही जाने वाली सभी जातियों के लोग संघ की शाखाओं में आते हैं लेकिन संघ की शाखा में हम उनकी गिनती नहीं करते और न ही यह पूछते हैं कि वे कौन हैं। संघ में आने वाले सभी लोग भारत माता के पुत्र हैं। संघ इसी तरह काम करता है।

हिंदू समाज को संगठित करना, एकजुट करना है

संघ प्रमुख ने कहा कि हम पूरे हिंदू समाज को संगठित करना, एकजुट करना और गुणवत्ता प्रदान करना चाहते हैं ताकि वह एक मजबूत और समृद्ध भारत का निर्माण कर सके जो दुनिया का धर्म का ज्ञान प्रदान कर सके ताकि दुनिया खुश आनंदित और शांतिपूर्ण हो। कार्य का वह हिस्सा पूरे समाज और राष्ट्र के द्वारा किया जाना है।हम इसके लिए हिंदू समाज को तैयार कर रहे हैं। हमारा एकमात्र विजन है एकल विजन।हम पूरे हिंदू समाज को संगठित करना चाहते हैं यही हमारा कार्य है। हम इसे पूर्ण करेंगे और बाकी काम संगठित समाज करेगा।हमारा मिशन , हमारी दृष्टि एक मजबूत हिंदू समाज है।

संघ के पंजीकृत संगठन न होने के आरोपों से जुड़े प्रश्न के उत्तर में मोहन भागवत ने दो टूक लहजे में कहा कि संघ की स्थापना 1925 में हुई थी तो क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि हम ब्रिटिश सरकार के साथ पंजीकृत होंगे। हमें व्यक्तियों के एक समूह के रूप में वर्गीकृत किया गया है और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं।

आजादी के बाद भारत सरकार ने ऐसे संगठनों के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं बनाया है।आयकर विभाग और अदालत ने हमें व्यक्तियों के समूह के एक रूप में मान्यता दी है और आयकर विभाग ने हमें छूट प्रदान की है। सरकार ने संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाया । अगर आर एस एस नहीं था तो उन्होंने किस पर प्रतिबंध लगाया। भागवत ने कहा कि भारत में कई चीजें पंजीकृत नहीं हैं यहां तक कि हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।

मोहन भागवत ने संघ के भगवा ध्वज को लेकर जारी विवाद से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहा कि संघ हमेशा राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करता है और सदैव उसकी रक्षा के लिए खड़ा है। संघ प्रमुख ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज का फैसला 1933 में हुआ था जिसमें झंडा समिति द्वारा सर्वसम्मति से भगवा का राष्ट्रीय ध्वज के रूप में चयन किया गया। परंतु गांधी जी ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और किसी कारणवश उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग होंगे जिसमें भगवा रंग सबसे ऊपर होगा। मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ हमेशा राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करता है और उसकी रक्षा के लिए हमेशा खड़ा है।

संघ प्रमुख ने भारत के पाकिस्तान के शत्रुतापूर्ण रवैए से जुड़े एक सवाल के उत्तर में कहा कि भारत कभी भी पाकिस्तान के साथ संघर्ष की शुरुआत नहीं करता।हर बार उसकी तरफ से ही माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जाती है। उसे यह समझना चाहिए कि उसे अपनी कोशिशों में कभी सफलता नहीं मिलेगी। संघ प्रमुख ने कहा कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की आवश्यकता है ताकि वह समझ सके कि भारत के साथ प्रतिस्पर्धा अथवा लड़ाई करने की बजाय सहयोग करने में ही पाकिस्तान का हित है।

संघ प्रमुख ने कहा कि ऐसा लगता है कि उसे यह भाषा समझ में नहीं आती इसलिए उसे उसी की भाषा में जवाब देने की जरूरत है ताकि उसे अपने किए पर पछतावा हो। भागवत ने कहा कि भारत का शांतिपूर्ण पड़ोसी बनने से पाकिस्तान की प्रगति भी हो सकती है ।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में तीन शताब्दियों से मतांतरण के प्रयासों के बावजूद अब भी हम हिंदुस्तान ही हैं।हमारा धर्म और संस्कृति जीवित है। इसे बचाए रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। मोहन भागवत ने सामाजिक एकता और आंतरिक गुणवत्ता को देश के विकास, सुरक्षा और संस्कृति के संरक्षण की मुख्य शक्ति बताते हुए कहा कि एम एस एम ई , कारपोरेट क्षेत्रों, कृषि और स्वरोजगार क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। भागवत ने इन्हें देश की जीडीपी और रोजगार सृजन की निरूपित करते हुए इन क्षेत्रों की शक्ति को और मजबूत करने की आवश्यकता जताई।

संघ प्रमुख ने एक सवाल के जवाब में कहा कि भारत को परमाणु ईंधन के संदर्भ में थोरियम अनुसंधान पर उच्च प्राथमिकता देना चाहिए। यूरेनियम के विकल्प के रूप में हम थोरियम के उपयोग के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं।इस क्षेत्र में अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जाएना चाहिए। चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ न तो सरकार है और न ही वह कोई राजनीतिक दल है इसलिए हम प्रत्यक्ष कार्रवाई नहीं कर सकते लेकिन हम जागरूकता पैदा करने में अपनी भूमिका का निर्वाह करने के लिए सजग हैं।

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