RSS प्रमुख भागवत बोले- राम मंदिर प्रतिष्ठा के दिन भारत को मिली सच्ची आजादी, 'स्व' को जगाने के लिए था आंदोलन
RSS chief Mohan Bhagwat: उत्तर प्रदेश की अयोध्या नगरी में भगवान राम का भव्य मंदिर बने पूरे एक साल पूरे हो चुकी हैं। राम मंदिर की स्थापना और प्राण प्रतिठा के अवसर पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया। वहीं अब स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर प्रतिष्ठा दिवस के अवसर पर बड़ा बयान दिया है।
मोहन भागवत ने कहा भारत को अपनी "सच्ची आज़ादी" उस दिन मिली जिस दिन अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की प्रतिष्ठा हुई। उन्होंने सलाह दी कि इस तिथि को "प्रतिष्ठा द्वादशी" के रूप में मनाया जाना चाहिए ताकि देश की वास्तविक आजादी के रूप में इसे चिन्हित किया जाए, जिसने सदियों से बाहरी आक्रमणों का सामना किया है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ये बात इंदौर में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को 'राष्ट्रीय देवी अहिल्या पुरस्कार' प्रदान करने के बाद दिए गए अपने सम्मोहक भाषण में कही। उन्होंने भारत की वास्तविक स्वतंत्रता और राम मंदिर आंदोलन पर बात की।
भारत के स्वाभिमान को जगाने के लिए था ये आंदोलन
मोहन भागवत ने कहा राम मंदिर आंदोलन किसी के खिलाफ अभियान के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्र के सच्चे स्व को जगाने के प्रयास था। उन्होंने कहा इस आंदोलन का उद्देश्य भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने और दुनिया का नेतृत्व करने के लिए सशक्त बनाना था। राम मंदिर आंदोलन भारत के स्वाभिमान को पुनर्जीवित करने के लिए शुरू किया गया था, जिसे आक्रमणकारियों ने मंदिरों को नष्ट करके नष्ट कर दिया था, जिसका उद्देश्य भारत की पहचान को मिटाना था।
15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से मिली भारत की राजनीतिक आज़ादी के बारे में बात करते हुए भागवत ने एक लिखित संविधान के निर्माण की बात कही जिसका उद्देश्य देश को उसकी आत्म-पहचान से निकलने वाली एक अनूठी दृष्टि के अनुसार मार्गदर्शन करना था। हालांकि उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया कि उस समय की दृष्टि की भावना का व्यवहार में पूरी तरह से पालन नहीं किया गया।
मोहन भागवत ने प्रणव मुखर्जी का क्यों किया जिक्र?
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात के दौरान भागवत ने संसद में उठाए गए 'घर वापसी' (अपने मूल धर्म में पुनः धर्मांतरण) के मुद्दे पर चर्चा की। मुखर्जी ने भागवत को बताया था कि "भारत के पास दुनिया का सबसे धर्मनिरपेक्ष संविधान है, और इसलिए, दुनिया को हमें धर्मनिरपेक्षता के बारे में सिखाने का क्या अधिकार है?" मुखर्जी ने धर्मनिरपेक्षता की शिक्षा का श्रेय 5,000 साल पुरानी भारतीय परंपरा को दिया, जिसकी शुरुआत भगवान राम, कृष्ण और शिव जैसे देवताओं से हुई थी।
मोहन भागवत ने किया ये सवाल?
आरएसए प्रमुख मोहन भागवत ने बताया 1980 के दशक में राम मंदिर आंदोलन पर आजीविका की चिंताओं पर धार्मिक कारणों को प्राथमिकता देने के लिए सवाल उठाए गए थे। वे आलोचकों को चुनौती देते हुए पूछा 1947 में स्वतंत्रता के बाद समाजवाद, गरीबी उन्मूलन और आजीविका पर ध्यान केंद्रित करने के बावजूद भारत इजरायल और जापान जैसे देशों की तुलना में कहां खड़ा है।












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