Right to be forgotten क्या है? HC के आदेश से सुप्रीम कोर्ट के सामने कैसे खड़ी हुई दुविधा?
Right to be forgotten in India: सुप्रीम कोर्ट को अब इसपर फैसला देना है कि क्या 'भूल जाने का अधिकार' (Right to be forgotten), 'सूचित किए जाने का अधिकार' को पलट सकता है। यह मसला मद्रास हाई कोर्ट के एक आदेश की वजह से खड़ा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला आया है कि अगर किसी व्यक्ति को किसी अदालत ने किसी आपराधिक मामले में गुनहगार ठहरा दिया हो। लेकिन, बाद में उससे ऊपरी अदालत उस फैसले को पलट दे तो क्या पहले वाले फैसले के बारे में दी गई सूचना मिटाई या हटाई जा सकती है।

'भूल जाने का अधिकार' को लेकर सुप्रीम कोर्ट से सामने सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी सवाल आया है कि क्या आपराधिक मामले में किसी निचली अदालत से गुनहगार ठहराए गए व्यक्ति को दोषमुक्त करने के बाद कोई ऊपरी अदालत संबंधित वेबसाइट या पोर्टल को उसके नीचे की अदालत वाले फैसले को हटाने या मिटाने का आदेश दे सकता है? ताकि संबधित व्यक्ति के 'भूल जाने का अधिकार' (Right to be forgotten) का पालन हो सके।
एक कानूनी वेब पोर्टल से जुड़ा यह मामला बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है। सीजेआई (CJI) डीवीआई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और मनोज मिश्रा की बेंच के सामने यही दो सवाल उठाए गए हैं। मामला एक लीगल क्रोनिकल 'इंडियन कानून' (Indian Kanoon) से जुड़ा है।
मद्रास हाई कोर्ट के किस फैसले को दी गई है चुनौती?
'इंडियन कानून' ने सुप्रीम कोर्ट में मद्रास हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है। उस केस में हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपों में ट्रायल कोर्ट से दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति का फैसला पलट दिया और पोर्टल को आदेश दिया था कि वह ट्रायल कोर्ट फैसले को पोर्टल से मिटा दे।
सुप्रीम कोर्ट के सामने 'दो अधिकारों' पर विचार करने की दुविधा
सुप्रीम कोर्ट के सामने 'भूल जाने का अधिकार' और 'सूचित किए जाने का अधिकार' (right to be informed) को लेकर दुविधा खड़ी हो गई है। हालांकि, सीजेआई चंद्रचूड़ प्रथम द्रृष्टया हाई कोर्ट के फैसले से असहमत नजर आए। फिर भी अदालत ने इस दुविधाजनक मसले पर विचार करने की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'एक हाई कोर्ट पहले दिए गए किसी निर्णय को वेबसाइट से हटाने का निर्देश कैसे दे सकता है, चाहे उसने उसे खारिज कर दिया हो? त्रिस्तरीय न्याय व्यवस्था में अदालतों का प्रत्येक फैसला सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा होता है।' सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि अच्छा रहता कि हाई कोर्ट ऐसे संवेनशील मामलों में बरी किए गए व्यक्ति का नाम और उसकी निजी डिटेल वेबसाइट से छिपाने या दबाने के लिए कहता।
अदालत के मुताबिक, 'किसी फैसले को हटाने का आदेश देना एक पराकाष्ठा वाल कदम है जो सूचना के सार्वभौमिक अधिकार के खिलाफ है।' अदालत ने यह भी कहा कि अदालतों के फैसले पुस्तकों के रूप में भी प्रकाशित होते हैं तो क्या इन्हें भी लोगों तक पहुंचने से रोका जा सकता है? बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए इसपर आगे निर्णय करने की बात कही है।
'भूल जाने का अधिकार' क्या है?
'भूल जाने का अधिकार' को 'मिटाने का अधिकार' (right to erasure) के रूप में भी जाना जाता है। इसके तहत किसी व्यक्ति को उसकी निजी जानकारी, जैसे की तस्वीर, वीडियो और अन्य सूचना किसी संस्था के रिकॉर्ड से हटवाने का अधिकार मिलता है। यह डेटा प्रोटेक्शन कानूनों से जुड़ा है। मसलन यूरोपियन यूनियन के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेग्यूलेशन के अनुच्छेद 17 के तहत लोगों को यह अधिकार मिला हुआ है।
इस कानून का इस्तेमाल अक्सर ऐसे मामलों में होता है, जब कोई संस्था किसी व्यक्ति से जुड़ी निजी जानकारी को सार्वजनिक करता है और वह चाहे तो उसे मिटवाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकता है।
भारत में 'भूल जाने का अधिकार' की स्थिति क्या है?
भारत में 'भूल जाने का अधिकार' निजता के अधिकार से जुड़ा हुआ है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत भारतीय नागरिकों को 'निजता का अधिकार' (right to privacy) मिला हुआ है। लेकिन, देश के किसी कानून में 'भूल जाने का अधिकार' को तामील करवाने के लिए कानून की कोई विशेष धारा अभी नहीं है।
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