NDA में टूट की असली वजह: नरेंद्र मोदी, अमित शाह या कुछ और, पढ़ें पूरा गणित

नई दिल्‍ली। टीडीपी, शिवसेना की खुली बगावत के बाद बिहार में एनडीए के सहयोगी नीतीश कुमार ने भी बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जीतनराम मांझी अलग जा ही चुके हैं। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और बिहार में राम विलास पासवान की पार्टी का भी कोई भरोसा नहीं है। इधर, स्‍वाभिमानी शेतकारी संगठन (एसएसएस) भी एनडीए छोड़कर यूपीए में शामिल हो गया है। यूपी में एनडीए का सहयोगी अपना दल के नाराज होने की भी चर्चा है। आखिर ऐसा क्‍या है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार के आखिरी दिनों में एक के बाद एक सहयोगी दल साथ छोड़ रहे हैं? क्‍या वाकई एनडीए के सहयोगी दलों के इस आरोप में दम है कि बीजेपी सत्‍ता के घमंड में चूर है और सहयोगियों को सम्‍मान नहीं मिल रहा है? या वो चर्चा सही है कि बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ मोल-भाव करना आसान नहीं है? आखिर क्‍या है पूरा खेल? कहीं इसके पीछे 2019 का चुनावी वोटों गणित तो नहीं है? आइए जानते हैं एनडीए के सहयोगियों के एक के एक कर टूटने की असली वजह आखिर है क्‍या।

शिवसेना की हालत देख घबरा रहे हैं एनडीए के सहयोगी

शिवसेना की हालत देख घबरा रहे हैं एनडीए के सहयोगी

राज्‍य और केंद्र की राजनीति में वर्षों तक गठबंधन का फार्मूला सत्‍ता पाने के लिए बड़ा ही सुपरहिट रहा। लालू की आरजेडी, नीतीश कुमार की जेडीयू, चंद्रबाबू की टीडीपी, तमिलनाडु की डीएमके और अन्‍नाडीएमके, अकाली दल, ममता की पार्टी टीएमसी और न जाने कितने ही दल भारतीय राजनीति के पटल पर कुछ ऐसे उभर कर आए, मानो जियो का 19 रुपये वाला रिचार्ज कूपन। एक बार रिचार्ज कराइए और एक दिन का काम चलाइए, अगले दिन दोबारा रिचार्ज कराना ही पड़ेगा। जब एक वोट से अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्‍ता गंवाई, उस दौर में हर छोटे 'रिचार्ज कूपन' बड़े ही काम की चीज थे।

मोदी लहर ने उजाड़ दिए क्षत्रपों के घर

मोदी लहर ने उजाड़ दिए क्षत्रपों के घर

ममता बैनर्जी हों या नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे हों या चंद्रबाबू नायडू, लालू यादव हों या नवीन पटनायक, जयललिता से लेकर करुणानिधि तक नंबर्स गेम की बिसात पर इनमें से हर शख्‍स ने दिल्‍ली के तख्‍त पर बैठे शख्‍स को अपनी धुन पर खूब नचाया। कुल मिलाकर केंद्रीय से लेकर राज्‍य तक क्षेत्रीय दल सत्‍ता उगलने वाली सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समान थे। लेकिन 2014 में आई मोदी सुनामी में क्षेत्रीय दलों का पूरा कारोबार उजड़ गया। कम से कम केंद्र में इनकी कोई भूमिका नहीं बची। बीजेपी अपने दम पर बहुमत के साथ रिकॉर्ड सीटें लेकर सत्‍ता तक पहुंची और मोल-तोल, इतनी सीटों के बदले उतने कैबिनेट मंत्री वाला कारोबार बंद सा हो गया। मोदी लहर का राज्‍यों में दिखा और जहां बीजेपी गठबंधन में थी वहां भी उसका सितारा बुलंद नजर आया। परिणामस्‍वरूप हरियाणा में इनेलो जैसे दलों की कोई अहमियत नहीं बची। यहां बीजेपी अपने दम पर सत्‍ता में आ गई। महाराष्‍ट्र में शिवसेना की बड़े भाई की भूमिका भी खत्‍म हो गई और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसके बाद झारखंड में भी शिबू सोरेन जैसे नेताओं की दुकान बंद हुई और वहां बीजेपी सबसे बड़ी बनकर उभरी। मतलब छोटे दलों का स्‍पेस बीजेपी भरती चली गई और उनकी सत्‍ता कब खिसक गई, उन्‍हें पता ही नहीं चला।

ये है एनडीए के सहयोगी दलों की बगावत के पीछे की मुख्‍य वजह

ये है एनडीए के सहयोगी दलों की बगावत के पीछे की मुख्‍य वजह

यह बात सच है कि राजस्‍थान उपचुनाव ने बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजाई है। लेकिन मोदी-शाह अब भी चुनावी राजनीति के सबसे बड़े बाजीगर हैं। ऐसे में एनडीए के घटक दलों को डर है कि बीजेपी के साथ लड़कर कहीं वे अपनी जमीन अपने ही सहयोगी को गंवा न बैठें। वैसे भी 2019 के बाद अगर कांग्रेस केंद्र की सत्‍ता में लौट आई, तो इन क्षेत्रीय दलों के हाथ सत्‍ता का पकौड़ा छिन जाएगा। ऐसे में एनडीए के सारे घटक दल 2019 में अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर भी देते हैं तो भी किसी को हैरान नहीं होना चाहिए।

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