महाराष्ट्र : जानिए अब तक कब-कब हुआ भारतीय राजनीति में रातों-रात उलटफेर
महाराट्र में अचानक बीजेपी ने एनसीपी के शरद पवार के साथ मिलकर सरकार बनाकर सबको अचंभित कर दिया। देश की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हुआ। जानिए इससे पहले कहां और कब सत्ता परिवर्तन ने सबको अचंभित कर दिया था।
बेंगलुरु। महाराष्ट्र की सियासत में रातो रात बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ है। जिसने सभी को सुबह आंख खुलते ही अचंभित कर दिया। क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाने के लिए फॉर्मूला भी तय हो गया था। लेकिन शनिवार सुबह सभी को चौंकाते हुए बीजेपी ने एनसीपी नेता अजित पवार के समर्थन से सरकार बना ली। जिसमें देवेंद्र फडणवीस दूसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भाजपा ने एनसीपी के अजित पवार को तोड़कर पूरी बाजी ही पलट दी।

महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसने यह एक बाद फिर सिद्ध कर दिया है कि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तय नहीं होता। महाराष्ट्र में जो हुआ उसने एक बार फिर इस कहावत को चरितार्थ कर दिया। महाराष्ट्र में जो हुआ वह शिवसेना ही नहीं राजनीतिक के पुराने खिलाड़ी एनसीपी प्रमुख पवार के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं है। महाराष्ट्र में जो उलटफेर हुई जिसने सबको हैरानी में डाल दिया हैं, यह पहली बार नही हुआ है। भारतीय राजनीति में पहले भी ऐसा कई बार हुआ जब सत्ता की तस्वीर अचानक ऐसी बदली जिसकी राजनीति के पंडितों तक ने भी कल्पना नहीं की थी। आदए जानते हैं अब तक कब-कब हुआ भारतीय राजनीति में ऐसी उलटफेर ?

एक दिन के यूपी सीएम बने थे जगदंबिका पाल
उत्तर प्रदेश में 1998 में भी ऐसा ही उलटफेर हुआ था। जिसमें जगदंबिका पाल सिर्फ एक दिन के सीएम बने थे। यूपी की सियासत में ऐसी ही अचानक हुई उलटफेर के कारण दूसरे ही दिन जगदंबिका पाल को सीएम कुर्सी छोड़नी पड़ गयी। असल में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 21-22 फरवरी की रात में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की। लेकिन केन्द्र ने इस शिफारिश को ठुकरा दिया। हुआ यह था कि भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण ने बाहरी विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनायी, जिसका विपक्ष ने विरोध किया।
इसके साथ गर्वनर ने भी इस सरकार गठन पर ऐतराज जताया और सरकार बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। राज्यपाल के इस निर्णय के खिलाफ पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने और कल्याण सिंह के समर्थन में उच्च न्यायाल चले गए। जिसके बाद कोर्ट ने राज्यपाल भंडारी के निर्णय पर रोक लगा दी और दोबारा कल्याण सिंह को दोबारा उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बन गए।

मांझी को जबरन हटा कर सीएम बने थे नीतीश
2014 आम चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने नैतिकता का हवाला देकर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी। जिसके बाद, जीतनराम मांझी को अपना उत्तराधिकारी चुनकर मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन नीतीश जिन्होंने नैतिकता का हवाला देकर सीएम की कुर्सी का त्याग कर मांझी के प्रति दरियादिली दिखायी वह ज्यादा दिन तक नहीं चली। मांझी से उनका थोड़े ही दिन में मनमुटाव होना शुरु हो गया। जिसके बाद नीतीश ने मांझी को जबरदस्ती हटा कर खुद नीतीश एक बार फिर सीएम बन गए। उनका 22 फरवरी, 2015 से लेकर 19 नवंबर, 2015 तक लगभग 9 माह का कार्यकाल रहा।

2006 में कर्नाटक में मुख्यमंत्री कुमारस्वामी
कर्नाटक में 2004 में विधानसभा चुनाव के बाद जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई पर 2006 आते-आते कुमारस्वामी ने बड़ा खेल कर दिया। मुख्यमंत्री बनने के लिए कुमारस्वामी ने बीजेपी से हाथ मिला लिया और कांग्रेस को एक झटके में गठबंधन से बाहर कर दिया। बेटे के फ़ैसले से पिता एचडी देवेगौड़ा बहुत नाराज़ दिखे। देवेगौड़ा छाती पीट-पीट लोगों से कहते कि कम्यूनल बीजेपी से हाथ मिला कर बेटे ने हमें धोखा दिया है। बेटा जब बीजेपी की मदद से सीएम बन गया फिर उसे आशीर्वाद देने में पिता देवेगौड़ा ने देर नहीं की। बाद में पिता-पुत्र सब एक हो गए।

कर्नाटक में सीएम येदियुरप्पा की सरकार
कर्नाटक में 2018 में जो हुआ वह अभी भी सबको याद होगा। जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 परिणाम में बीजेपी को बहुमत मिला। बीजेपी 104 विधायकों ने चुनाव में जीत दर्ज की। जिसके बाद बीएस येदियुरप्पा ने 17 मई, 2018 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और दावा किया कि उनके पास बहुमत का आंकड़ा है।
सब रात में सब ये सोचकर सोए कि अब येदियुप्पा ही सीएम रहेंगे लेकिन 19 मई को बहुमत न मिल पाने के कारण विधानसभा में बहुमत परीक्षण से चंद मिनट पहले येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनाई जो 14 महीने ही चल पाई। इसके बाद येदियुरप्पा ने फिर मुख्यमंत्री बन कर सबको अचंभित कर दिया था।

अटलबिहारी ने एक वोट की कमी के कारण छोड़नी पड़ी थी पीएम कुर्सी
1998 में एनडीए गठबंधन की सरकार में जब अटलबिहारी प्रधानमंत्री बने लेकिन महज 13 महीने में ही सरकार गिर गई। क्योंकि तमिलनाडु की एआईएडीएमके प्रमुख जे जयललिता ने अपने रंग दिखा दिए थे । असल में उस समय तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी और एम करुणानिधि मुख्यमंत्री थे। जयललिता मांग कर रह थी कि केंद्र तमिलनाडु सरकार को बर्खास्त कर दे। जब केन्द्र सरकार ने उनकी यह मांग नहीं मानी तो जयललिता ने अपना समर्थन वापस ले लिया। प्रधानमंत्री अटल बिहारी के प्रतिनिधित्व की सरकार को सदन में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। 17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में इस अविश्वास प्रस्ताव पर बहस हुई। जिसमें बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती ने वोटिंग में हिस्सा नही लिया लेकिन चंद घंटों में पैतरा बदल दिया और एनडीए के विरोध में वोट कर दिया।
वहीं कोरापुट से सांसद गिरधर गोमांग पर जो गोमांग ओडिशा के मुख्यमंत्री थे। जिन्हें मुख्यमंत्री का कार्यकाल संभाले दो ही महीना हुआ था। इसलिए उन्हें 6 माह के अंदर ओडिशा विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुना जाना था लेकिन, उन्होंने लोकसभा की सदस्यसता से इस्तीफा नहीं दिया था। इसलिए उनका सदन में वोट करने का मौका मिला था। लेकिन गोमांग ने अटलबिहारी की सरकार के विश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट कर दिया। इतना ही नहीं अटल बिहारी की सरकार में शामिल नैशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद सैफुद्दीन सोज जो कि वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी में हैं उन्होंने धोखा दिया और भाजपा के विरोध में वोट कर दिया। सदन में अविश्वास प्रस्ताव में अटलबिहारी पक्ष में 269 वोट पड़े और विरोध में 270 वोट पड़ गए। महज एक वोट के अंतर के कारण अटल सरकार विश्वासमत हार गई।
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