इन 8 बातों पर ध्यान ना देकर भाजपा ने गंवा दिया 'बिहार'
बिहार-उपचुनाव। बीते दिनों से भाजपा लहर की जुबान पर छाया अतिआत्मविश्वास आज परिणाम के रूप में सामने आ गया। जैसे-जैसे उपचुनाव के पत्ते खुलते गए वैसे-वैसे टीवी चैनलों सभी राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं का अंदाज़ भी बदलता गया।
आगामी विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल माने जा रहे इस उपचुनाव में 'महागठबंधन' का दांव ऐसा चला कि विकास की 'लहर' टिक तक नहीं पाई। चुनावी परिणामों के साथ ही राजनैतिक विश्लेषकों ने यह तस्वीर भी साफ कर दी कि किस तरह राज्य में सियासी बिसात बिछी थी व कौन अपनी ही बिछाई चालों में बुरी तरह फंस गया।
घुमाएं यह स्लाइडर और जानें इन 8 बातों में उपचुनाव के मायने-

भाजपा विरोधी वोट अपने पाले में लाया गया
दरअसल लोकसभा चुनावों में भाजपा विरोधी वोट लगभग 45 प्रतिशत रहा था। इस महागठबंधन की रणनीति रही कि यदि यह प्रतिशत हासिल कर लिया जाए तो विजय पाई जा सकती है।

पिछड़ों को याद आए
मंडल आयोग लागू हो जाने के बाद लालू यादव कभी बिहार में पिछड़ों के सर्वमान्य नेता बन गए थे। 1991 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद का यादव-पिछड़ा-मुसलमान समीकरण बहुत आगे था। 1995 में अकेले ही लालू प्रसाद यादव की जनता दल को बहुमत मिला। उसके बाद से जब 'महागठबंधन' हुआ... तब जाकर संवदेनात्मक वोटों का सहारा मिल पाया।

सेमीफाइनल का समां
इस उपचुनाव का असर 2015 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए बेहद अहमियत रखता है। इस सेमीफाइनल की तरह ही अगर विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति रही तो 'लहर' गुमशुदा होकर रह जाएगी।

4 का वार
निर्वाचन आयोग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक इन 10 विधानसभा सीटों में भाजपा ने चार सीटें नरकटियागंज, बांका, हाजीपुर और मोहनिया (एससी) जीती हैं। आगामी चुनावी रणनीति पर भाजपा को क्षेत्रीयता की कीमत समझनी होगी व पास पलटने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे।

इंतज़ार का फल
लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से 31 सीटें भाजपा-लोजपा-रालोसपा गठबंधन ने जीती थी। 20 साल के इंतज़ार ने नरेंद्र मोदी की बनी-बनाई लहर केा चुनौती दी व महागठबंधन में लालू की अहम भूमिका ने रचे-रचाए तिलिस्मों को तोड़ दिया।

भागलपुर से पत्ता साफ
बिहार में महागठबंधन ने बीजेपी की कुछ सीटें छीन लीं जिनमें भागलपुर की सीट भी है। यहां भाजपा की हार इसलिए अहम है क्योंकि यह इलाका जनसंघ और बाद में बीजेपी का गढ़ रहा है। आखिर ऐसा क्या रहा कि बीजेपी इस बार यहां की नब्ज़ नहीं पकड़ पाई...?

नहीं छिटक पाए वोट
लालू-नीतीश गठबंधन ने हर कदम सोच-समझकर उठाया। इस बार साम्प्रदायिकता के आधार पर 'महागठबंधन' खेमे से वोट ना छिटक जाएं इसलिए एक भी अल्पसंख्यक को टिकट नहीं दिया गया। इस तरह के कदम उसके लिए वाकई काम आए...

मोदी लहर के भरोसे नहीं रहा वोटर
दरअसल अगर स्थानीय वोटर का ख्याल रखा जाता तो बात बन सकती थी। लोकसभा चुनाव में जनता ने जहां नरेन्द्र मोदी के लिए हामी भरी थी वहीं इन चुनावों में ऐसा कुछ दिखाई नहीं दिया। स्थानीय मुद्दों को बीजेपी राज्य इकाई ने मोदी लहर के भरोसे रखा तो जनता ने भी करारा झटका देने में देर नहीं लगाई...
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