सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को राहत, FIR पर रोक, सांप्रदायिक तनाव मामले में बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को एक महत्वपूर्ण अस्थायी राहत प्रदान करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर पर बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगा दी। यह एफआईआर गुजरात पुलिस द्वारा एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर दर्ज की गई थी। जिसमें प्रतापगढ़ी पर सांप्रदायिक तनाव भड़काने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने मामले में गुजरात राज्य सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी करते हुए 10 फरवरी तक कोई कार्रवाई न करने का आदेश दिया।

भड़काऊ वीडियो का आरोप
3 जनवरी 2025 को जामनगर पुलिस ने कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। यह विवाद प्रतापगढ़ी द्वारा 29 दिसंबर को अपने X अकाउंट पर पोस्ट किए गए 46 सेकंड के एक वीडियो से जुड़ा है। वीडियो में एक कविता थी। जिसे जामनगर के एक निवासी ने भड़काऊ, राष्ट्रीय एकता के खिलाफ और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया।
एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। जिनमें धर्म और जाति के आधार पर शत्रुता को बढ़ावा देना, राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देना, धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना शामिल हैं।
गुजरात उच्च न्यायालय ने खारिज की थी याचिका
इमरान प्रतापगढ़ी ने एफआईआर रद्द करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया था। लेकिन 17 जनवरी 2025 को उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने एफआईआर में लगाए गए आरोपों की जांच की आवश्यकता बताते हुए प्रतापगढ़ी द्वारा जांच में सहयोग न करने की बात कही थी।
प्रतापगढ़ी ने उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि उनकी कविता का उद्देश्य प्रेम और अहिंसा का संदेश देना था। न कि सांप्रदायिक तनाव फैलाना। उन्होंने एफआईआर को राजनीतिक साजिश करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम राहत
सुप्रीम कोर्ट में प्रतापगढ़ी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पैरवी की। उन्होंने एफआईआर और उच्च न्यायालय के फैसले पर निराशा व्यक्त करते हुए तर्क दिया कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रहार है।
न्यायमूर्ति ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया और 10 फरवरी तक एफआईआर के आधार पर किसी भी प्रकार की बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगा दी।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस का केंद्र
यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इसकी सीमाओं को लेकर भारत में चल रही बहस को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कला, कविता और राजनीति जैसे माध्यमों में व्यक्त विचारों की सीमा कहां तक होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका को दर्शाता है।
सांसद की प्रतिक्रिया
इमरान प्रतापगढ़ी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर संतोष व्यक्त करते हुए इसे सच की जीत बताया। उन्होंने कहा कि मेरी कविता का उद्देश्य केवल प्रेम और भाईचारे का संदेश देना है। इस मुद्दे को गलत तरीके से पेश किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 फरवरी 2025 की तारीख तय की है। इस दौरान गुजरात सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा।












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