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जब रतन टाटा ने खुद बताया क्यों नहीं कर पाए थे शादी? गर्लफ्रेंड ने इस वजह से किया था मना, भावुक कर देगी दास्तां

Ratan Tata Love Story: दिग्गज उद्योगपति और टाटा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन रतन नवल टाटा का 9 अक्टूबर 2024 को 86 साल की उम्र में निधन हो गया। रतन टाटा के निधन के बाद उनकी जिंदगी से जुड़े हर पहलू को लोग जानना चाहता हैं। सबसे ज्यादा रुची लोगों में रतन टाटा की निजी जिंदगी से जुड़ी बातों को जानने में है।

86 साल में दुनिया को अलविदा कहने वाले रतन टाटा ने शादी नहीं की थी और नाहि किसी संतान को गोद लिया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि रतन टाटा की जिंदगी में प्यार की कमी थी या वो कभी शादी नहीं करना चाहते थे। रतन टाटा ने खुद कई इंटरव्यू में कहा था कि उनकी पूरी जिंदगी में तीन से चार बार ऐसा वक्त आया, जब उन्होंने शादी करने का मन बना लिया था। लेकिन बार-बार वह किसी न किसी कारण की वजह से पूरा नहीं हो पाता था।

Ratan Tata Love Story

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रतन टाटा की प्रेम कहानी भी अधूरी रह गई थी। रतन टाटा ने खुद 2020 में दिए एक इंटरव्यू में अपनी पहली और अधूरी प्रेम कहानी की दांस्ता बयां की थी। जहां उन्होंने बताया था कि कैसे उन्हें एक लॉस एंजेलिस की महिला से प्यार हुआ था और वह उसको शादी करके भारत लाना चाहते थे लेकिन उनकी पहला प्यार मुकम्मल नहीं हो पाया है।

रतन टाटा ने खुद बताया क्यों उनकी प्रेम कहानी शादी तक नहीं पहुंच पाई

28 दिसंबर 1937 में गुजरात के सूरत में जन्मे रतन टाटा ने शादी नहीं की थी। सोशल मीडिया से लेकर अखबारों-टीवी पर उनकी लव-लाइफ के बारे में काफी कुछ लिखा जाता रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि रतन टाटा कभी भी शादी नहीं करना चाहते थे। साल 2020 में Humans of Bombay को दिए इंटरव्यू में रतन टाटा ने खुद बताया था कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की थी?

रतन टाटा ने इस इंटरव्यू में कहा था,

''मेरा बचपन खुशहाल था, लेकिन जैसे-जैसे मैं और मेरा भाई बड़े होते गए, हमें अपने माता-पिता के तलाक के कारण काफी परेशानियाों और व्यक्तिगत असुविधाओं का सामना करना पड़ा, जो उन दिनों आम बात नहीं थी। लेकिन मेरी दादी ने हमें हर तरह से संभाला। इसके तुरंत बाद जब मेरी मां ने दोबारा शादी की, तो स्कूल के लड़के हमारे बारे में तरह-तरह की बातें करने लगे, हमें चिढ़ाने लगे और बुली करने लगे। लेकिन हमारी दादी ने हमें हर कीमत पर शांत और सौम्य बने रहने के लिए कहा था। ये एक ऐसी सीख थी, जो हमेशा मेरे साथ रही है।''

रतन टाटा ने कहा था,

''मुझे याद है, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, वह मेरे भाई और मुझे गर्मियों की छुट्टियों के लिए लंदन ले गई थीं। वह हमसे कहती थीं, 'यह मत कहो' या 'उस बारे में चुप रहो' और यहीं से 'हर चीज से ऊपर गरिमा' हमारे दिमाग में बैठ गई। मेरी दादी हमेशा हमारे लिए खड़ी होती थी। हमारे बचपन में उन्होंने ही हमें संभाला था। अब यह कहना मुश्किल है कि कौन सही है या कौन गलत। मैं वायलिन बजाना सीखना चाहता था, मेरे पिता पियानो बजाने पर जोर देते थे। मैं अमेरिका में कॉलेज जाना चाहता था, उन्होंने ब्रिटेन जाने पर जोर दिया। मैं आर्किटेक्ट बनना चाहता था, उन्होंने मुझे इंजीनियर बनने पर जोर दिया। अगर मेरी दादी न होतीं, तो मैं अमेरिका में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में नहीं पहुंच पाता। यह उनकी वजह से ही था कि भले ही मैंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था, लेकिन मैंने अपनी पढ़ाई बदल ली और आर्किटेक्चर में डिग्री हासिल की। ​​मेरे पिता परेशान थे और काफी हद तक नाराजगी थी, लेकिन मैं आखिरकार कॉलेज में जाकर अपने फैसले खुद ही लेने लगा, मैं एक स्वतंत्र व्यक्ति बन गया और यह मेरी दादी ही थीं जिन्होंने मुझे सिखाया कि अपने लिए बोलने का साहस रखो लेकिन नरम और सम्मानजनक तरीके से।''

Ratan Tata Love Story

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1962 के भारत-चीन युद्ध की वजह से अधूरा रह गया रतन टाटा का प्यार

रतन टाटा ने कहा था,

''कॉलेज के बाद, मुझे L.A (लॉस एंजेलिस) में एक आर्किटेक्चर फर्म में नौकरी मिल गई, जहां मैंने 2 साल तक काम किया। यह एक शानदार समय था, वहां का मौसम सुंदर था, मेरे पास अपनी कार थी और मुझे अपनी नौकरी भी बहुत ज्यादा पसंद थी। एलए में ही मुझे प्यार हुआ और मैं लगभग शादी करने ही वाला था। लेकिन उस दौरान मैंने भारत जाने का फैसला किया क्योंकि मेरी दादी उस वक्त भारत में थी। मैं अपनी दादी से कई सालों से दूर था और वह सात सालों से बहुत बीमार थीं। मैं भारत में रहकर उनकी सेवा करना चाहता था। इसलिए मैं अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गया और उसको अपनी योजना बताई। मैंने सोचा कि जिससे मैं शादी करना चाहता हूं वह मेरे साथ भारत आएगी, लेकिन 1962 के भारत-चीन युद्ध के कारण उसके माता-पिता ने उसे मेरे साथ भारत आने की अनुमति नहीं दी और मेरा रिश्ता टूट गया।''

हालांकि ऐसा नहीं है कि रतन टाटा की जिंदगी का ये पहला और आखिरी प्यार था। रतन टाटा ने खुद कई बार कहा है कि उनकी जिंदगी में कई ऐसे मौके आए, जब वह प्यार में पड़े थे लेकिन उन्होंने कभी शादी नहीं की।

रतन टाटा ने दादी के आखिरी वक्त में निभाया उनका साथ

रतन टाटा ने आगे कहा, "भारत आने के बाद, मैंने अपनी दादी के साथ कुछ समय बिताया। मैं अपने कुत्ते के साथ दौड़ता, उनकी कार के साथ चलता और हम लंबी बातें करते। मुझे खुशी है कि दादी के जाने से पहले मुझे उनके साथ वह समय बिताने का मौका मिला, क्योंकि उसके ठीक बाद, मैं टाटा मोटर्स के नाम से जानी जाने वाली कंपनी में इंटर्नशिप के लिए जमशेदपुर चला गया था। यह समय की बर्बादी थी, मुझे एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजा गया और मुझे परिवार के सदस्य की तरह देखा गया, इसलिए किसी ने मुझे नहीं बताया कि मुझे क्या करना है, लेकिन मैंने 6 महीने 'उपयोगी' बनने की कोशिश में बिताए। टाटा स्टील में जाने के बाद ही मुझे खास काम मिला और मेरा काम दिलचस्प हो गया। मैंने फ्लोर से शुरुआत की और वहां काम करने वालों की दुर्दशा को वास्तव में समझा। इसलिए सालों बाद, जब हमने टाटा स्टील का आकार 78,000 से घटाकर 40,000 कर दिया, तो हमने रिटायरमेंट तक उन्हें उनका मौजूदा वेतन देना सुनिश्चित किया, जो हमारी सेवा करते हैं उनकी सेवा करना हमारे डीएनए में है।''

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रतन टाटा ने बताया कैसे टाटा संस को उन्होंने संभालना शरू किया?

रतन टाटा ने आगे कहा, ''जब मैंने जमशेदपुर में 6 साल पूरे किए, तब तक आर्किटेक्चर एक शौक बन चुका था, मुझे अपनी मां के लिए घर डिजाइन करने में मजा आता था। मैं, लेकिन इसके अलावा, मेरा जीवन व्यवसाय के लिए समर्पित था। 1991 में, जेआरडी ने टाटा इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। पहले तो कोई आलोचना नहीं हुई, लेकिन जब उन्होंने टाटा संस से इस्तीफा दिया, तो तीखी आलोचना हुई। इस पद के लिए अन्य उम्मीदवार भी थे, जो उनके गलत निर्णय लेने के बारे में मुखर थे। मैं पहले भी इससे गुजर चुका था, इसलिए मैंने वही किया जो मैं सबसे बेहतर जानता था, इसलिए मैं चुप्पी बनाए रखी और खुद को साबित करने पर ध्यान दिया।''

रतन टाटा ने जे आरडी टाटा को बताया अपना गुरु

रतन टाटा ने कहा, ''आलोचना व्यक्तिगत थी, जे आरडी को भाई-भतीजावाद और मुझे गलत विकल्प के रूप के तौर पर देखा गया था। मैं जांच के दायरे में था, लेकिन मैंने फ्योर पर जो समय बिताया, वह मेरे लिए एक बड़ा प्लस था! कुल मिलाकर, यह एक बड़ा कदम था। मुझे याद है कि जब मुझे अध्यक्ष नियुक्त किया गया, तो मैं जेआरडी के साथ उनके कार्यालय गया, जहां उन्होंने अपने सचिव से कहा कि उन्हें बाहर जाना है। मैंने कहा, 'नहीं, जे, बाहर मत जाओ, जब तक तुम चाहो, यह तुम्हारा ऑफिस है।' उन्होंने कहा, 'तुम कहाँ बैठोगे?' मैंने कहा, 'जहां मैं आज बैठा हूं- मेरा ऑफिस हॉल के नीचे है और यह ठीक है।' मैं भाग्यशाली था कि वह वहां था। वह मेरे सबसे बड़े गुरु थे और जब तक वह जीवित थे, मैं उनके ऑफिस में जाता था और कहता था, 'जे, काश यह 10 साल पहले हुआ होता, हमारे बीच बहुत बढ़िया रिश्ता है।' वह मेरे लिए एक पिता और एक भाई की तरह थे और इसके बारे में जितना कहा जाए कम है।''

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