Rajasthan Chunav: 'पायलट कहेंगे तो भी.....': कांग्रेस को भारी न पड़ जाए गुर्जरों का यह गुस्सा
राजस्थान विधानसभा चुनाव इस बार कांग्रेस के लिए चौतरफा चुनौती वाला दिख रहा है और भाजपा ने सत्ताधारी दल की इन चुनौतियों को भुनाने की तैयारी पहले से कर रखी है।
2018 के विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनते देखने की उम्मीद में गुर्जर समुदाय ने आंख मूंदकर कांग्रेस पार्टी का समर्थन किया था। कांग्रेस से 8 गुर्जर एमएलए चुने गए थे और बीजेपी से एक भी नहीं जीत पाया था।

गुर्जर बेल्ट में बीजेपी की बढ़ी है उम्मीद
इस बार भी दोनों पार्टियों ने लगभग बराबर गुर्जर उम्मीदवारों को टिकट दिया है। बीजेपी से10 और कांग्रेस से 11 गुर्जर प्रत्याशी हैं। लेकिन, इस बार गुर्जर बेल्ट में खासकर पूर्वी राजस्थान में बीजेपी की उम्मीदें ज्यादा बढ़ी हुई हैं। यह वो इलाका है, जहां सचिन पायलट और उनके परिवार का प्रभाव गुर्जरों के अलावा अन्य समुदायों पर भी दिखता रहा है।
इसके लिए बीजेपी ने लंबी योजना पर काम किया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल जनवरी में गुर्जरों के देवता देवनारायण के 1,111वें 'अवतरण महोत्सव' के असवर पर भीलवाड़ा में एक कार्यक्रम को संबोधित किया था।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक बीजेपी नेता ने पार्टी की रणनीति के बारे में कहा, 'पार्टी साफ-सुथरी छवि के साथ समुदाय तक पहुंचने का प्रयास कर रही है और यह नतीजों में नजर आएगा।'
पाटलट की 'बेइज्जती' की बदला लेंगे गुर्जर!
गुर्जर बेल्ट में भाजपा के बढ़े आत्मविश्वास के पीछे कांग्रेस के प्रति गुर्जरों के एक वर्ग की भारी नाराजगी है। मसलन, पायलट परिवार के गढ़ माने जाने वाले दौसा के मित्रपुरा का एक गुर्जर परिवार कांग्रेस से 2018 में जीत के बाद पायलट की 'बेइज्जती' का बदला लेने की बात कह रहा है। तब पायलट कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे और पार्टी की जीत में उनका बड़ा रोल माना जाता है।
'दगा कर दिया पायलट के साथ'
जैसे 52 साल के सुमेर सिंह गुर्जर कहते हैं, 'हमने कांग्रेस को तन,मन,धन से वोट दिया। पर दगा कर दिया पायलट के साथ।' तब पायलट की वजह से इलाके में कांग्रेस को इतना समर्थन मिला था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (मीणा) के उम्मीदवारों की भी जीत हुई थी। जबकि मीणा (एसटी) और गुर्जर परंपरागत तौर पर विरोधी माने जाते हैं। लेकिन, आज की परिस्थितियां बदली हुई हैं।
इसी तरह दौसा के खेरली गांव में पिता-पुत्र निहाल सिंह गुर्जर और अजय सिंह गुर्जर कहते हैं कि अगर गहलोत और पायलट के बीच 2.5-2.5 साल सीएम बनाने का फॉर्मूला लागू किया होता तो कांग्रेस को फायदा मिल सकता था।
कांग्रेस को 'सबक' सिखाने का इरादा
निहाल कहते हैं कि इस बार वे मंत्री और सिकराय से कांग्रेस की उम्मीदवार ममता भूपेश (अनुसूचित जाति की उम्मीदवार) को वोट नहीं करेंगे, चाहे उनके लिए खुद सचिव पायलट ही क्यों न प्रचार करने आ जाएं।
उनका कहना है कि वह पायलट को 'नकारा निकम्मा' कहने की वजह से कांग्रेस को 'सबक' सिखाना चाहते हैं। पायलट के लिए इन शब्दों का इस्तेमाल खुद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कई बार कर चुके हैं।
बीजेपी ने गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुवा के बेटे को दिया है टिकट
गुर्जर बेल्ट में बदलाव की बयार बहने की एक और प्रमुख वजह नजर आ रही है। यहां बीजेपी ने दौसा से सटे टोंक जिले की देवली उनियारा से विजय बैंसला को टिकट दिया है। बैंसला गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुवा किरोड़ी सिंह बैंसला के बेटे हैं, जिनका गुर्जरों में बड़ा जनाधार रहा है।
बीजेपी ने राजस्थान चुनाव की घोषणा से ठीक पहले चर्चित गुर्जर नेता और दक्षिणी दिल्ली से सांसद रमेश बिधूड़ी को टोंक जिला का चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा था। इसके पीछे भी यही वजह मानी जा रही है कि पायलट की वजह से कांग्रेस से गुर्जर समुदाय का जो मोहभंग हुआ है, उसे आसानी से अपनी तरफ जोड़ा जा सके।












Click it and Unblock the Notifications