Rajasthan Assembly Elections 2018: टिकट बंटने के बाद अब ये है मरुधरा की सियासी हकीकत
जयपुर। राजस्थान की सबसे बड़ी पंचायत में नुमाइंदगी के लिए दावेदारी का काम अंतिम दौर में है। सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस में मुकाबला बराबरी का है, फिर यह चाहे टिकट वितरण के बाद मचा बवाल हो या वंशवादियों को तरजीह या फिर पाला बदलने वालों को मौका देना हो। दोनों दलों में होड़ मची है। तीसरे मोर्चे के झंडाबदार भारत वाहिनी पार्टी के घनश्याम तिवाड़ी व राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल जैसे नेताओं की अभी दोनों दलों के बागियों पर नजरें गड़ी हैं।

क्या भाजपा खेलेगी यूपी जैसा हिंदुत्व कार्ड
भाजपा तीन सूचियों के जरिए 170 चेहरे मैदान में उतार चुकी है तो कांग्रेस दो सूचियों में 184 उम्मीदवारों का नाम घोषित कर चुकी है। टिकट वितरण के शुरुआती दौर में भाजपा ने थोड़ी बढ़त बनाई और सबसे पहले 152 नामों का ऐलान किया। आधा दर्जन मंत्रियों समेत करीब 40 विधायकों के नाम काटे। भाजपा ने अब तक एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा, जिसे लेकर प्रचार के दौरान कांग्रेस के हमले झेलने पड़ सकते हैं। यहां तक की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सबसे खास रहे और नागौर के डीडवाना का प्रतिनिधित्व करने वाले परिवहन मंत्री यूनुस खान का टिकट भी अब तक फाइनल नहीं हुआ। भाजपा ने नागौर से अन्य मुस्लिम विधायक हबीबुर्रहमान का भी टिकट काट दिया, जिसे उसके हिन्दुत्व कार्ड से जोडक़र देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि राजस्थान में भी भाजपा यूपी की तर्ज पर हिंदुत्व कार्ड खेलेगी। चर्चा यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा नागौर जिले को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने जा रही है। लिहाजा जिले से जीते दोनों मुस्लिम विधायकों को टिकट नहीं दिया।

कांग्रेस की खींचतान उजागर, देरी से बंटे टिकट
अधिकतर चुनावी सर्वे में सत्ता की ओर बढ़ती दिख रही कांग्रेस को टिकटों की पहली सूची जारी के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। सूची भाजपा के तीन दिन बाद जारी हुई। हालांकि इसमें 152 नाम आए लेकिन देरी के पीछे कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट, पूर्व सीएम अशोक गहलोत एवं विपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी के बीच खींचतान मानी गई। देरी से टिकट वितरण से कांग्रेस थोड़ा बैकफुट पर आई। उसे अंदेशा था कि टिकट वितरण के बाद बगावत के सुर उठेंगे, जो सच साबित भी हुआ। कांग्रेस में करीब 30 सीटों पर बगावत का बिगुल बज चुका है। हालांकि भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। करीब 280सीटों पर भाजपा को अपनों से चुनौती का खतरा पैदा हो गया।

पाला बदली भी चली
कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही पाला बदलने वालों को भी अहमियत दी। बस, उनकी जीत की क्षमता देखी। भाजपा सांसद हरीश मीणा और विधायक हबीबुर्रहमान को कांग्रेस ने पाला बदलते ही टिकट थमा दिया। वहीं भाजपा ने भी बसपा से आए अभिनेष महर्षि, कांग्रेस से आए रामकिशोर सैनी और अशोक शर्मा सरीखे चेहरों को तुरंत टिकट दे दिया। भाजपा में टिकट वितरण में वसुंधरा राजे की जमकर चली। आरएसएस की सिफारिशों को भी तवज्जो मिली। हाल में राजपा से आए किरोड़ीलाल मीणा भी अपने समर्थकों के लिए टिकट जुटाने में कामयाब रहे। कांग्रेस में पायलट व गहलोत टिकट वितरण में प्रभावी रहे। डॉ. सीपी जोशी व भंवर जितेंद्र सिंह की टिकटों में भूमिका सीमित रही।

बड़े नाम उतारे
कांग्रेस ने भंवर जितेंद्र के अलावा लगभग सभी बड़े नाम चुनावी मैदान में उतार दिए। भाजपा ने भी अपने तरकश के सभी तीर काम में लेने की ठान रखी है। यहां तक की बाडमेर सांसद कर्नल सोनाराम को भी विधायकी के लिए उतार दिया ताकि पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र सिंह जसोल के भाजपा छोड़ कांग्र्रेस में जाने के नुकसान की भरपाई कुछ हद तक कर सके। कांग्रेस ने मानवेंद्र को वसुंधरा के सामने उतार कर सीएम को घेरने की कोशिश की है। वहीं डॉ. सीपी जोशी को एक बार फिर अपने ही चेले महेश प्रताप सिंह से चुनौती मिलेगी। मालूम हो, वर्ष 2008 में सीपी अपने ही चेले कल्याणसिंह से एक मत से हार गए थे। तब सीपी सीएम पद के दावेदार थे। इसी तरह भाजपा ने अपने हिंदूवादी चेहरे रामगढ़ (अलवर) विधायक ज्ञानदेव आहूजा का टिकट काट उनके चेले सुखवंत सिंह को थमा दिया। हालांकि आहूजा के टिकट कटने की वजह राजे की नाराजगी मानी जा रही है।

वंशवाद के खिलाफ बोले लेकिन लिया सहारा
वंशवाद को लेकर कांग्रेस व भाजपा एक दूसरे पर निशाना भले ही साधते हो लेकिन दोनों ही इससे अछूते नहीं रहे। कांग्रेस ने डेढ़ व भाजपा ने करीब एक दर्जन सीटों पर वंशवाद का सहारा लिया। किसी के बेटे को तो किसी की बहू को टिकट थमाया।
अब चलेगी मान मनुहार
राज्य में भाजपा के सामने राज बचाने की कड़ी चुनौती है तो कांग्रेस विभिन्न सर्वे में बढ़त को लेकर उत्साहित हैं। असल में अभी दोनों दलों के सामने बागियों से पार पाना और बचे टिकटों का ऐलान बड़ी चुनौती है। जो दल बगावत का झंडा जितना झुका देगा, उतना फायदे में रहेगा। वैसे अब दोनों दल अपने बागियों की मान मनुहार पर उतरेंगे। इसमें कामयाबी ही आगे की दिशा तय करेगी लेकिन तीसरे मोर्चा दोनों के बागियों को पनाह देने की कोशिश करेगा ताकि कम से कम दो दर्जन सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया जा सके। मरुधरा में चुनावी घमासान अब दिन प्रति दिन तीखा होगा। हालांकि किस दल की रणनीति कितनी कारगर रहेगी, यह 11 दिसम्बर के नतीजे ही बताएंगे।












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