राजस्थान की सरकार रिमोट से चला रहे राहुल गांधी?
मतदाता और मतदान कहीं और था, लेकिन फ़ैसला दिल्ली दरबार में हुआ. राजस्थान में नई बनी कांग्रेस सरकार के मंत्रियों के विभागों के बंटवारे के लिए नेताओं को दिल्ली की दौड़ लगानी पड़ रही है.
इससे पहले टिकट वितरण, मुख्यमंत्री पद की प्रक्रिया और मंत्रियों के चुने जाने में भी यही हुआ.
विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस सरकार में सत्ता के दो केंद्र बन गए है. विपक्ष ने इसे लोकतंत्र का अपमान बताया है.
कांग्रेस सरकार के 23 मंत्री तीन दिन तक बिना विभाग के ही काम करते रहे, क्योंकि किस मंत्री को कौन सा विभाग मिलेगा, इसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी में धड़ेबंदी हो गई.
नतीजतन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को दिल्ली की फेरी लगानी पड़ी.
जानकर कहते हैं कि बेशक कांग्रेस ने सत्ता की लड़ाई में बीजेपी को शिकस्त दे दी है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी में अब दो गुट बन गए हैं और दोनों ही गुट सत्ता का अधिकतम हिस्सा अपने नाम दर्ज कराना चाहते है.
धड़ेबंदी, गोलबंदी जब सड़कों तक उतर आई
कांग्रेस प्रवक्ता सत्येंद्र राघव कहते है, "सबकुछ लोकतांत्रिक तरीके से हुआ है. इसमें सलाह-मशविरा और सभी से बातचीत करना शामिल है. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है."
पिछले पांच साल से वनवास काट रही कांग्रेस जब विधानसभा चुनावों के लिए मैदान में उतरी, प्रत्याशी चयन को लेकर धड़ेबंदी उभर आई.
पार्टी का एक धड़ा प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सचिन पायलट के पीछे गोलबंद हो गया जबकि दूसरा खेमा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ खड़ा नज़र आया.
पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन के लिए स्थानीय स्तर पर कमेटियां बनाई और काफी मशक्क्त की. टिकट वितरण के लिए पार्टी ने अपने पदाधिकारियों की मदद ली और छानबीन की.
लेकिन प्रादेशिक नेताओं में मतभेद उभर आये. क्योंकि हर नेता अपने समर्थक को टिकट दिलवाने की चाहत रखता था.
इस विवाद के कारण टिकट वितरण का काम दिल्ली से तय होने लगा. पार्टी की आंतरिक गुटबाजी बंद कमरों से निकलकर सड़कों पर उतर आई. नतीजतन पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी को दखल देना पड़ा और उम्मीदवारी भी दिल्ली से तय हुई.
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विधायकों की रज़ा से आगे दिल्ली का फ़ैसला
सियासी पंडितों को लगा कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा, लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद कौन मुख्यमंत्री बने, इसे लेकर कांग्रेस में फिर गुटबाजी सतह पर आ गई.
नियम-कायदे की बात करें तो मुख्यमंत्री का चुनाव विधायकों की बैठक में उनकी राय से किया जाता है, लेकिन जयपुर ने वो मंज़र देखा जब अंदर विधायकों की बैठक चल रही थी और बाहर पुलिस समर्थकों की भीड़ को काबू में रखने का प्रयास कर रही थी.
कांग्रेस नेता यही कहते रहे कि विधायकों की रज़ा से नए नेता का चुनाव होगा, लेकिन अंततः मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान भी दिल्ली से किया गया.
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बीजेपी का तंज़
बीजेपी नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने इस पर तंज़ कसा है. वे कहते हैं, "लोकतंत्र में मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल मंत्री नियुक्त करते हैं. मगर ऐसा पहली बार हो रहा है कि सब कुछ दिल्ली में तय हो रहा है."
"यह दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसा लगता है कि अब विधानसभा की कार्यवाही के दौरान हर सवाल का जवाब भी दिल्ली से पूछकर दिया जायेगा. सत्तारूढ़ पार्टी साफ़-साफ़ दो धड़ों में बंटी गई है. एक तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पायलट हैं तो दूसरी तरफ गहलोत."
राजेंद्र राठौड़ कहते हैं कि दिल्ली में चली लंबी बैठकों के बाद गहलोत को मुख्यमंत्री तो चुन लिया गया, लेकिन मंत्रिमंडल के गठन में भी सत्तारूढ़ पार्टी एक राय नहीं बना पाई.
जानकार कहते हैं कि कई-कई बार नाम तय हुए और सूचियां बनी, लेकिन फिर मतभेद उभरे और दिल्ली में मंत्रियों के नामों पर निर्णय लिया गया.
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ज़ोर आजमाइश
राजनीति पर नज़र रखने वाले अवधेश अकोदिया कहते हैं, "टिकट वितरण से लेकर मंत्री बनाए जाने तक जितनी भी घटनाएं हुई हैं, इससे साफ़ संदेश गया है कि पार्टी में सत्ता के दो केंद्र हैं."
वो कहते हैं कि जहां दो पावर सेंटर होते हैं, उसका सरकार के कामकाज और प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ता है. कांग्रेस को इसका ख़ामियाजा लोकसभा चुनावो में उठाना पड़ सकता है.
जानकार कहते हैं कि मुख्यमंत्री गहलोत ने बुधवार को मंत्रियों के विभागों का निर्धारण कर लिया था, लेकिन पार्टी का दूसरा पक्ष इससे सहमत नहीं हुआ. गृह और कार्मिक महकमे पर दोनों गुटों में ज़ोर आज़माइश हुई.
इस पर मुख्यमंत्री को अपनी सूची लेकर अचानक दिल्ली जाना पड़ा और मंजूरी लेनी पड़ी. न केवल मंत्रियों के विभागों को लेकर शक्ति परीक्षण और प्रदर्शन हुए, बल्कि राज्य सचिवालय में कमरों को लेकर भी विवाद उठता दिखा.
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'रिमोट से चल रही सरकार'
बीजेपी के प्रदेश महामंत्री भजन लाल शर्मा कहते हैं, "जब सचिवालय में बैठने के कमरों का फ़ैसला ही दिल्ली में हो रहा है तो आप इस सरकार की हालत समझ सकते है."
वो कहते हैं कि दरअसल यह सरकार रिमोट से चल रही है और इसका रिमोट दिल्ली में है.
प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष अर्चना शर्मा ने बीजेपी के इन आरोपों को ग़लत बताया है. वो कहती हैं, "लोकतंत्र में संवाद और विचार विमर्श एक ज़रूरी प्रक्रिया है. कांग्रेस संवाद और सलाह-मशविरे में विश्वास करती है."
वरिष्ठ पत्रकार सीताराम झालानी कहते हैं कि इसके पहले कभी विधानसभा चुनावों के बाद पार्टियों में नेता के चुनाव को लेकर ऐसा होते नहीं देखा गया.
"ऐसा पहली बार हो रहा है कि छोटी-छोटी बातों के लिए नेता दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं."
सियासी पंडित कहते हैं कि इन घटनाओं से लगता है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस में यह गुटबाज़ी आगे भी चलती रहेगी.
यूँ तो सियासत में हर किरदार जनसेवा की तलब दिखाता है, मगर राजनीति तब बेबस हो जाती है जब उसके पास पद कम और सेवा करने वालों की तादाद कुछ ज़्यादा हो जाए.
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