Punjab Haryana Water Issue: पंजाब-हरियाणा ही नहीं बल्कि देश के इन राज्यों में भी है नदियों के पानी पर खींचतान
Punjab Haryana Water Issue: भारत में नदियाँ जीवनरेखा मानी जाती हैं और कृषि, उद्योग, घरेलू उपयोग और पनबिजली उत्पादन के लिए जल का प्रमुख स्रोत इन पर ही निर्भर है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यही जीवनरेखा कई राज्यों के बीच तनाव और संघर्ष की वजह बन गई है।
हाल ही में पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर को लेकर विवाद चल रहा है। लेकिन देश में ये कोई ऐसा पहला मामला नहीं है जिसमें पानी को लेकर रार मची हुई है। देश के कई बड़े राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर कई सालों से गहरा टकराव चल रहा है।

आइए, विस्तार से समझते हैं कि भारत के किन राज्यों के बीच पानी को लेकर तनाव चल रहा है, क्या है इसके पीछे की वजहें और कैसे होगा इसका समाधान...
- 1. पंजाब-हरियाणा: सतलुज-यमुना लिंक (SYL) विवाद
1966 में हरियाणा के गठन के बाद उसे पंजाब से उचित जल हिस्सेदारी देने की बात कही गई थी। 1981 में SYL नहर निर्माण का समझौता हुआ ताकि सतलज का जल हरियाणा तक पहुँच सके। लेकिन पंजाब में इसका विरोध शुरू हो गया, और राजनीतिक व सामाजिक कारणों से नहर अब तक पूरी नहीं हो सकी।
हरियाणा का आरोप है कि उसे पानी नहीं मिल रहा है और पंजाब ने 9, 500 क्यूसेक पानी को घटाकर 4,000 क्यूसेक पानी कर दिया है। वहीं इससे अलग पंजाब कहता है कि उसके पास अतिरिक्त पानी ही नहीं है और वह खुद पानी की कमी से जूझ रहा है। यह विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में है, और समाधान अधर में लटका हुआ है।
- 2. कावेरी जल विवाद: तमिलनाडु बनाम कर्नाटक
कावेरी नदी दक्षिण भारत की प्रमुख नदियों में से एक है जिसे दक्षिण की गंगा कहते हैं। यह कर्नाटक के तालकावेरी से निकलकर तमिलनाडु होती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है। साल 1892 और 1924 ब्रिटिश काल में ही इसके जल बंटवारे को लेकर समझौते हुए थे, लेकिन आज के समय में पानी की माँग ने दोनों देशों के बीच तनाव पैदा कर दिया है।
विवाद कारण
देखिए तमिलनाडु में चावल की खेती अधिक मात्रा में होती है और यहां पर कोई बड़ी नदी नहीं है जो डेल्टाई क्षेत्रों में पर्याप्त पानी की आपूर्ति कर सके। कर्नाटक का तर्क है कि उसे भी बढ़ती आबादी के लिए अधिक पानी चाहिए, जबकि तमिलनाडु कहता है कि उसके धान के खेतों को निरंतर जल आपूर्ति की जरूरत है।
जल बंटवारे का ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां बंटवारे का फॉर्मूला तय किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण को जल बंटवारे की जिम्मेदारी दी लेकिन हर साल मानसून की स्थिति के अनुसार विवाद फिर से उभरता है।
- 3. कृष्णा नदी विवाद: चार राज्य एक नदी पर विवाद
कृष्णा नदी दक्षिण के चार बड़े राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है। महाराष्ट्र के महाबलेश्वर से निकलने वाली कृष्णा नदी की कुल लंबाई 1,400 किमी है और इसका बहाव क्षेत्र कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश से होकर गुजरता है जो बंगाल की खाड़ी में मिलता है।
इन राज्यों के बीच नदी के जल बंटवारे को लेकर कई सालों से विवाद चलता आ रहा है। विवाद की शुरूआत 1956 में आंध्र प्रदेश के गठन के बाद हुई जब कृष्णा जल विवाद ट्रिब्यूनल बनाया गया। कर्नाटक में बना अलमाटी बांध परियोजना भी इस विवाद का एक हिस्सा है।
ट्रिब्यूनल की भूमिका
कृष्णा जल विवाद ट्रिब्यूनल ने बंटवारा निर्धारित किया है, लेकिन राज्यों को उसमें असहमति है। राजनीतिक दबाव, मौसम की अनिश्चितता और जल की बढ़ती माँग ने स्थिति को जटिल बना दिया है।
- 4. महानदी विवाद: ओडिशा बनाम छत्तीसगढ़
900 किमी लंबी महानदी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच बहती है और इन दोनों राज्यों में इसके पानी के बंटवारे को लेकर विवाद है। इस विवाद की शुरूआत 2016 में जन्म लिया जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि महानदी पर बनाए जा रहे बांधों और बैराजोंके कारण पानी की आपूर्ति बाधित हो रही है। ओडिशा का कहना है कि इन निर्माण कार्यों से उसके हिस्से का पानी कम हो जाएगा।
सामान्य समाधान की कमी
2018 में अंतर-राज्य नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत केंद्र ने महानदी विवाद ट्रिब्यूनल का गठन किया। ट्रिब्यूनल ने 2023 में नदी बेसिन का निरीक्षण शुरू किया, जिसमें छत्तीसगढ़ के कलमा बैराज से गैर-मानसून सीजन में 1,000-1,500 क्यूसेक जल छोड़ा गया।
हालाँकि इस ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया धीमी है। राज्यों के बीच संवाद की कमी, पारदर्शिता का अभाव और आपसी अविश्वास इस विवाद को लंबा खींच रहे हैं।












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