पुलवामा आतंकी हमला: छुट्टी से ड्यूटी पर वापस लौटे थे जवान, बस 30 किलोमीटर दूर ही थी मंजिल
पुलवामा। गुरुवार को दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में नींद उड़ा देने वाले आतंकी हमले में 44 जवान शहीद हो गए हैं। ये सभी जवान अपनी छुट्टी से ड्यूटी पर वापस लौट रहे थे। जैश-ए-मोहम्मद के हमलावर ने जवानों के काफिले को निशाना बनाया और देखते ही देखते यह हमला घाटी में हुए सबसे बड़े आतंकी हमलों में तब्दील हो गया। सभी जवान जम्मू से श्रीनगर जा रहे थे और जम्मू श्रीनगर हाइवे भारी बर्फबारी की वजह से करीब एक हफ्ते तक बंद रहा था। इसकी वजह से जो जवान श्रीनगर जाने वाले थे उनकी संख्या में इजाफा हो गया और काफिले में जवानों की संख्या भी बढ़ गई। यह भी पढ़ें-पुलवामा हमला: भारत के लिए नासूर बन गया है कंधार हाइजैक में छूटा आतंकी, जैश सरगना अजहर

श्रीनगर का बख्शी स्टेडियम आखिरी स्टॉप
जवानों का काफिला जम्मू स्थित चेनानी रामा ट्रांसिट कैंप से श्रीनगर के लिए निकले थे। तड़के चले जवानों को सूर्यास्त से पहले पहुंचना था। 78 बसों में 2500 जवानों को लेकर काफिला जम्मू से रवाना हुआ था। जम्मू में सीआरपीएफ के प्रवक्ता आशीष कुमार झा ने मीडिया से बात की और कि ये जवान अपनी छुट्टी से लौटे थे। सभी जवानों को श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम स्थित ट्रांसिट कैंप में पहुंचना था। सफर करीब 320 किलोमीटर लंबा था और सुबह 3:30 बजे से जवान सफर कर रहे थे। जवान बस 30 किलोमीटर ही दूर थे अपनी मंजिल से कि इतने बड़े हमले में निशाना बन गए।

सुरक्षा में बड़ी चूक
जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी आदिल अहमद डार ने 350 किलोग्राम विस्फोटकों से लदी एक स्कॉर्पियों को काफिले की एक बस से ले जाकर टकरा दिया। हमले में इस समय करीब 20 जवान घायल हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इस बात की जांच करने में लगी हैं आखिर चूक कहां हुई और माना जा रहा है कि काफिले का इतना लंबा होना ही जवानों के लिए आफत बन गया। झा ने कहा है कि इस पूरे हमले की विस्तार से जांच की जा रही है लेकिन यह बात भी तय है कि इतने बड़े काफिले को दूर से ही देखा जा सकता है। इस तरह के काफिले के लिए हमेशा से रुकने की जगह और कहां से यात्रा फिर से शुरू होगा सबकुछ पहले से ही तय रहता है। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी इतने बड़े कॉन्वॉय पर सवाल उठाए हैं और काफी खतरनाक भी है।

हाइवे पर इतना बड़ा हमला नामुमकिन
सत्यपाल मलिक ने न्यूज चैनल इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा, '2500 जवानों के बड़े कॉन्वॉय के साथ सीआरपीएफ के दल को नहीं निकलना चाहिए था। अगर कॉन्वॉय छोटा होता तो गाड़ियां कुछ ज्यादा स्पीड से चल पाती और इस तरह का हमला हाइवे पर संभव नहीं हो पाता। कहीं न कहीं यह सुरक्षा में चूक हुई है और मैं कहूंगा कि एक नहीं बल्कि कई जगह पर सुरक्षा को नजरअंदाज किया गया।' उन्होंने कहा कि हाइवे पर पूरी चेकिंग के बाद गाड़ियां निकलती हैं और इस तरह से कार बम को कॉन्वॉय के करीब लाकर ब्लास्ट करना मुश्किल है।
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