प्रियरंजन दासमुंशी: पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सबसे मुखर आवाज़

प्रिय रंजन दासमुंशी
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पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सबसे मुखर आवाज़ अब हमेशा के लिए शांत हो गई है.

प्रियरंजन दासमुंशी पिछले नौ सालों से कोमा में थे लेकिन उनके ठीक होने की उम्मीद की किरण कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और उनके परिवार को दिलों में जलती थी.

आठ सालों के कोमा के बावजूद 2016 में बंगाल चुनाव के दौरान कांग्रेस ने 90 लोगों के कैपेंन कमेटी में उनका नाम दर्ज किया था. उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद दीपादास मुंशी ने लिस्ट देखी तो उन्हें लगा कि ये नाम ग़लती से वहां पर दर्ज हो गया है.

दीपा दासमुंशी ने पश्चिम बंगाल प्रभारी सीपी जोशी को बताया तो उन्होंने कहा कि प्रियरंजन दास मुंशी का नाम ग़लती से नहीं गया है. वो पश्चिम बंगाल के नेता हैं, उनकी अपनी पहचान है और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच में काफ़ी लोकप्रिय हैं. यही कारण हैं कि उनका नाम कमेटी के 19वें नंबर पर दर्ज है.

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दामुंशी की ताक़त

ये प्रिरंजन दासमुंशी की ताक़त थी. यूपीए में सूचना प्रसारण मंत्री रहे प्रियरंजन दास मुंशी को 2008 में जब दिल का दौरा पड़ा और पक्षाघात हुआ तब वे अपने राजनीतिक करियर के शिखर पर थे. आम लोगों की भाषा में कहे तो उनकी दिमाग की कुछ नसें इस तरह से प्रभावित हुई हैं कि उन्होंने काम करना बंद कर दिया है.

इसकी वजह से उनके शरीर के दूसरे अंग तो काम कर रहे थे लेकिन उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था और वो कोमा में चले गए.

बंगाल चुनाव में कांग्रेसियों ने प्रियरंजन दासमुंशी को काफ़ी याद किया था. माना जाता है कि प्रणब मुखर्जी के बाद दासमुंशी ही बंगाल में कांग्रेस के खेवनहार रहे थे. कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि उनका असर प्रणब मुखर्जी से कहीं अधिक रहा था.

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कांग्रेस संगठन

ऐसे में जब प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए थे, कांग्रेस को पूरे राज्य को एकजुट करने वाले नेता प्रियरंजन दास मुंशी की कमी काफ़ी खली थी.

बंगाल में प्रियरंजन दासमुंशी का प्रभाव कितना ज़ोरदार था - इसका उदाहरण कांग्रेस कार्यकर्ता 2009 के लोकसभा चुनाव का देते हैं. जब वो अस्पताल में कोमा में थे. उनकी लोकसभा सीट रायगंज से उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी चुनाव जीतीं.

इस सीट के बारे में माना जाता है कि 1998 का चुनाव हारने के बाद यहां संगठन को पूरी तरह से खड़ा करने का काम प्रियरंजन दासमुंशी ने ही किया था. 2014 में भी दीपा की जीत पक्की मानी जा रही थी.

लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी के भाई सत्यरंजन दासमुंशी भी तृणमूल के टिकट पर चुनावी मैदान में कूद गए. परिवार की आपसी खींचतान में जीत माकपा के मोहम्मद सलीम की हो गई.

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दासमुंशी की विरासत

यहां बिना उपस्थिति के बिना प्रचार प्रियरंजन दासमुंशी का असर किस कदर है, इसे सिर्फ हार—जीत से नहीं देखा जा सकता.

साल 2014 के चुनाव में जीतने वाले मोहम्मद सलीम को 3,17,515 वोट मिले थे जबकि प्रियरंजन दासमुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी को 3,15,881 वोट मिले. यानी वो सिर्फ 1,634 मतों से हारीं. वहीं प्रियरंजन दासमुंशी के भाई को 1,92,698 वोट मिले.

अब अगर दासमुंशी परिवार में मतभेद नहीं होता और उनके परिवार को मिले मतों को जोड़ कर देखा जाए तो पता चलता है कि प्रियरंजन दासमुंशी की विरासत कितनी मज़बूत है और सिर्फ़ उनका नाम लेकर चुनाव लड़ने वाला कितनी भारी जीत हासिल करता.

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राजनीतिक सफ़र

13 नवंबर, 1945 को जन्मे प्रियरंजन दासमुंशी 25 साल की उम्र में 1970 में पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए थे. अगले साल 1971 में वे दक्षिण कलकत्ता सीट जीत कर संसद में पहुंच गए.

इसके बाद उन्‍होंने साल 1984 में हावड़ा लोकसभा सीट जीती. 1985 में वे पहली बार केंद्र में मंत्री बने. दासमुंशी को चुनावों में हार का समाना भी करना पड़ा. उन्‍हें दो बार 1989 और 1991 में हावड़ा सीट गंवानी पड़ी.

लेकिन फिर वो लगातार दो बार 1999 और 2004 में रायगंज सीट पर कब्‍जा कर लोकसभा पहुंच गए. दासमुंशी की खेलों में भी खासी दिलचस्पी रही है. वे करीब 20 साल तक ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के अध्यक्ष भी रहे. पश्चिम बंगाल में फुटबॉल के प्रति आकर्षण क्रिकेट से किसी भी लिहाज से कम नहीं है.

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विवादित फ़ैसले

साल 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार में दासमुंशी न सिर्फ़ सूचना प्रसारण मंत्री थे बल्कि संसदीय कार्य मंत्री भी रहे.

सूचना प्रसारण मंत्री के तौर पर वे काफ़ी चर्चा में रहते थे. कभी उन्‍होंने AXN और फैशन टीवी पर प्रतिबंध लगाया तो कभी खेलों के प्रसारण का अध‍िकार दूरदर्शन को दिला दिया.

यही नहीं वह मीडिया पर भी नियंत्रण करना चाहते थे और इस संबंध में क़ानून लाने की तैयारी में थे, लेकिन फिर वो बीमार हो गए. अपने इन फ़ैसलों की वजह से उन्‍हें काफ़ी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा था.

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निजी ज़िंदगी

प्रियरंजन दासमुंशी ने लंबी दोस्‍ती के बाद कोलकाता की समाज सेविका दीपा दासमुंशी के साथ साल 1994 में ब्‍याह रचाया था. दोनों का एक बेटा प्रियदीप दासमुंशी है.

एक बार बीबीसी को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था, 'दोस्त तो मेरे कितने ही हैं लेकिन सबसे बड़ी दोस्त हैं मेरी बीवी. एक लंबी दोस्ती के बाद मेरे साथ उनकी शादी हुई. लेकिन दोस्त तो और भी बहुत हैं. दोस्ती के मामले में मैं पार्टी का विचार नहीं करता हूं.'

यही वजह थी कि जब केंद्र की सत्ता से कांग्रेस बेदख़ल हुई और बीजेपी ने सत्ता संभाला तो यह संदेह कई ओर से ज़ाहिर किया जा रहा था कि दासमुंशी के इलाज के लिए सरकार की ओर से दिया जा रहा पैसा रोका जा सकता था.

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लेकिन उस समय के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने साफ़ कर दिया था कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है और दासमुंशी की चिकित्सा सरकारी पैसे से जारी रहेगी. हर्षवर्धन ने उस वक्त कहा था कि दासमुंशी ने समाज के लिए काफ़ी काम किया है और अब यह समाज की बारी है कि वह उनके लिए कुछ करे.

विपक्षी नेताओं के मुंह से इस तरह की बात अपने आप में किसी नेता की शख़्सियत का अंदाज़ा देती है.

हालांकि, अब तक अस्पताल ने कभी औपचारिक तौर पर नहीं बताया कि दासमुंशी के इलाज में कितना ख़र्च आता है लेकिन कुछ ख़बरों के मुताबिक हर रोज करीब 30,000 से 40,000 रुपये का ख़र्च उनकी चिकित्सा पर आता था.

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