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Right to privacy- अपने ही पिता के फैसले के खिलाफ खड़े हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने ही पिता के फैसले को किया दरकिनार, फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि इतिहास इसकी आलोचना करेगा

नई दिल्ली। देश में आपाताकाल को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं, वर्ष 1976 में आपात काल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक गलती की थी, जब कोर्ट ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के जीने के अधिकार पर प्रतिबंध का समर्थन किया था। कोर्ट के इस फैसले का अधिकतर हिस्सा जस्टिस एमएच बेग ने लिखा था। उनके अलावा इस फैसले को जस्टिस एएन राय, जस्टिस चंद्रचूड़ और पीएन भगवती ने अपना समर्थन दिया था। हालांकि इस फैसले पर जस्टिस एचआर खन्ना पूरी तरह से असहमति जताई थी।

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गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच का हिस्सा थे जिसमें नौ जज शामिल थे और इस बेंच ने 1976 में की गई बड़ी भूल में सुधार किया है। निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार को घोषित करने के फैसले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एडीएम जबलपुर के फैसले को अवश्य बदलना चाहिए, उन्होंने कहा कि चार जजों ने जो फैसला दिया था वह पूरी तरह से गलत है।

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जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जस्टिस खन्ना का यह कहना सही था कि संविधान जीने का अधिकार और इससे व्यक्तिगत गोपनीयता का छीना नहीं सकता है। ऐसे में इसका यह निष्कर्ष निकालना कि देश के लोग अपने बहुमूल्य अधिकार जैसे व्यक्तिगत गोपनीयता, जीने का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार को छोड़ देंगे जोकि राज्य उन्हें मुहैया कराता है यह मूर्खतापूर्ण होगा। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि जब देश का इतिहास लिखा जाएगा और इसकी आलोचना की जाएगी, कोर्ट के आदेश इस लिस्ट में सबसे आगे होंगे। लोग जब पुराने फैसलों को देखेंगे तो वह कहेंगे कि जो हुआ वह कभी नहीं होना चाहिए था।

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