जगन्नाथ मंदिर के ख़जाने की ग़ायब चाबी पर राजनीति

ख़बर चौंकाने वाली ज़रूर है. पुरी के विश्वविख्यात जगन्नाथ मंदिर के रत्नभण्डार की चाबी खो गई है.

लेकिन इससे भी ताज्जुब की बात यह है कि पिछले अप्रैल की चार तारीख को इस बात का पता चलने के बावजूद राज्य सरकार ने या मंदिर प्रशासन ने अभी तक इसकी प्रशासनिक या पुलिस जांच कराना ज़रूरी नहीं समझा.

दो महीने बाद जब मीडिया ने इस बात से पर्दा हटाया, तो राज्य सरकार ने तत्काल इसकी न्यायिक जांच के आदेश दे दिए. एक चाबी के खो जाने के बारे में एक जांच आयोग बिठाने का देश में शायद ये पहला मामला है.

बता दें कि चाबी खो जाने की बात तब सामने आई जब ओडिशा हाई कोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), राज्य सरकार और मंदिर प्रशासन का एक 17 सदस्यीय दल रत्नभण्डार के ढाँचे की सुरक्षा जांच करने की तैयारी कर रहा था.

कमरा खुलने से पहले ही गुम हुई चाबी

चार अप्रैल को रत्नभंडार का अंदरूनी कमरा खोलने से पहले ही प्रशासन को ये पता चल गया था कि उसकी चाबी नहीं है.

जगन्नाथ मंदिर
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इसके बावजूद जांच दल नाज़िरखाने में पड़ी चाबी का एक गुच्छा ये समझकर उठा ले गया कि हो सकता है कि इन्हीं में से एक चाबी अंदरूनी रत्नभंडार की हो.

रत्नभंडार का 'मुआयना' करने के बाद जब टीम बाहर निकली, तो मंदिर के मुख्य प्रशासक प्रदीप जेना ने पत्रकारों को बताया कि जांच दल ने भीतरी कमरे के बाहर से टॉर्च की रोशनी के सहारे अंदर वाले हॉल का जायज़ा लिया.

उन्होंने बताया कि जांच दल को अंदर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी. लेकिन उन्होंने किसी को इस बात की भनक नहीं लगने दी कि चाबी गुम हो गई है.

चाबी गुम होने की बात शायद पता ही नहीं चलती अगर उसी दिन यानी चार अप्रैल की शाम को इस मुद्दे पर बुलाई गई मंदिर प्रबंधन कमेटी की आपातकालीन बैठक न बुलाई गई होती.

इस मीटिंग का विस्तृत ब्योरा लगभग एक हफ्ते पहले मीडिया में लीक हो गया.

कहीं खाली तो नहीं हो गया ख़जाना

मीडिया रिपोर्टों में ये कहा गया कि कमेटी के अध्यक्ष और पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने चाबी खो जाने पर आश्चर्य और गहरी चिंता व्यक्त की थी.

पुरी मंदिर
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चाबी के खो जाने की बात के साथ-साथ एक और चौंका देने वाली बात भी सामने आई.

साल 1978 में यानी पूरे 40 साल पहले आख़िरी बार रत्नभंडार में रखे गए अलंकार का जायजा लिया गया था.

स्वाभाविक रूप से ओडिशा के करोड़ों जगन्नाथ प्रेमी श्रद्धालु ये आशंका कर रहे हैं कि चाबी का खो जाना तो बस बहाना है, असल में रत्नभंडार से कुछ बहुमूल्य रत्न गायब हो चुके हैं.

पुरी शहर के रहनेवाले शिवप्रसाद रथ कहते हैं, "मामला कुछ भी हो, एक कमीशन बिठा देना एक रिवाज़ बनकर रह गया है. लेकिन अक्सर ये देखा गया है कि न्यायिक जांच में सालों साल लग जाते हैं. चूँकि भक्तों के मन में ये आशंका घर कर चुकी है कि रत्नभंडार में रखे गए हीरे, जवाहरात में से कुछ गायब हो चुके हैं, मुझे लगता है चाबी के लिए बनाए गए कमीशन की रिपोर्ट आने का इंतज़ार किए बिना सरकार को तत्काल इस बात की जांच करनी चाहिए कि 1978 में बनी इन्वेंटरी के अनुसार सभी रत्न अलंकार सही सलामत हैं या नहीं."

साल 1985 में रत्नभंडार आखिरी बार खोला गया था, लेकिन उस समय अलंकारों की गिनती नहीं हुई थी. उसके बाद 33 साल तक इसका खोला न जाना न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि मंदिर के क़ानून के ख़िलाफ़ भी है.

सालों तक होता रहा नियमों का उल्लंघन

'श्री जगन्नाथ मंदिर एक्ट, 1960' के अनुसार हर छह महीनों में रत्न भंडार खोला जाना चाहिए और हर तीसरे वर्ष नए मंदिर प्रबंधन कमेटी के कार्यभार संभालने के बाद सभी अलंकारों की जांच होनी चाहिए.

पुरी मंदिर
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लेकिन 33 साल तक इस नियम का क्यों उल्लंघन होता रहा, इस बारे में न तो सरकार मुंह खोल रही है और न मंदिर प्रशासन.

हमने मंदिर के सूचना अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापंडा और प्रशासक (नीति) प्रदीप कुमार दास दोनों से इस मुद्दे पर बात करने की कोशिश की लेकिन दोनों ने ये कहकर हाथ जोड़ लिए कि उन्हें कुछ बोलने की इजाज़त नहीं है.

मुख्य प्रशासक प्रदीप जेना से संपर्क करना संभव नहीं हो पाया. संयोग से सोमवार को ही उन्हें उनके पद से हटाकर उनके स्थान पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रदीप्त महापात्र को मंदिर का मुख्य प्रशासक नियुक्त कर दिया गया.

श्रद्धालुओंके मन में समाया शक

मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें कहा गया कि सारे अलंकार सुरक्षित हैं. लेकिन सरकार का ये बयान श्रद्धालुओं को आश्वस्त नहीं कर पाया है.

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जगन्नाथ मंदिर के छत्तीस नियोगों में सबसे प्रभावशाली दईतापती नियोग के अध्यक्ष रामकृष्ण दास महापात्र भी मानते हैं कि सारे अलंकार सही सलामत हैं. लेकिन वे चाहते हैं कि सच्चाई सामने आए.

बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा; "एक उच्चस्तरीय कमेटी की देखरेख में इसकी पूरी पड़ताल होनी चाहिए ताकि लोगों को तसल्ली हो जाए कि अलंकारों की चोरी नहीं हुई है."

गराबडू नियोग के सचिव रजत प्रतिहारी एक अहम् सवाल उठाते हैं, "जब प्रशासन को ये पहले से ही पता था कि उनके पास चाबी नहीं है तो वे रत्नभंडार में गए ही क्यों? इस ड्रामे की क्या ज़रूरत थी? चाबी खोने के बारे में पता चलने के बाद प्रशासन को सबसे पहले एफ़आईआर दर्ज करनी चाहिए थी और फिर हाई कोर्ट को बता देना चाहिए था कि चाबी गुम हो गई है."

चूँकि 1978 के बाद से रत्नभंडार नहीं खुला इसलिए इसमें अब कितने अलंकार हैं और उनकी बाज़ार में क्या कीमत होगी, ये कोई नहीं जानता.

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो जांच

लेकिन मंदिर के पुराने दस्तावेजों के आधार पर ये ज़रूर कहा जा सकता है इनकी कीमत सैकड़ों (हो सकता है हज़ारों) करोड़ रुपये होंगे.

जगन्नाथ कल्ट पर शोध करने वाले सुरेंद्र मिश्र कहते हैं, "अलंकारों की इन्वेंटरी बनाने के लिए मुंबई और गुजरात से चुने हुए जौहरी बुलाए गए थे. लेकिन वे भी उसका सही आकलन नहीं कर पाए. कुछ अलंकारों में जड़े हीरों को देखकर तो वे दंग रह गए. उन्हें समझ में ही नहीं आया कि वे किस श्रेणी के हीरे हैं. इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रत्नभंडार में रखे गए अलंकारों की क्या कीमत होगी."

इस विशाल संपदा के मद्देनज़र कुछ लोग ये मांग कर रहे हैं कि केरल के पद्मनाभ मंदिर की तरह जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की जांच भी सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में की जाए.


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