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पोखरण परमाणु परीक्षण के 20 साल, जब भारत ने दुनिया को दिखाई थी अपनी ताकत

पोखरण: आज ही के दिन 11 मई 1998 को भारत ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पोखरण में पांच परमाणु परीक्षणों में से पहला परीक्षण किया गया था। इन परमाणु परीक्षणों से भारत ने पूरे विश्व में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया तो वहीं इससे अमेरिका जैसे देश हैरान थे कि आखिर भारत ने उनकी खुफिया एजेंसी CIA के सैटलाइट्स को कैसे चकमा दे दिया। ललित मान सिंह उस समय विदेश मंत्रालय के सचिव थे।

pokhran nuclear tests, 20 years of ride when india became a legitimate nuclear power

11 मई 1998 को दोपहर 15.45 बजे भारत ने पोखरण रेंज में 3 अंडरग्राउड न्यूक्लियर टेस्ट किया। इसके बाद 13 मई को भी भारत ने 2 न्यूक्लियर टेस्ट किया जिसकी घोषणा खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने की। पोखरण परीक्षण रेंज पर 5 परमाणु परीक्षण करने के बाद भारत पहला ऐसा परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया, जिसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर ही नहीं किए थे।

ललित मान सिंह कहते हैं, ' परीक्षण के कुछ महीनों बाद विदेश सचिव के रघुनाथ ने अमेरिकी विदेश सचिव को बताया कि भारत का परमाणु परीक्षण करने का कोई इरादा नहीं था। ये परीक्षण पूरी तरह से सीक्रेट था और इस बारे में केवल पांच लोगों को मालूम था। यहां तक​कि उन्हें भी नहीं बताया गया था।'

मानसिंह बताते हैं कि इस परिक्षण के बाद भारत को बहुत मुश्किलों को सामना करना पड़ा। आर्थिक तौर पर कई प्रतिबंधों का सामना भारत को करना पड़ा। भारत को एक प्रकार से अलग-थलग कर दिया गया था। उस वक्त भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस अलगाव की स्थिति से निपटना और अमेरिका-भारत की दूरियों को कम करना। परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद ही अमेरिका ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता को स्थगित कर दिया। अमेरिका ने 200 से अधिक भारतीय इकाइयों को प्रतिबंधित कर दिया। इस लिस्ट में न केवल परमाणु ऊर्जा विभाग और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और अंतरिक्ष विभाग की इकाइयां थीं, बल्कि प्रइवेट फर्मों का एक समूह भी शामिल था, जो उनके लिए काम करता था।

अमेरिका और पश्चिम देशों के लिए, भारत पाकिस्तान के साथ परमाणु समानता की होड़ में शामिल है और अमेरिका को इस बात का डर था कि साउथ एशिया परमाणु फ्लैशपॉइंट बन जाएगा। अमेरिका के विदेश सचिव और विदेश मंत्री जसवंत सिंह के बीच कई दौर की वार्ता के बाद दूरियां कम होने लगी थीं। उस वक्त विदेश नीति के मामले में जसवंत सिंह ने एक बड़ा रोल निभाया था।

मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश जूनियर के दौर में भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बिना ही सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिए न्यूक्लियर मंच पर जगह बना रहा था। 18 जुलाई 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के संयुक्त बयान में इसकी मुहर लगी।

मानसिंह ने कहा कि इसके बाद भारत ने कुछ रिएक्टरों को IAEA के तहत रखा और परमाणु व्यापार एंव तकनीक के साक्षेदार देशों के एलीट क्लब NSG से छूट भी प्राप्त की। सितंबर 2008 में NSG से मिली राहत ने भारत पर तीन दशक से अधिक समय तक अमेरिका के नेतृत्व में लगे वैश्विक प्रतिबंध को हटाया जो 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर लगाया गया था। इसके बाद भारत को सिविलियन न्यूक्लियर तकनीक के लिए व्यापार का अधिकार भी मिल गया।

सरकार ने जून 2017 में 9000 मेगावाट क्षमता वाले 12 और रिएक्टरों के लिए प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी दे दी जोकि 2031 तक पूरा होने की उम्मीद है। साल 2031 तक 'भावीनी' द्वारा लागू की गई नीति के बाद न्यूक्लियर पावर क्षमता 22480 मेगावाट तक पहुंच जाएगी। लेकिन हमें उम्मीद थी कि देश में परमाणु ऊर्जा उत्पादन सौदे के कारण इसमें उछाल आएगा, पर ऐसा हुआ नहीं।

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