मोदी सरकार से पहले ये सरकार भी किसानों के सामने हो चुकी है नतमस्तक, हिल गई थी दिल्ली
नई दिल्ली, 19 नवंबर। राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया है। मोदी सरकार ये निर्णय सुनाते हुए अन्नदाता के सामने नतमस्तक नजर आई। ये पहला मौका नहीं है जब किसी सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा है। इससे पहले देश भर के लाखों किसान अपनी मांगों को लेकर ऐसे अड़ गए थे कि उन्होंने दिल्ली तक हिला दी थी।

32 साल पहले सरकार को किसानों के सामने टेकने पड़े थे घुटने
ये वाकया आज से ठीक 32 साल पहले 25 अक्टूबर 1988 का है। जब किसानों ने किसान बिजली, सिंचाई का मूल्य घटाने और फसल का उचित दाम के अलावा 35 सूत्री मांगों को लेकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में आंदोलन शुरू किया था। ये आंदोलन भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले किसान नेता महेंद्र सिहं के नेतृत्व में शुरू हुआ था। पश्चिम यूपी में सैकड़ों की संख्या में किसान एक साथ जुट कर दिल्ली धावा बोलने आ रहे थे लेकिन उन्हें दिल्ली लोनी बॉर्डर पर पुलिस ने रोका लेकिन किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हुए और पुलिस ने फायरिंग की और दो किसानों की मौत हो गई थी इस पर भी किसान दिल्ली जाने से हार नहीं मानी।
दिल्ली वोट क्लब में जुटे गए थे लाखों किसान
उस समय देश में राजीव गांधी की सरकार थी। 15 राज्यों के 5 लाख से अधिक किसान एकजुट होकर दिल्ली के वोट क्लब पहुंच कर हमला बोल दिया था। कांग्रेस सरकार दिल्ली में 31 अक्टूबर को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि की तैयारी में जुटी थी तभी लाखों की संख्या में किसान बैलगाड़ी और ट्रैक्टर लेकर वोट क्लब पर जुट गए और जमकर प्रदर्शन किया। यहां तक कि पुण्यतिथि कार्यक्रम के लिए बने मंच तक पर किसानों ने कब्जा जमा लिया और एक सप्ताह तक किसानों ने राजपथ पर कब्जा जमाए रखा।
राजीव गांधी को किसान नेता ने दी थी ये चुनौती
किसानों को हटाने के लिए 30 अक्टूबर की रात किसानों पर लाठीचार्ज भी हुआ लेकिन इसने आग में घी का काम किया, किसान और भड़क गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने आरोप लगाया कि उन्होंने किसानों के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार किया जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा।
किसानों के आगे झुक गई थी कांग्रेस सरकार
आखिरकार तत्कालीन कांग्रेस सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा था और तत्तकालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किसानों की 35 सूत्रीय मांगों को मानने का ऐलान किया जिसके बाद 31 अक्टूबर 1988 को दिल्ली वोट क्लब पर किसानों ने धरना समाप्त कर दिया।
कांग्रेस सरकार को बदलना पड़ा था कार्यक्रम स्थल
किसानों के आंदोलन के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाला कार्यक्रम और रैली स्थल तक बदलना पड़ा था।
अब किसानों के सामने झुकी मोदी सरकार
बता दें 2020 में मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए तीन कानून लाई थी लेकिन किसान संगठन इसको रद्द करने के लिए लगातार मांग कर रहे थे। पंजाब के किसानों ने इस कानून का विरोध शुरू किया और इसके बाद ये आंदोलन हरियाणा से होता हुआ दिल्ली तक पहुंचा और धीरे- धीरे इससे लाखों किसान जुड़ गए और यूपी समेत अन्य राज्यों में किसाना मोदी विरोधी नारे लगाने लगे। 19 88 में किसानों का नेतृत्व उनके नेता महेंद्र सिंह टिकैत कर रहे थे वहीं अब उनके बेटे राकेश टिकैत आंदोलन में किसानों का प्रतिनिधित्व करते नजर आए। किसानों का आंदोलन तेज हुआ और इस आंदोलन के चलते कई अप्रिय घटनाएं भी हुईं लेकिन मोदी सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव से पहले आखिरकार मोदी सरकार ने किसानों के आगे घुटने टेक दिए ओर लागू किए तीनों कृषि कानूनों को वापस करने का फैसला सुनाया।
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