पीएम मोदी के 370 के टारगेट से धारा 370 का क्या है कनेक्शन, कहां से लाएगी बीजेपी इतनी सीटें? समझिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए राज्यसभा में भविष्यवाणी की है कि कांग्रेस इस बार लोकसभा चुनाव में 40 की संख्या भी पार नहीं कर सकेगी। यह आंकड़ा 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को मिली सबसे कम सीटों से भी कम है। कांग्रेस को 2014 में 44 और 2019 में 52 सीटें मिली थीं।

दो दिन पहले लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने अबकी बार बीजेपी को 370 से भी ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान जताया था; और सत्ताधारी एनडीए के लिए आंकड़ा 400 पार होने की भविष्यवाणी की थी।

pm modi and target 370

पीएम मोदी के आत्मविश्वास की वजह?
सवाल है कि पीएम मोदी ने इतने आत्मविश्वास से यह दावे कैसे किए हैं? सबसे बड़ी बात है कि बीजेपी के लिए 2019 के 303 से 67 सीटें ज्यादा यानी 370 सीटें जीतने का ही भरोसा क्यों जताया है। 2029 में एनडीए को 353 सीटें मिली थीं।

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के वादे पर बीजेपी की बुनियाद पड़ी है
अगर पीएम मोदी के 370 सीटों के लक्ष्य को अब इतिहास बन चुके संविधान की धारा 370 की समाप्ति से जोड़ें तो इसकी पूरी संभावना लगती है। क्योंकि, इस मुद्दे पर बीजेपी की बुनियाद पड़ी हुई है।

यह पार्टी के सबसे पुराने और प्रमुख तीन वादों का अभिन्न अंग रहा है। इसमें अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण और यूनिफॉर्म सिविल को़ड भी शामिल है।

370 पर 2019 का फैसला 2024 में भी जिंदा रहेगा
2019 में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में दूसरी बार एनडीए की सरकार बनी तो सबसे बड़ा फैसला संविधान से अनुच्छेद को 370 को ही हटाने का था।

आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट भी इसपर मुहर लगा चुका है। अगर राजनीतिक लिहाज से देखें तो 370 का टारगेट देना, उस मुद्दे को चुनावों में भी जिंदा रखने का हो सकता है।

'राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएं' का वादा भी पूरा
भाजपा के दूसरे शासनकाल में उसके एक और प्रमुख मुद्दे का हल हुआ है। 22 जनवरी, 2024 को पीएम मोदी के हाथों ही उसी स्थान पर भगवान राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है, जिसके लिए पार्टी 'राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएं' वाला नारा पिछले करीब 5 दशकों से लगा रही थी।

कुछ अनुमानों के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को 52% हिंदू वोट मिले थे। जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री ने बीजेपी के लिए 370 और एनडीए के लिए 400 पार वाला जो लक्ष्य तय किया है, यह तभी मुमकिन है कि पार्टी को मिलने वाला हिंदुओं का वोट बढ़कर लगभग 70% तक पहुंच जाए।

तीनों प्रमुख वादों पर भाजपा ने कर दिया काम
पार्टी के तीसरे प्रमुख वादे यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड या कॉमन सिविल कोड की भाजपा शासित उत्तराखंड से शुरुआत हो चुकी है। अगर प्रधानमंत्री ने भरी संसद में इतने आत्मविश्वास के साथ अपने तीसरे कार्यकाल को लेकर इतना बड़ा दावा किया है तो उनका अंकगणित इन सभी मुद्दों से प्रभावित हो सकता है।

क्योंकि, ये सारे मुद्दे मोटे तौर पर भावनात्मक हैं, जिसका सामना करना विपक्षी दलों के लिए बड़ी चुनौती है। अगर पिछले चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन देखें तो कुछ राज्यों में उसे 100% सफलता मिली थी।

इसमें गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल हैं। इसी तरह से पार्टी ने बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भी विपक्ष को पानी पिलाया था।

कमजोर सीटों पर लंबे समय से पार्टी कर रही है काम
अगर आज की बात करें तो महाराष्ट्र और कर्नाटक में समीकरण बदलने से भाजपा के सामने नई चुनौती जरूर पैदा हुई है, लेकिन तथ्य यह है कि कमजोर सीटों को चिन्हित करके पार्टी उसे मजबूत करने के काम में पिछले एक साल से जमीनी स्तर पर जुटी हुई है।

केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन बहुत मायने रखता है। पिछली बार सपा-बसपा-आरएलडी के गठबंधन के बावजूद एनडीए को वहां 80 में से 64 सीटें मिली थीं।

राज्य में इस बार राम मंदिर के दम पर पार्टी ने उन 14 सीटों को भी जीतने की जोरदार योजना तैयार की है, जिसे वह कमजोर मानती है। इसमें रामपुर और आजमगढ़ जैसी सीटें भी शामिल हैं, जहां वह उपचुनाव जीत भी चुकी है।

बिहार में जबतक नीतीश कुमार की जेडीयू भाजपा गठबंधन से दूर था, तबतक पार्टी को एक चुनौती दिख रही थी। लेकिन, अब 40 का टारगेट सेट मान रही है।

महाराष्ट्र में एनसीपी से भरपाई का भरोसा
इसी तरह से महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों के लिए भी पार्टी ने इस बार बड़ा लक्ष्य तय किया है। शिवसेना के टूटने से उसका हौसला नहीं टूटा है, क्योंकि अजित पवार की एनसीपी से वह सीटों का गणित और मजबूत होने की संभावना मानकर चल रही है।

इन राज्यों में भी सारी सीटें जीतने का लक्ष्य
लगभग सारी सीटें जीतने का लक्ष्य इस बार पार्टी कर्नाटक, असम, झारखंड, और छत्तीसगढ़ के लिए भी रखकर चल रही है।

इन राज्यों में प्रदर्शन सुधरने का यकीन
बंगाल की 42 सीटों में से पिछली बार भाजपा 18 जीती थी, लेकिन इस बार 35 का टारगेट सेट किया है। ओडिशा में जिस तरह से बीजेडी के साथ इसका तालमेल रहा है, उससे वहां भी संख्या बढ़ने की उम्मीद लगा रही है।

पार्टी को जम्मू और कश्मीर से पिछली बार 6 में से 3 सीटें मिली थीं, लेकिन अबकी बार लगता है कि यह कम से कम 4 का लक्ष्य लेकर चल रही है और वह भी तब जब नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी में तालमेल कायम रह जाए।

दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों पर भी धमाका करने की तैयारी
जहां तक दक्षिण भारतीय राज्यों की बात है तो पार्टी को तमिलनाडु में भी इस बार पहले से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। तेलंगाना में वह 17 में से कम से कम 10 सीटों का उम्मीद पाल रही है तो केरल में कम से 2 से 3 सीटों पर धमाका करने का मंसूबा लेकर चल रही है।

कुल मिलाकर दक्षिण भारत में लोकसभा की 131 सीटें हैं, जिनमें से पिछली बार बीजेपी को सिर्फ 30 सीटें ही मिली थीं। खुद प्रधानमंत्री ने इस बार दक्षिण को साधने का पूरजोर प्रयास किया है। राम मंदिर को लेकर दक्षिण में भी एक माहौल तैयार हुआ है।

भाजपा की कोशिशों का ही परिणाम है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में सत्ताधारी दलों ने कभी भाषा के आधार पर तो कभी उत्तर दक्षिण के नाम पर और अभी टैक्स में भेदभाव के नाम पर एक सियासी वातावरण बनाने की कोशिशें की है।

संकेत यही है कि वहां भी बीजेपी की दस्तक महसूस होने लगी है और शायद इसी से पीएम मोदी का विश्वास और मजबूत हुआ है।

पीएम मोदी और भाजपा की ओर से कार्यकर्ताओं को इस बार पार्टी का वोट शेयर 50% के पार करने का टारगेट पहले ही दे दिया गया था।

ऊपर के भावनात्मक मुद्दों के अलावा भाजपा के पास लाभार्थियों का एक तगड़ा वोट बैंक भी तैयार हुआ है, जो मोदी की गारंटी के नाम पर पिछले कई चुनावों से पार्टी को भर-भर कर वोट कर रहा है।

यही नहीं बीजेपी ने अपने लिए ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है तो वह इस बार वह ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार है।

जैसे कि पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं, जहां गठबंधन के पुराने सहयोगियों के निकलने से पार्टी को ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिलने वाला है।

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