'भेड़ वाले ने दिए होंगे हथियार', पहलगाम हमले में महिला को शक, इनके पति पर आतंकियों ने चलाई थी पहली गोली
Pahalgam Terror Attack 2025: जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के पहलगाम की बैसरन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने गोली मारकर 25 पर्यटकों व एक स्थानीय व्यक्ति की जान ले ली। आखिर आतंकियों को हथियार किसने मुहैया करवाए होंगे? आतंकियों का असली मददगार कौन रहा होगा? इस सवाल का जवाब पहलगाम आतंकी हमले की चश्मदीद 29 वर्षीय महिला ऐशान्या ने दिया है।
ऐशान्या पहलगाम हमले में मारे गए सीमेंट कारोबारी शुभम द्विवेदी की पत्नी हैं। ये उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले हैं। परिवार के 11 सदस्यों के साथ घूमने कश्मीर गए थे। 31 वर्षीय शुभम वो पहले व्यक्ति थे, जिन्हें आतंकियों ने सबसे पहले गोली मारी थी। फिर करीब 45-50 मिनट तक आतंक का माहौल रहा और आतंकियों ने एक-एक करके करीब 26 लोगों को मार दिया।

न्यूज चैनल आजतक को हाल ही में दिए इंटरव्यू में ऐशान्या ने पहलगाम आतंकी हमले की आंखों देखी बयां की है। आइये जानते हैं कि पहलगाम हमले की पूरी कहानी खुद ऐशान्या की जुबानी।
2 बजकर 10 मिनट पर पहुंचे बैसरन घाटी
इंटरव्यू में ऐशान्या बताती हैं कि हम 2 बजकर 10 मिनट पर ऊपर (बैसरन घाटी) पहुंचे थे। करीब 2 बजकर 15 मिनट पर हमने मैगी का ऑर्डर दिया। मुख्य प्रवेश से महज 30 मीटर ही दूर थे। ऑर्डर देने के बाद वहीं बैठकर मैगी व कॉफी का इंतजार कर रहे थे।
2 बजकर 22 मिनट पर शुभम ने अपने पिता को फोन करके जानकारी दी थी कि वे सुरक्षित ऊपर पहुंच गए हैं। 15-20 मिनट ऊपर घूमकर वापस नीचे आ जाएंगे। फिर शुभम ने मुझे मोबाइल में टाइम दिखाकर बोला कि 2 बजकर 25 मिनट हो रहे हैं बेबी। 2:45 तक नीचे चलेंगे। पूरी फैमिली के साथ लंच करेंगे।
यह भी पढ़ें- Fact Check: पहलगाम हमले के बाद पकड़ा गया पाक का बड़ा झूठ, ले. जनरल को पद से नहीं हटाया, आज रिटायरमेंट
मेरी बहन शाम्भवी हम दोनों (ऐशान्या व शुभम द्विवेदी) से करीब 30 मीटर की दूर पर बैठी थी। वह हम नवविवाहित जोड़े को प्राइवेसी दे रही थी। शाम्भवी को शुभम ने चिड़ाकर बोला कि देखो! मैं तुम्हारी कॉफी पी रहा हूं। इसी दौरान सामान्य कपड़े पहने एक अनजान शख्स पीछे की तरफ से हमारे पास आया। हम समझ ही नहीं पाए कि वह आतंकवादी है या कोई और बाहरी व्यक्ति।
वो आतंकी आर्मी की ड्रेस में नहीं था
हमारे पास आया वह शख्स आर्मी की ड्रेस में नहीं था। बाकी आतंकियों ने आर्मी की ड्रेस पहन रखी हो तो मुझे पता नहीं। उसके हाथ में गन थी, जिसका मुंह नीचे की ओर था। घाटी में बहुत सारे गेम चल रहे थे। हमें लगा कि वह हमें भी किसी गेम के लिए बुलाने आया होगा। उसने अचानक पूछा-हिंदू हो या मुस्लिम? हमने उसे पलटकर देखा और चेहरे पर मुस्कान के साथ उससे पूछा कि क्या हुआ भैया?
हिंदू सुनते ही शुभम को मार दी गोली
वह हम दोनों की आंखों में देखते हुए तेज आवाज में बोला कि हिंदू हो गया मुसलमान? मुस्लिम हो तो कलमा पढ़ों। हम दोनों पति-पत्नी ने उसे गर्व व मुस्कान के साथ जवाब दिया कि हम हिंदू हैं। हमारा वाक्य भी पूरा नहीं हुआ था कि उसने शुभम को गोली मार दी। शुभम की तुरंत मौत हो गई। अगर उसकी सांसें भी चल रही होती तो यकीनन वह मुझे आई लव यू बोलकर जाता।
शुभम के बाद बाकी लोगों को मारा
शुभम बहुत प्यार करता था मुझसे। कुछ नहीं छोड़ा। गोली लगने के बाद उसका दिमाग बाहर आ गया था। फिर उसने शुभम को चेक किया। उसके बाद आतंक मचाना शुरू कर दिया। उनको पता था कि पहली गोली चलाने के बाद अब जितनो को मार सकते थे मार दिया। वरना लोग यहां से भाग जाएंगे। उसके बाद वे लोगों मारते ही जा रहे थे। मैं बेसुध थी, मगर गोलियों की आवाज सुन पा रही थी।
हर इंसान को पूछा-हिंदू हो या मुस्लिम?
इंटरव्यू में ऐशान्या आगे बताती हैं कि आतंकी कोई हड़बड़ी में नहीं थे। उनके पास इतना टाइम था कि वे हर इंसान को उसका धर्म पूछ-पूछकर मार रहे थे। पति को खो देने वाली कई महिलाओं ने उनको कहा कि हमें मार दो तो वे बोले जाओ जाकर अपनी सरकार को बताओ। उन्होंने महिलाओं को नहीं मारा। उनके पास पूरा समय था। उन्हें पता था कि यहां कोई मदद नहीं आने वाली।

हमें किसी ने रेस्क्यू नहीं किया
आतंकी हमले के बाद हमें किसी ने रेस्क्यू नहीं किया। मुझे मेरी बहन नीचे लेकर आई। नीचे आकर करीब 2 बजकर 50 मिनट 3 बजे के बीच मैंने अपने ससुर को फोन करके सारी बात बताई। पूरी तरह से नीचे आने में करीब 45 मिनट लगे। न रास्ते में कोई मदद मिली और न नीचे। नीचे जम्मू-कश्मीर पुलिस के तीन जवान मिले। उनको और हमें तब भी बैसरन घाटी में गोलियों की आवाज सुनाई दे रही थी।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने मदद नहीं की
नीचे जम्मू कश्मीर के तीन जवानों से हाथ जोड़कर बोला कि मेरा पति ऊपर है। उसे किसी ने मार दिया। हमारी मदद करो। इस पर जम्मू-कश्मीर पुलिसकर्मियों ने सीधा जवाब दिया कि वे कुछ नहीं कर सकते। जब हम पहलगाम छोड़ रहे थे तब आर्मी का काफिला बैसरन की ओर जाते देखा। उससे पहले कोई मदद नहीं मिली।
आतंकी हमले से पहले किसी पर शक
वह जम्मू-कश्मीर में हमारे परिवार का आखिरी दिन था। पहलगाम आतंकी हमले से पहले सब कुछ ठीक था। रास्ते में जगह-जगह भारतीय सेना के जवान तैनात नजर आए। 30-30 मीटर की दूरी पर जवान तैनात दिखे। इस वजह से हम बहुत सुरक्षित महसूस कर रहे थे। इसलिए हमें अनजान लोगों की बातों पर भी कोई शक नहीं हुआ। वो सब घटना के बाद शक पैदा कर रहे हैं।
आतंकियों ने हथियार इन लोगों ने दिए होंगे
जो अनजान शख्स हमारे पास आया था उसने सामान्य जिंस-टीशर्ट पहन रखी थी। उन कपड़ों में तो वह कहीं से हाथ में AK-47 लेकर नहीं आ सकता। उसको वहां पर किसी ने हथियार मुहैया करवाए हैं। सूट व शॉल बेचने वालों ने उसे हथियार दिए होंगे। वहां पर इतने बड़े घास के मैदान में एक अकेला बंदा भेड़ चरा रहा था। वो सब सोचकर अब लगता है कि क्या पता उस भेड़ चराने वाले ने हथियार उपलब्ध करवाए होंगे। वो संदिग्ध है या नहीं। पता नहीं। भेड़ चराने वाले ने कश्मीर के पारम्परिक कपड़े पहन रखे थे, जिन्हें जिनमें कुछ छुपा हुआ हो तो भी पता नहीं चलता। पूरा शक है कि आतंकियों को हथियार उन्हीं लोगों ने उपलब्ध करवाए हैं।
घोड़े वाले ऊपर ले जाने पर दबाव डाल रहे थे
इनके अलावा जिन बातों पर शक हुआ वो था घोड़े वालों का बार-बार पूछना कि आप लोग कपल हैं या नहीं। हम परिवार के 11 सदस्य थे। इससे पहले बाली व मसूरी होकर आए थे। शुभम कभी ऐसी जगह नहीं जाता था, जहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता हो। शुभम ने शंका जताते हुए घोड़े वाले से पूछा भी था कि ऊपर नेटवर्क तो है ना? तो वो बोले कि आप चिंता मत करो। वहां नेटवर्क है। घोड़े वालों की गतिविधि संदिग्ध लगने पर हमारे परिवार ने ऊपर जाने से मना कर दिया था तब वे जबरन ऊपर ले गए थे।
यह भी पढ़ें- Fact Check: इंडियन आर्मी को खुली छूट से कांप रहा पाकिस्तान, LoC पर राफेल जेट मार गिराने का दावा झूठा












Click it and Unblock the Notifications