पहलगाम अटैक में आतंकियों ने बनाया सोशल मीडिया को नया हथियार, अफवाहों और प्रोपेगेंडा से फैला रहे भ्रम
Pahalgam Attack: हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर से यह साफ कर दिया है कि आतंकवाद केवल हथियारों के जरिए ही नहीं, बल्कि अफवाहों और प्रोपेगेंडा के माध्यम से भी तेजी से फैलाया जा रहा है।
आतंकी सोशल मीडिया के माध्यम से इस हमले को लेकर लगातार अफवाहें फैला रहे हैं और लोगों को इस पर गुमराह कर रहे हैं। बता दें कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए टेरर अटैक में अब तक 27 लोगों के मारे जाने और 20 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आ रही है।

मरने वालों में एक आईबी अधिकारी और नौ सेना के लेफ्टिनेंट की मौत की खबर आई है। इसी को आधार बना कर सोशल मीडिया पर गलत दावे किए जा रहे हैं।
Pahalgam Attack में मारे गए IB ऑफिसर, छुट्टी पर आए थे
इस हमले में भारतीय खुफिया एजेंसी (आईबी) के एक अधिकारी की उनके परिवार के सामने बेरहमी से हत्या कर दी गई। ये अधिकारी छुट्टी पर थे और अपने परिवार संग शांति से समय बिता रहे थे। हालांकि, इसके बाद कुछ सोशल मीडिया चैनलों और संदिग्ध खबर फैलाने वाले प्लेटफॉर्म्स ने यह अफवाह फैलानी शुरू कर दी कि "कई आईबी अधिकारी घायल हुए हैं"।
यह बयान पूरी तरह से भ्रामक और खतरनाक है। जिस अधिकारी की हत्या की गई, वे छुट्टी पर थे और अपने कर्तव्यों से अस्थायी रूप से दूर थे। इस बात का आतंकियों को भी अच्छी तरह से पता था, इसके बावजूद इस घटना को अंजाम दिया गया। इससे स्पष्ट है कि यह कोई "जवाबी कार्रवाई" नहीं, बल्कि एक सुनियोजित हत्या थी, जिसे अफवाहों के जरिए सही ठहराने की चाल चली जा रही है।
Pahalgam Attack: आतंकियों की साजिश, अफवाहों को बनाया हथियार
सीधे तौर पर देखा जाए तो इन अफवाहों का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों ने एक सुनियोजित प्रचार अभियान के तहत किया है जो किसी हथियार से ज्यादा घातक है। उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट शेयर किए जिनमें यह तर्क दिया गया कि यह हमला "जवाबी कार्रवाई" थी-जिसे वे खुद ही फैलाए गए फर्जी दावों के जरिए सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि आतंकवादी संगठनों द्वारा ऐसे झूठे नैरेटिव फैलाना न केवल हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश है, बल्कि इससे स्थानीय जनता और पर्यटकों के बीच डर और भ्रम भी फैलता है। इससे राज्य में शांति बहाल करने, लोगों का भरोसा वापस लाने की कोशिशों को बहुत गहरा धक्का पहुंचता है।
घाटी में तेजी से पांव पसार रहा TRF
भले ही दहशत की दुनिया में TRF एक नया नाम हो सकता है लेकिन इसकी जड़ें पुराने और घातक आतंकी नेटवर्क से जुड़ी हुई हैं। इसका मकसद भारत में अस्थिरता फैलाने के साथ-साथ घाटी में आतंक को एक "लोकल मूवमेंट" के रूप में पेश करना है।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए इसकी सोशल मीडिया पर मजबूत नेटवर्किंग और स्थानीय युवाओं को गुमराह करने की रणनीति चिंता का विषय बनी हुई है।
- सोशल मीडिया पर किसी भी हमले की जिम्मेदारी लेना और उस पर गलत जानकारी देना TRF के काम करने की यही स्ट्रेटजी है।
- सोशल मीडिया का प्रयोग करके यह संगठन अपने पोस्ट, वीडियो और स्टेटमेंट के माध्यम से युवाओं को कट्टरपंथी विचारों से जोड़ने का प्रयास करता है।
- TRF छोटे समूहों में और हिट एंड रन की तरह काम करती है और त्वरित हमले करती है।
- प्लाजिबल डिनायबिलिटी (Plausible Deniability) TRF जैसे नए नामों का उपयोग करके पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों से सीधा संबंध होने से इनकार कर सकता है।
TRF को लश्कर-ए-तैयबा के हिट स्क्वाड के तौर पर भी देखा जाता है पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग की घटनाओं में इजाफा हुआ है, जिसमें TRF की भूमिका प्रमुख रही है। संगठन ने कश्मीरी पंडितों, गैर-मुस्लिम नागरिकों, स्थानिय नेताओं, पंचायत सदस्यों और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाया है।
2022 में जम्मू-कश्मीर पुलिस के अनुसार, मारे गए आतंकियों में सबसे ज्यादा TRF और लश्कर से जुड़े थे। इसके अलावा आतंक के रास्ते पर चलने वाले 100 युवाओं में से 74 ने TRF जॉइन किया। ये संगठन सरकार से रुष्ट घाटी के नौजवानों को बरगला कर उन्हें दहशत फैलाने की ट्रेंनिग देता है।
Pahalgam Attack पर झुठे और भ्रमाक पोस्ट पर सख्त कार्रवाई
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, वे इन फर्जी खबरों और अफवाह फैलाने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स पर नजर रखे हुए हैं और जल्द ही इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सुरक्षा एजेंसियां लगातार इस बात को लेकर सतर्क हैं कि आतंकियों द्वारा प्रोपेगैंडा के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल न हो सके।
जनता से भी अपील की गई है कि वे किसी भी अपुष्ट खबर पर विश्वास न करें और केवल सरकारी या विश्वसनीय मीडिया स्रोतों से ही जानकारी लें।
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