OPINION: कांग्रेस की 'गारंटी' और बीआरएस का 'भरोसा', तेलंगाना में क्या होगा?

तेलंगाना में चुनावी जंग की तैयारी हो चुकी है। कांग्रेस वहां हर हाल में सत्ता में आना चाहती है। जिस तरह से सोनिया गांधी ने सीधे मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को निशाना बनाने की कोशिश की है, उससे साफ है कि लड़ाई खूब जमकर होने वाली है। बीआरएस सत्ता में है और वह पहले ही उम्मीदवारों का नाम घोषित करके इस रेस में बाकियों से आगे हो चुकी है।

कांग्रेस ने हैदराबाद में सीडब्ल्यूसी की बैठक करके और कर्नाटक से भी ज्यादा गांरटियों वाला चुनावी वादा करके उसकी रफ्तार पर ब्रेक लगाने की कोशिश में है। पार्टी के थिंक टैंक और उसके नेताओं को लगता है कि ये लुभावनी गारंटियां ही कर्नाटक की तरह ही तेलंगाना में भी उसकी सत्ता में काबिज होने की गारंटी बनने वाली हैं। लेकिन, होना तो वही है जो प्रदेश के मतदाताओं ने तय करके रखा हुआ है।

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कांग्रेस को अपने वादों की 'गारंटी' पर यकीन
कांग्रेस के बड़े नेताओं के हावभाव से लगता है कि वह दक्षिण के एक और राज्य में सरकार बनाने जा रही है। पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया ने प्रदेश के नेताओं से कहा है कि किसी भी हाल में तेलंगाना में जीत सुनिश्चित करनी है। पिछले कुछ चुनावों से कई राज्यों में कांग्रेस की गारंटियों ने उसे सत्ता तक पहुंचाया भी है और तेलंगाना के लिए भी उसका ऐसा मानकर चलना स्वाभाविक भी है। 2018 में पार्टी ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इसका स्वाद चख लिया था; और हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के चुनावों में ऐसी गारंटियों के माध्यम से उसकी सत्ता की भूख और जग चुकी है।

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बीआरएस को केसीआर के काम पर भरोसा
लेकिन, तेलंगाना को लेकर यह बहुत बड़ी बहस का मुद्दा है कि क्या सिर्फ इन लुभावने वादों से राज्य में सत्ता के शिखर तक पहुंचना आसान है। क्योंकि, केसीआर सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं में कोई कमी नहीं छोड़ी हुई है। हर परिवार किसी न किसी योजना का लाभार्थी है। कांग्रेस का कहना है कि उसकी गारंटियां बीआरएस के वोट बैंक को हिला देगी। लेकिन, बीआरएस नेताओं का कहना है कि ऐसा संभव ही नहीं है।

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कांग्रेस की 'गारंटियों' पर किसको भरोसा?
बीआरएस के नेताओं का दावा है कि जनता को कांग्रेस के खोखले वादों में भरोसा नहीं है। मुख्यमंत्री केसीआर की रायथु बंधु योजना से किसानों को हर साल 10 हजार रुपए प्रति एकड़ की सहायता मिल रही है। इस योजना के तहत किसानों के खातों में अबतक 75 हजार करोड़ रुपए डाले जा चुके हैं। कांग्रेस ने इसी योजना को चुराकर सिर्फ उसका नाम बदला है और रायथु भरोसा कह रहे हैं। बीआरएस नेताओं का कहना है कि किराएदार किसानों या काश्तकारों से रायथु भरोसा का वादा करने का क्या मतलब है। ऐसे काश्तकारों की पहचान बड़ी मुश्किल है। यही नहीं क्या जमीन को लेकर जो निवेश सहायता दी जाएगी, वह उसके असली मालिकों को मिलेगी? या फिर यह किराएदार किसानों को मिलेगा? या फिर यह दोनों को दिया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है।

दलील ये भी दी जा रही है कि क्या एक करोड़ से ज्यादा किराएदार किसानों और मजदूरों को यह सहायता दे पाना संभव है। कहा जा रहा है कि पिछले चुनावों में भी उन्होंने केसीआर के लिए वोट दिए थे, जिन्होंने लोन माफी का वादा किया था। इस बार भी यही अनुमान लगाया जा रहा है कि वे कांग्रेस के वादों पर भरोसा कर लेंगे, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं दिख रहा है।

कट-कॉपी-पेस्ट पर कौन करेगा भरोसा?
कहा जा रहा है कि कांग्रेस की 'इंदिराम्मा इंदलू' की घोषणा फिर से गृहलक्ष्मी योजना की नकल है। प्रदेश सरकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जातियों के परिवारों को पहले ही 100 यूनिट मुफ्त बिजली दे रही है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने इसी को कॉपी करके उसमे 100 यूनिट और जोड़कर 'गृह ज्योति' योजना की डफली बजाई है। बीआरएस नेताओं का मानना है कि पेंशन वाला वादा भी कांग्रेस कभी पूरा नहीं कर पाएगी।

बीआरएस को अपने वोटरों पर भरोसा
किसी भी वादे और आश्वसानों का महत्त्व तब है, जब वह राज्य को मिलने वाले राजस्व और खर्चों की वास्तविकता पर आधारित हो। लेकिन, कांग्रेस की 6 गारंटियों के विश्लेषण से जानकारों को लगता है कि इन्हें पूरा करने के लिए तेलंगाना का अपना बजट कम पड़ जाएगा। कर्नाटक में इसका प्रभाव नजर आने भी लगा है, जहां मंत्री ही कहने लगे हैं कि इस साल तो विकास योजनाओं को भूल जाओ। शायद यही सब सोचकर सत्ताधारी बीआरएस के नेता कांग्रेस के वादों से निश्चिंत हो गए हैं। क्योंकि, उन्हें नहीं लगता कि वोटरों पर इसका असर पड़ने वाला है।

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