तुर्की से 'ऑपरेशन दोस्त' पूरा कर लौटीं देश की बेटी मेजर बीना तिवारी, बताया कैसे रहे बीते 10-12 दिन
तुर्की में आए भूकंप में हजारों लोगों की कई हजार लोगों की मौत हो गई है। भूकंप के बाद भारत सरकार ने भारतीय सेना, एनडीआरएफ और वायुसेना की टीम को रेस्क्यू ऑपरेशन के तहत 'ऑपरेशन दोस्त' के लिए टीम भेजी थी।

Major Beena Tiwari: ऑपरेशन दोस्त के तहत तैनात भारतीय सेना की मेडिकल टीम 12 दिनों के ऑपरेशन और भूकंप प्रभावित तुर्की में 3500 से ज्यादा मरीजों का इलाज करने के बाद सोमवार को गाजियाबाद के हिंडन हवाई अड्डे पर भारत पहुंची।ऑपरेशन दोस्त के तहत भारत से गई मेजर बीना तिवारी इन दिनों चर्चाओं में हैं। भारतीय सेना की मेजर बीना तिवारी 60 पैराशूट फील्ड अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर काम रही हैं। मेजर बीना तिवारी उस वक्त चर्चाओं में आई थीं, जब उनकी तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वह तुर्की महिला को गले लगाते हुए दिख रही थीं। अब उन्होंने 'ऑपरेशन दोस्त' के तहत तुर्की में बिताए अपने 10 से 12 दिनों के अनुभव को साझा किया है।

मेजर बीना तिवारी ने बताया कैसा रहा एक्सपीरियंस
भारतीय सेना की मेजर मेजर बीना तिवारी ने कहा, 'मेरा नाम मेजर बीना तिवारी है। मैं 60 पारा फील्ड हॉस्पिटल में पोस्टेड हूं। मैं वहां एक मेडिकल ऑफिसर हूं। अभी हम लोग 'ऑपरेशन दोस्त' पूरा करके तु्र्की से लौटे हैं। हमें वहां जाना है, ये हमें जैसे ही बताया गया था उसके 10-12 घंटे में हमनें वहां जाने की पूरी तैयारी कर ली थी और आगर एयरपोर्ट स्टेशन से रवाना हुए थे। तु्र्की पहुंचने के बाद शुरुआत में वहां के हालात देखकर हमें काफी डाउट हुआ क्योंकि हर तरफ दिख रहा था कि काफी नुकसान हुआ है। जान और संसाधनों का जबरदस्त नुकसान हुआ है, वो हमें साफ तौर पर दिख रहा था।''

'हमने एक अस्पताल के पास अपना हॉस्पिटल खोला...'
भारतीय सेना की मेजर मेजर बीना तिवारी ने कहा, ' वहां पहुंचकर हमें काफी मुश्किल हुई ये देखने में कि अस्पताल कहां बनाना है। तमाम अव्यवस्थाओं के बीच, अस्पताल स्थापित करने के लिए जगह तलाशना भी मुश्किल था। लेकिन दूसरे अधिकारियों की मदद से हमें एक लोकेशन मिली, जो कि स्कूल था और एक हॉस्पिटल के पास था। हमने उस स्कूल में अपना अस्थाई अस्पताल स्थापित कर लिया।'

'10-12 दिनों में हमने 3,600 से अधिक मरीजों को देखा'
मेजर बीना तिवारी ने आगे कहा, ''हमें वहां के लोकल और तुर्की सरकार से भी बहुत मदद मिली है। वहां के स्थानीय लोग बहुत मददगार थे। उन्होंने हमें बिल्कुल होमली फील करवाया, हम वहां अकेले काम बिल्कुल नहीं कर रहे थे। हमारी पूरी टीम और लोकल वॉलिंटियर्स की पूरी टीम वहां थी। सबकी मदद से हमने वहां पर हॉस्पिटल सेटअप किया। हॉस्पिटल सेटअप होने के 1-2 घंटे के भीतर हमारे पास मरीज आने लगे थे और उनका आना थमा नहीं। हमने वो अस्पताल चौबीसों घंटे चलाया और लगभग 10-12 दिनों में हमने 3,600 से अधिक मरीजों को देखा।''












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