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अब भारत में इच्छामत्यु के लिए वसीयत लिख पाएंगे लोग

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    सुप्रीम कोर्ट
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    सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु को लेकर अहम फ़ैसला दिया है. कोर्ट ने लिविंग विल और पैसिव यूथेनेसिया को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी है.

    कॉमन कॉज नाम की ग़ैर सरकारी संस्था की याचिका पर कोर्ट ने ये फ़ैसला सुनाया है.

    कॉमन कॉज की सीनियर रिसर्च एनालिस्ट अनुमेहा झा ने अपनी मांगों के बारे में बताया, "हम चाहते थे कि किसी भी इंसान को होशो हवास में अपनी लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु के लिए वसीयत लिखने का अधिकार मिले. अगर भविष्य में वो गहरे कोमा में चला जाते हैं या किसी ऐसी बीमारी का शिकार हो जाते हैं कि वो ठीक नहीं हो सकते, तो उन्हें कृत्रिम लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम से ज़िंदा ना रखा जाए. बल्कि उसे प्राकृतिक तौर पर और सम्मान से मरने का अधिकार दिया जाए."

    याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने बताया -

    • कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ये फ़ैसला लेने का पूरा अधिकार है कि अगर उसके ठीक होने की उम्मीद नहीं है तो उसे लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ज़िंदा ना रखा जाए. उस व्यक्ति के फ़ैसले का डॉक्टर और उनके परिवार को सम्मान करना होगा.
    • किसी की भी पैसिव यूथेनेसिया और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (लिविंग विल) क़ानूनी रूप से मान्य होगी. यानी कोई भी व्यक्ति लिविंग विल छोड़कर जा सकता है कि अगर वो अचेतअवस्था में चला जाए और स्थिति ऐसी हो कि अब सिर्फ कृत्रिम लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की मदद से ही उसे ज़िंदा रखा जा सकता है, उस हालात में उसकी वसीयत का सम्मान किया जाए.
    • अगर कोई व्यक्ति अचेत है और विल नहीं लिखी है और उसे सिर्फ़ लाइफ सपोर्ट सिस्टम से ही ज़िंदा रखा जा सकता है. तो उसका इलाज करने वाले डॉक्टर और उसके परिजन मिलकर फ़ैसला ले सकते हैं.

    सुप्रीम कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड बनाने की भी बात कही है, जो किसी की इच्छा मृत्यु की याचिका पर विचार करेगा.

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    इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष के के अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया है.

    उन्होंने कहा, "हर व्यक्ति को अपना इलाज कराने या ना कराने का अधिकार है. अब वो ये फ़ैसला कर सकता है कि उसे अपना इलाज किस लेवल तक कराना है और उसकी मौत को पोस्टपोंड करने की ज़रूरत है या नहीं."

    उन्होंने बताया, "मेडिकल प्रैक्टिशनर बीते दस साल से लिविंग विल की मांग कर रहे थे. किसी भी व्यक्ति को अधिकार है ये फ़ैसला लेने का कि उसे वेंटिलेटर चाहिए या नहीं."

    वहीं दिल्ली के एक अन्य डॉक्टर कौशल कांत मिश्रा ने कहा, "कई बार एक्सिडेंट, न्यूरोलॉजिकल और स्टेज फोर कैंसर जैसी बीमारियों में बचने की उम्मीद नहीं होती और डॉक्टर को पता होता है कि मरीज़ कमबैक नहीं करेगा. लेकिन क्योंकि मरीज का ब्रेन डेड हो जाता है और हार्ट काम कर रहा होता है. ऐसे में उसे वेंटिलेटर पर रख दिया जाता है."

    बेल्जियम में बच्चे ने चुनी इच्छा मृत्यु

    पैसिव यूथेनेसिया की पहले मिल चुकी है इजाज़त

    40 साल से लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम के सहारे ज़िंदा रही मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 मार्च 2011 को पैसिव यूथेनेसिया की इजाज़त दे दी थी.

    केंद्र सरकार ने भी एक ड्राफ्ट बिल "मेडिकल ट्रीटमेंट ऑफ टरमिनली इल पेशेंट (प्रोटेक्शन ऑफ पेशेंट एंड मेडिकल प्रेक्टिशनर) बिल, 2016" तैयार किया था. इसमें पैसिव यूथेनेसिया की बात तो थी लेकिन 'लिविंग विल' शब्द का कहीं उल्लेख नहीं था.

    12 अक्तूबर को हुई आख़िरी सुनवाई के दौरान भी केंद्र सरकार ने लिविंग विल का विरोध किया था. केंद्र ने इसका दुरुपयोग होने की आशंका जताई थी.

    बेल्जियम में बच्चे ने चुनी इच्छा मृत्यु

    पैसिव यूथेनेसिया क्या होता है?

    इच्छा मृत्यु के मामले दो तरह के होते हैं- एक निष्क्रिय इच्छा मृत्यु और दूसरी सक्रिय इच्छा मृत्यु.

    अगर कोई मरीज वेंटिलेटर पर है यानी उसका शरीर खुद को ज़िंदा रखने में सक्षम नहीं है, बल्कि मशीनों की मदद से उसका दिल काम कर रहा है.

    तो पैसिव यूथेंशिया यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में धीरे-धीरे उस लाइफ़ सपोर्ट को कम किया जाता है, वेंटिलेटर बंद किए जाते हैं. इससे व्यक्ति की प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है.

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    एक्टिव यूथेनेसिया क्या होता है?

    इस मामले में मरीज ठीक है लेकिन उसे लाइलाज़ बीमारी है. जिससे घर के लोग और मरीज बहुत परेशान हो चुके हैं. वो ख़ुद मरना चाहता है. इसमें वो डॉक्टर से अनुरोध करता है कि उसे ज़हरीला इंजेक्शन देकर मार दिया जाए.

    वकील प्रशांत भूषण बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी एक्टिव यूथेनेसिया को गैरक़ानूनी क़रार दिया है. कोर्ट ने कहा कि किसी को भी इसलिए ज़हरीला इंजेक्शन नहीं दिया जा सकता कि वो दर्द नहीं सहन कर पा रहा है या आर्थिक हालातों कि वजह से इलाज नहीं करा सकता. ये आत्महत्या के बराबर होगा.

    बूढ़े दंपत्ति कर रहे हैं एक्टिव यूथेनेसिया की मांग

    महाराष्ट्र की इरावति और उनके पति नारायण लावाते ने हाल ही में राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर एक्टिव यूथेनेसिया की अनुमति मांगी थी. दंपत्ति स्वस्थ्य हैं लेकिन उनका कोई बच्चा नहीं है. उनका कहना है कि वो सम्मान से मरना चाहते हैं. दंपत्ति ने अनुमति के लिए 31 मार्च तक की डेडलाइन दी है.

    नारायण लावाते ने बीबीसी मराठी की संवाददाता जान्हवी मूले से कहा, "एक्टिव यूथेनेसिया की इजाज़त मिलनी चाहिए. क्योंकि अगर हम मरना चाहते हैं तो हमें ज़िंदा रहने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए."

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    English summary
    Now people will be able to write the will for the will

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