कहीं सच ना हो जाएं 'थ्री मिस्टेक्स ऑफ 'मोदी'

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सरकार बनाने के बाद भी पीएम नरेंद्र मोदी ने अपनी टीम को कुछ विशेष कामों को निपटाने के लिए सौ दिन का समय दिया है। प्रधानमंत्री लगातार अपने भाषणों में भी बेहतर प्रशासन की प्रतिबद्धता दोहरा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या मौजूदा टीम के भरोसे प्रधानमंत्री गुड गवर्नेंस के वादे को पूरा कर पाएंगे। ये तीन मसले उनके लक्ष्य में बाधक बन सकते हैं।
1- दो अहम विभाग एक ही मंत्री के पास-
वित्त मंत्रालय को केंद्र सरकार के सबसे अहम मंत्रालय में से एक माना जाता है। इसके अलावा रक्षा मंत्रालय न केवल प्रशासन के लिहाज से खास होता है बल्कि बेहद संवेदनशील विषय भी माना जाता रहा है।
पीएम नरेंद्र मोदी के अरुण जेटली को वित्त और रक्षा दोनों मंत्रालय दिए जाने के फैसले को ठीक नहीं माना जा रहा है। एक व्यक्ति द्वारा दोनों मंत्रालयों पर फोकस करना आसान नहीं होगा। खासकर ऐसे समय में जब रक्षा क्षेत्र एक के बाद एक हादसों का शिकार हो रहा है और अर्थव्यवस्था की स्थिति भी डावांडोल हैं, दोनों मंत्रालयों के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ मंत्रियों की आवश्यकता थी।
2- मोदी कैबिनेट में दागी-
साफ सुथरी टीम से ही बेहतर प्रशासन की उम्मीद की जाती है। मोदी की मौजूदा कैबिनेट में शामिल मंत्रियों में करीब 30 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। मोदी मंत्रिमंडल के करीब 13 मंत्रियों पर गंभीर आरोप हैं।
एडीआर यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें 8 मंत्री ऐसे हैं जिन पर हत्या की कोशिश, सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। लिहाजा मोदी को ऐसी टीम के भरोसा अपने वादे पूरे करने में मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।
3- एकीकृत मंत्रालय न बनाना-
नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सरकार के मुकाबले अपनी कैबिनेट को छोटा ही रखा है। इसके पीछे तर्क है कि ज्यादा मंत्रालयों के मुकाबले कम लेकिन मजबूत मंत्रालय बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं। मशहूर पत्रकार चैतन्य कालबाग का कहना है कि मोदी को कुछ खास ताकतवर मंत्रालय बनाने चाहिए थे, इससे उनके लिए गवर्नेंस आसान हो सकती थी।
मसलन, पेट्रोलियम, नैचुरल गैस, कोल, पावर और रिन्युएबल एनर्जी जैसे विषयों को मिलाकर एक एनर्जी मिनिस्ट्री बनाई जा सकती थी। इसी की तर्ज पर जहाजरानी, नागरिक उड्डयन, रेलवे, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालयों को एक साथ मिलाकर परिवहन मंत्रालय बनाया जा सकता था। इसे उन्हें अपनी टीम के साथ बेहतर और नियमित तरीके से संवाद स्थापित करने में भी आसानी होती।
ऐसा न करना मोदी के गुड गवर्नेंस के वादा को पूरा करने में बाधक हो सकता है। पहली सरकारें भी बेहतर प्रशासन की दिशा में सिंगल विंडो सिस्टम की अहमियत को खुले तौर पर स्वीकार कर चुकी हैं। लिहाजा एकीकृत व्यवस्था का न होना गुड गवर्नेंस के खिलाफ जा सकता है। हालांकि कई जानकार इसे मोदी की समझदारी बता रहे हैं, व मान रहे हैं कि यह व्यवस्था देश में सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक साबित होगी।











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